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अंधविश्वास: जेब के साथ जीभ भी काट रहा है.

Aug 7 • Arya Samaj • 137 Views • No Comments

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घर के दरवाजे पर नीबू, मिर्च टांगना, बाहर निकलते समय घर के लोगों को दही, चीनी खाने को कहना, अगर कोई छींक दे, तो अशुभ मान कर रुक जाना, बिल्ली सामने से गुजार जाए, तो वहीं रुक जाना यकीन मानिये ये अंधविश्वास अब पुराने पड़ चुके है। अब पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के करतला-सेन्द्रीपाली में लक्ष्मी प्रसाद के घर पूजा का सामान लेकर लोगों की भारी भीड़ जुट रही है। लोग लक्ष्मी प्रसाद के प्रति इस कदर आस्थावान हो गये कि उसके लिए एक तंबू भी लगा दिया है। अंधविश्वासी भक्त लक्ष्मी प्रसाद ने भगवान शिव को रिझाने अपनी जीभ काटकर भगवान शिव में अर्पण कर दी। और जैसा कि हमारे देश में होता है भक्त के इस अराधना की खबर लगते ही श्रद्धालुओं का वहां पर तांता लग गया है। लोग उसके पास आशीर्वाद पाने के लिए नारियल, फूल और अगरबत्ती लेकर पहुंच रहे हैं। ऐसा इस लिए हो रहा है क्योंकि उसने अपनी जीभ काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दी है और ग्रामीण इसे चमत्कार मानने लगे है. लेकिन आप इसे अंधविश्वास की पराकाष्ठा कह सकते है।

देखा जाये देश में हर महीने कोई न कोई धार्मिक त्यौहार या उत्सव मनाया जाता है किन्तु सावन का महीना एक ऐसा महीना है जिसमें शिव मंदिर में भक्तों की लम्बी कतार लगी दिखाई देती है। लेकिन इस भक्ति पर जब हमें धक्का लगता है जब इस भक्ति की आड़ में अंधविश्वास को फैलाया जाता है। इसे भक्ति की पराकाष्ठा या पागलपन की हद ही कह सकते हैं, जब एक जीभ काटने वाले मानसिक रूप से विकृत इन्सान को भी भगवान का दर्जा दिया जाने लगे। शायद यही कारण है जो आज भी हमारे देश की पहचान दुनिया में एक शिक्षित प्रगतिशील देश के बजाय पिछड़े हुए देशों की श्रेणी में रखा जाता है। छोटी-छोटी बातों पर टोना टोटका करना तो आम बात है ही लेकिन अब तो लोग शिव की अराधना मे  अपनी जीभ मंदिरों में चढ़ा रहे हैं।

यह कोई इकलोती घटना नहीं है अगर पिछले कुछ सालों में देखा जाये तो जीभ काटने के अनगिनत मामले प्रकाश में आये। जिन पर यह कहा गया कि यह आस्था से जुड़ा मामला है इसे विज्ञान और कानून में नही लाया जा सकता। इस कारण भी मामले बढ़ते जा रहे है। पिछले वर्ष उड़ीसा के राउरकेला में शिव को प्रसन्न करने के लिए छत्तीसगढ़ के एक अठारह वर्षीय युवक अश्विनी पटेल ने अपनी जीभ काट कर चढ़ा दी थी। इससे कुछ दिन पहले हैदराबाद के एक मंदिर में आंध्र प्रदेश के युवक ने अपनी जीभ काटकर भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ा दी थी। वह चाहता था कि उसके चहेते दो बड़े नेता ही आंध्र और तेलंगाना के मुख्यमंत्री बनें।

इससे पहले वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले अंधविश्वास के कारण 11 वर्षीय एक आदिवासी बालिका चमेली सिदार ने अपनी जीभ काटकर शिव लिंग पर चढ़ा दी थी। यही पिछले कुछ समय पहले मध्यप्रदेश के नीमच जिले में तो आंतरी माता मंदिर में 6 भक्तों ने अपनी जीभ काट कर चढ़ा दी थी। यहां मनोवांछित फल की प्राप्ति होने पर जबान काटकर माता के चरणों में चढ़ाने की परंपरा है। चौकाने वाली बात यह है कि अभी तक प्रशासन और सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया जबकि जबकि यहाँ सैकड़ों लोग अपनी जीभ काटकर चढ़ा चुके हैं।

यह सब देखकर आश्चर्य होता है कि हमारे देश में आज भी कैसा अंधविश्वास कूट-कूट कर भरा हुआ है। यह तब अतिवाद पर पहुंच जाता है जब मंत्री और आईएएस,आईपीएस अंधविश्वास की शरण में दिखाई देते हैं। यानि पढ़े लिखे सुशिक्षित तबका जो देश में गरीबी दर भी जानता हैं और समाज में फैले अंधविश्वास को भी, अपना पैसा समाज की शिक्षा और जागरूकता पर खर्च करने के बजाय इन अंधविश्वास और कथित धर्मगुरुओं पर लूटा रहा है।

इसी का नतीजा है हर रोज नये-नये कथित धार्मिक टैलीविजन चैनल खुल रहे हैं। इन चैनलों पर नाग-नागिन और भूत-प्रेत की कहानियों को परोसा जा रहा है। इसका अलावा मीडिया ने अंधविश्वास बाजार को बड़ा रूप देने का एक किस्म से ठेका ले लिया है। हर रोज सुबह राशिफल और ज्योतिष शास्त्र से शुरू हुए टीवी कार्यक्रम रात तक धारावाहिकों में आत्मा, जादू टोने में बदल जाते है ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके और धर्म संबंधी वस्तुओं के बाजार को स्थापित किया जा सके। मीडिया अंधविश्वास को फैलाने में इस समय अहम भूमिका निभा रहा है। वह भय के मनोविज्ञान को भुना रहा है।

इसके दो नतीजे समाज में देखने को मिल रहे है। इनसें जहाँ एक ओर मध्यम वर्ग की तो जेब कट रही दूसरी और निम्न जिसके पास पैसा नहीं वह अपनी जीभ काट रहा है। धर्म पर धंधा हावी है वैज्ञानिक सोच को तबाह कर इस धारणा को मजबूत किया जा रहा है कि अंधविश्वास के बिना तो दुनिया चल ही नहीं सकती। इससे मीडिया और बाबाओं दोनों का बाजार फल फूलता है। 2017 में जब चोटी कटने वाली अफवाह को मीडिया ने जमकर विज्ञापन और खबरों के माध्यम से खूब बेचा तो वही पाखण्ड से जुड़े लोगों ने तन्त्र-मन्त्र खूब धन बटोरा। जब लोगों ने रूचि लेनी बंद की इसके बाद उस काल्पनिक हज्जाम का आज तक कोई सुराग नहीं लग पाया।  साफ कहा जाये तो आज देश में आधुनिकता और अंधविश्वास कदम ताल करते हुए चल रहे है। इस कारण हमें खुद ही पता नहीं चल पा रहा है कि हम आधुनिक हो रहे हैं या अंधविश्वासी। एक बड़े विरोधाभास के बीच से भारतीय समाज गुजर रहा है। क्योंकि इसमें ईश्वर के नाम पर अंधविश्वास के प्रति आस्था खड़ी की जा रही है और जब तर्क और सच्चाई के ऊपर अंधविश्वास हावी हो जाता है तो जेब और जीभ का कटना शुरू हो ही जाता है।

- राजीव चौधरी 

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