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अधकचरे तर्क और उनसे लीपापोती

अजीब सा शोर है! गरीबी, बेरोजगारी और तमाम समस्या अँधेरे में खामोश बैठी है। राजनीति के ग्राउंड पर खेल खेला जा रहा है। चंदन गुप्ता की देशभक्ति पर सवाल, अंकित सक्सेना की गला रेतकर हत्या, मेवात से धर्मांतरण की उठती सिसकियां और कश्मीर घाटी से उठती अलगाव की आंधी बता रही है कि असली खेल यही है। घटनाएं होंगी, बवंडर होंगे, आंसू भी होंगे लेकिन प्रगतिशील संवेदनशीलता की जगह मक्कार सियासत होगी। इसके बाद न्यूज रूम में टॉक शो होंगे, बहस होगी, अगले-पिछले उदाहरण देकर रोजाना की बहस के दंगल से राजनितिक पहलवान उठकर चले जायेंगे। ब्रेक लिया जायेगा फिर अगली ब्रेकिंग न्यूज का इंतजार होगा।

कासगंज घटना को कुछ दिन बीत गये। तिरंगा यात्रा पर हमले में मारा गया चंदन अभी जीवन के 20 बसंत ही देख पाया था। लेकिन उसकी चिता की राख के साथ अधकचरे तर्कों से सवाल भी ठंडे हो गये। अनुग्रह शंकर लिखते हैं कि चन्दन गुप्ता की हत्या मामले में कहा गया कि तिरंगा यात्रा जान-बूझकर मुस्लिम मुहल्ले से निकाली गई और यहां ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाए गए! जबकि सवाल यह होना चाहिए कि क्या मुस्लिम मुहल्लों में तिरंगा वर्जित है? दूसरा चन्दन को गोली मारने वाला अपराधी कौन था? उसके पास हथियार कहां से आया? पर इन गंभीर सवालों की जरा भी चर्चा न करते हुए बात गणतंत्र दिवस का जुलूस निकाल रहे युवकों की गलती बताते हुए मामले को मोड़ने की कोशिश हुई। साथ ही मीडिया का एक धड़ा इस बात को लेकर मुखर रहा कि क्या देश में अब तिरंगा यात्रा जरूरी है?

इसके बाद की खबर पढ़ें तो राजधानी दिल्ली के रघुवीर नगर इलाके में प्रेम-प्रसंग के कारण युवती के माता-पिता व परिजनों ने मिलकर अंकित सक्सेना की बेरहमी से गला काटकर हत्या कर दी। अंकित का कसूर इतना था कि उसने हिन्दू होकर एक मुस्लिम लड़की से शादी कर अपना घर बसाना चाहता था। जिसके लिए युवती भी तैयार थी लेकिन युवती के पिता और रिश्तेदारों ने चाकू निकाला और देखते ही देखते सरेराह कुछ पलों में अंकित का गला रेत दिया। लेकिन यहाँ भी मीडिया ने ये कहा कि हत्या तो हत्या है, कातिल तो कातिल है, क्या इतना कहना काफी नहीं होता? इस घटना को हिन्दू मुस्लिम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। एक अखलाक, पहलू खां, और अफराजुल की हत्या को एक अरब हिन्दुओं से जोड़ने वाले लोग आखिर अंकित सक्सेना की हत्या को 20 करोड़ मुस्लिमों से नहीं जोड़ पाए?

कुछ लोगों ने कहा कि ऐसी घटनायें तो अक्सर गोत्र, जात और गाँव में इज्जत के नाम पर अंजाम दे दी जाती है। हाँ ये कहने वाले गलत नहीं हैं किन्तु क्या आजतक किसी आपसी विवाद व रंजिस में अखलाक या पहलू खां की जान नहीं गयी? जब केरल में एक हादिया के मामले पर सुप्रीम कोर्ट उसकी जाँच के आदेश एनआईए को देता है तब मामला प्रेम की नजरों से देखा जाता है। इसे युवाओं को प्रेम करने जैसे स्वतंत्र अधिकारों में गिना जाता है। लेकिन जब इसी प्रेम की भेंट एक अंकित सक्सेना चढ़ता है तो इसे सम्मान के लिए हत्या अर्थात ऑनर किलिंग बताकर न्यूज रूम ब्रेक ले लेते हैं।

पर लोगों के जेहन में उफन रहे सवाल ब्रेक कैसे लें? क्या वामपंथ की कलम समाजवाद की रक्षा छोड़कर अब सीधे कट्टर इस्लामवाद की रक्षा करती आसानी से नहीं दिख रही है? सवालों की फेरिहस्त में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अंकित की हत्या के वक्त वहां बड़ी भारी भीड़ मौजूद थी। यदि भीड़ अंकित के बचाव में हत्यारों पर हमला कर देती तो इसे हिन्दुत्त्व से जोड़कर देखा जाना लाजिमी था। कहा जा रहा कि किसी मामले में जब एक पक्ष हिन्दू और दूसरा मुसलमान हो तो ज्यादातर लोग तर्क, तथ्य और न्याय का साथ छोड़कर अपने धार्मिक हित के साथ खड़े नजर आते हैं लेकिन ये शुरुआत किसने की? शाहबानो के मामले में संविधान पर पहले चोट करने वाले कौन थे?

एक और खबर मेवात की भी है देश की राजधानी से सिर्फ 80 किमी. दूर मेवात से जहां अनुसूचित जाति के हिन्दुओं को मुस्लिम दबंगों द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाते हुए मारा-पीटा गया और मुसलमान न बनने पर गांव छोड़ने की ‘धमकी’ तक दी गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को भी अनुग्रह शंकर की माने तो अधकचरे, असंवेदनशील और बेहद आपत्तिजनक तर्कों से ढ़कने की कोशिशें भी हुई। हमेशा की तरह मीडिया में बैठे मौलानाओं ने कहा इस्लाम इस चीज की आज्ञा नहीं देता पर मुरझाया सा सवाल वहीं खड़ा है कि यदि इस्लाम इस चीज की आज्ञा नहीं देता तो फिर ऐसा करने की आज्ञा कौन देता है?

मेवात की घटना पर भी तर्कों की बोछार हुई, चूंकि मामला देहाती इलाके का था खबर आसानी से पहले ही दब गई थी, इसलिए उनकी जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल मामला दलित समुदाय से जुड़ा था तो जय भीम-जय मीम वाले राजनितिक योधा अपनी जबान की तलवार और दलित संवेदना की ढ़ाल किनारे रखते नजर आये। हाँ यदि यह मामला दलितों और अन्य जाति समुदाय के बीच होता तो पत्रकारों से लेकर नेताओं तक की गाड़ी गाँव-गाँव घूमकर कोसती नजर आती। अम्बेडकर ने चाहे जो कहा हो, आज इस्लाम ने दलितों के साथ चाहे जो सुलूक किया हो, पर मेवात का दुःख कोई नहीं मनाएगा, क्या कोई गला नहीं भार्रायेगा?

अब थोड़ा ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह घटनाएं सिर्फ खबरें नहीं हैं, इनमें कुछ साझे तत्व हैं, पर सामाजिक सद्भावना, अल्पसंख्यक समुदाय का राग, इन सब सवालों का मुंह भींचता सा दिखाई दे रहा है। तटस्थ होकर इंसानियत की बात हुए तो देश में एक अरसा सा बीत गया। कलम के धनी लोग राजनीतिक टोलो में बंटे से दिखाई दे रहे हैं तो फिर तिरंगे के लिए गिरी चंदन की लाश पर कोई आंसू क्यों बहायेगा’ न कोई सवाल उठेगा। प्रेम के नाम पर अंकित सक्सेना की हत्या पर भला कोई त्योरियां क्यों चढ़ेंगी, न कोई उंगली उठेगी और मेवात! क्या बात करते हैं साहब! ये तो कोई मुद्दा ही नहीं है। बस खेल देखो और उसपर बिछी बिसात देखो।

-राजीव चौधरी

 

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