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अबकी बार पाकिस्तान कहाँ बनेगा..?

किसी ने कहा है…हो तुम अदीब क्यों बांटने की बात करते हो, कलम ले हाथ में क्यों काटने की बात करते हो। सियासत और अदब में फर्क कुछ तो है मेरे भाई, भला तुम फिर क्यों ऐसे जाहिलों की बात करते हो।

एक सीनियर एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता है नाम है महमूद प्राचा। इन्होने दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मीडिया को बुलाकर कहा कि अब वक्त आ गया है कि अल्पसंख्यक को अपनी हिफाजत के लिए कानूनी तौर पर हथियार रखने चाहिये। साफ़ कहे महमूद प्राचा का कहना है कि मुस्लिम लोगों को आत्मरक्षा में हथियार रखने चाहिए। सवाल ये है कि क्या मॉ़ब लिंचिंग के खिलाफ हथियार रखने के लिए उकसाना सही है। क्या ये हिंसा का जवाब हिंसा से देने जैसा नहीं है? क्या इससे देश में गन कल्चर को बढ़ावा नहीं मिलेगा और क्या कानून के जानकार प्राचा साहब जैसे लोगों को कठोर कानून पर भरोसा नहीं है?

असल में कुछ लोग इसे वोट की राजनीती से जोड़कर देख रहे है जो ऐसा कर रहे है वो एक अंधकार में जी रहे है। क्योंकि जिन्ना ने कभी भी ‘जेहाद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन उनके अनुयायियों ने खूब किया। जबकि जिन्ना जिस राजनीति को बढ़ावा दिया,  उसे उस समय ‘जेहाद’ का नाम दिया जा सकता था।

आज ठीक महमूद प्राचा भी वही करा रहे है जो अगस्त 1946 में जिन्ना ने अपने सीधी कार्यवाही कार्यक्रम में उनके अन्दर स्थित ‘जेहाद’ को उभारा था और मुसलिम राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण करने में मदद दी थी।  देखा जाये आज भी सब कुछ ठीक उसी सिस्टम से चल रहा है। क्योंकि आज ओवैसी को इतने वर्षों बाद एक मुसलमान होने के नाते अचानक क्यों  लगने लगा है कि वे भारत में बराबर के नागरिक हैं, किराएदार नहीं हैं और हिस्सेदार रहेंगे जैसी बातें करने लगे हैं। सोचने वाली बात है कि पद से उतरते हुए एक उपराष्ट्रपति क्यों डर जाते हैं। फिर नसीरुद्दीन शाह क्यों डर जाते हैं? डर कुछ ऐसा है कि कभी आमिर खान इसी डर के बारे में सुरक्षित देश खोजने की बात करते हैं तो कभी शबाना आजमी डर जाती है।

सवाल ये नहीं है कि आज एक घटना पर डरने वाले यह लोग 1984 के दंगों पर क्यों नहीं डरे? 90 के दशक में कश्मीर में पंडितों के साथ हुई भयानक साम्प्रदायिक त्रासदी के वक्त इनका डर कहां था? ताज होटल पर हमले के वक्त या दिल्ली मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के समय इन लोगों को डर क्यों नहीं लगा?

सवाल ये है कि ये राजनीती है सीधा एजेंडा है जो देश 15 अगस्त 1947 को दो टुकड़ों में होकर देख चूका है। देश विभाजन से जुड़ी सच्चाइयों को इतिहास से कभी हटाया नहीं जा सकता है। इतिहासकार वामपंथी हो या दक्षिणपंथी अथवा स्वयं को तटस्थ कहनेवाले। भारत विभाजन और देश की स्वतंत्रता को लेकर कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन पर सभी एकमत हैं। कि देश के विभाजन के लिए मुसलमानों का धर्म प्रेम सबसे अधि‍क जिम्मेदार रहा था।

हालांकि इतिहास का एक सच यह भी है कि मौलाना आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान,  मौलाना सज्जाद, तुफैल अहमद मंगलौरी जैसे कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस विभाजन के विरोधी थे। ऐसा कुछ लोग आज भी है लेकिन इन मुट्ठीभर लोगों की अपनी कौम में सुननेवाला कौन था?

हिंसा और हत्या हर एक शासक के काल में होते रहे हैं और इससे कोई भी युग अछूता नहीं रहा है। बड़े-बड़े सम्राटों से लेकर आज की वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणाली तक, कोई एक वर्ष ऐसा नहीं रहा होगा जब काल के चेहरे पर रक्त के छींटे ना पड़े हों। लेकिन आस-पास डर का माहौल रचा जाता है। यही वो माहौल है जहां से एक बुद्धिजीवी दूसरे बुद्धिजीवी को, एक नेता दूसरे नेता को, एक अभिनेता दूसरे अभिनेता को डरा रहा है। इसके बाद इस डर को मीडिया पर्दे पर लेकर आती है और लोग भी इस डर को महसूस करें।

इन लोगों के मुताबिक देश का आम आदमी कुछ बोल नहीं पा रहा है, वह डरा हुआ है लेकिन क्या सच में ऐसा हो रहा है? या फिर डर का एक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि मुझे बाजारों में, सड़कों पर, मेट्रो या किसी सार्वजनिक स्थान पर डरे हुए लोग नहीं मिल रहे हैं। किन्तु इसके बावजूद भी कुछ बिकाऊ पत्रकार वाशिंगटन डी सी से लेकर न्यूयार्क टाइम्स तक इस डर के बारे में लेख लिख रहे है। यह जताने की पूरी कोशिश जारी है कि भारत में डर का माहौल है इसका अगला चरण होगा अलग देश की मांग लेकिन सवाल ये है। अगर ऐसा हुआ तो अबकी बार भारत का कौनसा हिस्सा पाकिस्तान बनेगा।

 राजीव चौधरी

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