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अब भारत माता की मूर्ति पर एफ आई आर

अभी तक मंदिरों देशभक्ति के नारों और भारतीय उत्सवों से जिन लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुआ करती थी अब उनकी भावनाएं तमिलनाडु में कन्याकुमारी से कुछ ही दूर एक तिराहे पर भारत माता की मूर्ति देखकर आहत हो गयी। ईसाई मिशनरियों ने शिकायत दर्ज करी कि भारत माता की मूर्ति उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करती है.. विडम्बना देखिये तमिलनाडु की पुलिस भले ही किसी और चीज की रक्षा करने से चूक जाएँ पर धार्मिक भावनाओं की रक्षा बड़ी मुस्तेदी से करती है, इसी कारण पुलिस ने तुरंत मूर्ति को कपडे से लपेट कर ढक दिया और इसका विरोध करने वाले हिंदुओं को गिरफ्तार कर लिया।

हम सब बड़े गर्व से कहते है 1947 में हमने हजारों साल से बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को मुक्त कराया था अब भारत माता स्वतंत्र है लेकिन आज 2020 में उसे बोरी से लपेट दिया गया क्योंकि ब्रिटेनिया माता के बेटों की भारत माता की मूर्ति से भावनाएं जो आहत होने लगी है। हालाँकि ये भारत माता की मूर्ति से भावना आहत होने का आज का पहला मामला नही है।कोई कहता है हम भारत माता की जय नहीं बोलेंगे तो किसी को मूर्ति ही रास नहीं आई।

केवल इतना भर नहीं है भारतीय भूमि से जुड़े किसी भी त्यौहार उत्सव या महापुरुष से नफरत के पुरे कांसेप्ट समझिये। कुछ समय पहले रक्षाबंधन पर मेहंदी लगाकर जब कुछ छात्रा फतेहपुर के सैंट मेरिज कॉन्वेंट मिशनरी स्कूल में पहुंची तो वहां के ईसाई प्रबंधन ने सभी हिन्दू छात्राओं को सजा के तौर पर धूप में खड़ा कर दिया था। बात इतने तक नहीं रुकी बल्कि स्कूल की प्रिंसपल सिस्टर सरिता ने मेहँदी उतरवाने के लिए छात्राओं के हाथ पत्थर से तब तक घिसवाए जब तक उनके हाथों से ब्लीडिंग नहीं होने लगी। और छात्राओं के हाथों में बंधी राखियों को भी काटकर फेंक दिया गया।

सोचिये क्या इस भारत देश में किसी स्कूल में किसी ईसा मसीह के क्रॉस या चित्र पहने छात्र को अगर स्कूल से बाहर फेंक दिया जाये तो इसकी गूंज कहाँ तक जाएगी? शायद शाम तक वेटिकन से फोन आ जाये या सारे विश्व के पादरी अपनी धार्मिक भावना की गठरी लेकर सड़कों पर उतर जाये कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ क्या हो रहा है। लेकिन हमारी धार्मिक भावना उस समय मर जाती है, जब हैदराबाद के सेंट एडम्स हाई स्कूल, चिक्कडापल्ली में एक हिन्दू बच्चे को ईसाई स्कुल ने बाहर सिर्फ इसलिए फेंक दिया जाता है। क्यूंकि वो भगवान का लॉकेट पहनकर स्कूल गया था। ये नफरत लाकेट से नहीं थी आप उस स्कूल में जीसस के लाकेट पहनिए कोई रोक टोक नहीं बस नफरत आपके देवताओं से है।

हमारे बच्चें जिंगल बेल जिंगल बेल गाते है हम बड़े खुश होते उस समय हमारी धर्मिक भावनाएं धर्मनिरपेक्षता के ठेके पर बोतल लेने चली जाती है, उसके नशे में हम सर पर लाल केप लगाकर सेंटा बन जाते है। लेकिन जब उनके बच्चें को स्कूल की प्रार्थना में असतो माँ सद गमय गाना पड़ता है, तो नया-नया ईसाई बना विनायक शाह अपने बच्चें की धार्मिक भावना की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में खड़ा हो जाता है कि साहब ये असतो माँ सद गमय वाली प्रार्थना बंद कर दो क्योंकि हमारी और हमारे बच्चें की धार्मिक भावना इससे आहत होती है। और जज साहब भी उसे लताड़ने के बजाय केंद्रीय विद्यालय में होने वाली इस प्रार्थना पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछते है कि क्यों न इस प्रार्थना को बंद कर दिया जाये?

बात यही तक नहीं रूकती जब मध्य प्रदेश के खंडवा में सेंट पायस स्कूल में संस्कार बंसल नाम का सातवीं कक्षा का एक छात्र अपने जन्म दिन पर स्कूल में माथे पर तिलक लगाकर और हाथ में कलावा बांधकर जाता है तो स्कूल के प्रिसंपल की धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती है और बच्चें को तब तक पीटा जाता है जब तक बच्चें का तिलक नहीं मिट जाता।

सिर्फ इतना नही देश भक्ति में इनकी भावनाएं अलग-अलग तरह से कुलाचे मारती है, कुछ समय पहले श्रीलंका में हुए चर्च पर हमले के बाद हमारे देश के चर्च और मिशनरी स्कूलों में वहां के मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गयी थी, देखा जाये तो मानवता के लिहाज इसे इसमें कोई बुराई नहीं लेकिन बरेली के बिशप कॉनराड चाइल्ड केयर स्कूल में श्रीलंका के चर्च में हुए आतंकी हमले के वीभत्स दृश्य दिखाकर ईसाई समुदाय के धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार शांति पाठ कराया गया। वहां उपस्थित एक बच्चें ने जब यह सवाल पूछा कि पुलवामा में शहीद हुए हमारे जवानों के लिए आपने शांति पाठ क्यों नहीं किया तो बच्चें की पिटाई की जाती है।

ऐसे एक दो जगह नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह सब चल रहा है। कुछ समय पहले ही गुजरात की राजधानी गांधीनगर के सेक्टर-21 के एक मिशनरी स्कूल में रक्षा बंधन से अगले दिन जब हिन्दू बच्चें राखी बांधकर स्कूल पहुंचे तो मिशनरी स्कूल की धार्मिक भावनाएं आहत हो गयी। और सभी बच्चों को लाइन में खड़ा करके ब्लेड से सभी बच्चों की राखी काट कर फेंक दी गयी।

सेकुलर देश में धर्मिक भावनाएं आहत ये कोई एक दो मामले नहीं है ईसाई मिशनरी स्कूल, कान्वेंट स्कूलों से इस तरह की खबरे लगभग रोज ही आती है, जिनमे भारतीय मीडिया बड़ी खामोशी से दबा देती है, हिन्दू बच्चों पर तरह-तरह के अत्याचार होते है. कभी रक्षाबंधन की राखी काटकर फेंकी जाती है. बच्चे की पिटाई की जाती है. कभीकिसी बच्चियों को इसलिए मारा जाता है क्यूंकि वो अपने त्यौहार के दिन मेहँदी लगाती है और वो बच्चियां भी फिर अगले दिन स्कूल इसलिए चली जाती है, क्योंकि उसी रात खबर का गला घोट कर मौत की नींद सुला दिया जाता है.

अब समझना होगा कि आज जिन लोगों की भावनायें भारत माता की मूर्ति देखकर आहत हो गयी सोचिये आपके मंदिर आपके धर्म स्थल, आपके त्यौहार उत्सव देखकर वो अपने अन्दर का जहर किस प्रकार पी रहे होंगे, अभी उनका वश नहीं है अभी वो भारत में जीसस की विशाल प्रतिमा और माता मरियम के मंदिर बना रहे है जिस दिन उनका काम पूरा हो जायेगा उस दिन वो खुलकर अपना विषवामन शुरू करेंगे।

आज भारत माता की मूर्ति से जिनकी धार्मिक भावना आहत हुई उनके लिए हम सिर्फ इतना कहना चाहते कि भारत माता का मतलब एक सिर्फ मूर्ति नहीं है, बल्कि वह हमारा करोड़ों वर्ष का इतिहास है वो हमारी जननी जन्मभूमि है, जीवनदात्री है, वह हमारी थाती है। इसीलिए उसे सर्वोच्च स्थान मिलता है। यही कारण था कि ब्रिटेनिया माता के वंशजों से अपनी भारत माता की मुक्ति के लिए लड़ने वाले हमारे क्रांतिकारी बलिदानी भारत माता की तश्वीर अपने पास रखते थे। और शान से कहते थे तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें।

लेख-राजीव चौधरी

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