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अब मुर्दे भी बने बड़ी मुसीबत

Oct 6 • Samaj and the Society • 41 Views • No Comments

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आज जहाँ पुरे विश्व की चिंता बढती आबादी, रोजगार और स्वच्छ पर्यावरण आदि को लेकर बनी हैं वही इन दिनों जिंदा इंसानों से ज्यादा इस वक्त, गुजर चुके लोगों का बोझ बन एक समस्या दुनिया के सामने खड़ी हो रही है? मसलन बहुत से देशों के लिए मुसीबत यह बन रही है कि जिन लोगों के प्राण उनके शरीर छोड़कर निकल गए हैं, उनका क्या करें? कहां दफनाएं? कैसे जलाएं? अस्थियां कहां रखें? आदि-आदि चुनौती आज उनके सामने सामने खड़ी है. ये ऐसे सवाल हैं, जिनसे बहुत से देश परेशान हैं. भारत भी इन देशों में से एक है. पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह क़ब्रिस्तानों और श्मशानों का विस्तार हो रहा है, उससे तो कुछ साल बाद लोगों के रहने के लिए ही जगह नहीं बचेगी. हालाँकि श्मशान घाटों को समय के साथ क्षेत्रफल के विस्तार की जरूरत नहीं पड़ती किन्तु कब्रिस्तानों में जगह की किल्लत को लेकर पूरा विश्व समुदाय चिंतित दिखाई दे रहा है.

धरती पर सिर्फ एक इंसान ही ऐसा जीव है, जो अपने गुजर चुके साथियों को सम्मान के साथ आख़िरी विदाई देता है. ये इंसानी सभ्यता की पारम्परिक ख़ूबियों में से एक है. लेकिन जब उसकी ये खूबी ही परेशानी का कारण बन रही तो इन्सान क्या करें? हर किसी के मत, मतान्तर और धर्म के अपने अलग-अलग सिद्धांत है. पर जब हम आर्यावर्त की पवित्र पुस्तको से खोज करते है तो यजुर्वेद आदेश देता है कि “ भस्मान्त शरीरम् “ ( यजुर्वेद ४०?१५) अर्थात इस मनुष्य शरीर का मनुष्य से अंतिम सम्बन्ध जलाने और भस्म कर देने तक है. मतलब जलाना ही उत्तम मार्ग है. जबकि इस्लाम और इसाई समेत कई पंथ मृत इन्सान को दफनाने के पक्ष में खड़े रहते है. हालाँकि बदलते समय और सदी ने ईसायत की सोच पर काफी प्रभाव डाला जिस कारण आज जमीन की कमी की वजह से ही ईसाइयों में भी शवों को जलाने का चलन शुरू हो चूका है जबकि चर्च इसके ख़िलाफ है लेकिन दफनाने की जगह की ऐसी किल्लत हो गई है कि पुरानी क़ब्रें खोदकर उनकी जगह नई लाशें दफनाई जा रही हैं. कई यूरोपीय देशों में क़ब्र के लिए जमीन इतनी महंगी हो गई है कि जमीन से अस्थियां निकालकर उन्हें बड़े गड्ढों में जमाकर किया जा रहा है. इन सब हालात ने उन्हें मुर्दों को जलाने के लिए मजबूर कर दिया.

धरती पर लाशों का बोझ इस कदर बढ़ता जा रहा है कि आज बहुत से शहरों में नए मुर्दों को दफनाने के लिए जगह ही नहीं बची. दिल्ली हो या लंदन, या न्यूयॉर्क, येरुशलम, सिंगापुर, लाहौर या फिर कोई और बड़ा शहर. सब का यही हाल है. इसकी वजह ये है कि आज की तारीख़ में हर जिंदा इंसान के उल्टा 30 लाशें धरती पर हैं. नतीजा ये है कि ग्रीस जैसे छोटे देश में अपनों को दफनाने के लिए लोगों के पास जगह ही नहीं बची. इसीलिए पुराने क़ब्रिस्तानों को खोदकर, उसमें से हड्डियां निकालकर, नए मुर्दों के लिए जगह बनाई जा रही है. यूनान की राजधानी एथेंस में थर्ड सीमेटरी, यूरोप के बड़े क़ब्रिस्तानों में से एक है. यहां काम करने वाले लोग कहते हैं कि क़ब्रिस्तान में रोज 15 लाशें दफन होने के लिए आती हैं. हाल ये है कि आज एथेंस में रहने की जगह ढूंढना आसान है, दफन होने के लिए दो गज जमीन नहीं मिलती. पूरे यूनान में एक भी शवदाह गृह नही है. नतीजा ये कि लाशों को दफ्न करना, यूनान के लिए राष्ट्रीय चुनौती बन गया है. इसीलिए अब ग्रीस में भी एक शवदाह गृह खोला जा रहा है.

यूनान की तरह ही हांगकांग भी क़ब्रिस्तान के लिए कम पड़ती जगह से परेशान है. जिस देश में रहने के लिए जगह इतनी मुश्किल से मिलती हो, वहां मुर्दे दफन करने की जगह का इंतजाम कैसे होता. इसीलिए, हांगकांग में सत्तर के दशक से ही लाशों को जलाने की परंपरा शुरू हो गई थी. हालाँकि पंडित लेखराम जी लिखते है कि मुर्दों का जलाना एक समय पुरे संसार में प्रचलित था. जैसा की प्रसिद्ध इतिहासकार आनरेबल डाक्टर डब्ल्यू हंटर साहिब लिखते है  आर्य क्या हिन्दू क्या यूनान और इटली में भी लोग अपने मुर्दों को चिता पर जलाते थे (तारीखे हिन्द १८८४ ईस्वी , पृष्ठ ७० ) इस पर महर्षि मनु जी की आज्ञा है “ निषेकादि श्म्शानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः (मनु२/१६)

अर्थात- गर्भस्थापना से लेकर श्मशान में जलाने तक मनुष्य शरीर के लिए मन्त्रो से वैदिक विधि कही गयी है. अर्थात गर्भ से लेकर जलाने तक जो जो कार्य मनुष्यों के लाभार्थ स्वंय अथवा लोगो के करने योग्य है उनकी आज्ञा वेदों में है. मृतक के शरीर को जलाने के लाभ और उसकी हड्डियों को जलाने के पश्चात् पानी अथवा खेत में डालने का वर्णन है जिनका लाभ सूर्य प्रकाशवत प्रकट है. चूना, हड्डी, रेत इत्यादि से पानी निर्मल होता है.

मनुष्य अपने मरने वाले साथियों को सम्मान से विदाई दे ये जरूरी है और इसी पारम्परिक चीज को आने वाली नस्लों के हाथों में सौंपना चाहते हैं. सदियों से तमाम इंसानी सभ्यताओं में मुर्दों को मान देने का चलन है. हमें समझना होगा कि दुनिया की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है. बढ़ती आबादी पर्यावरण के लिए बोझ है. तो बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रह के मृतक दाह संस्कार यानि जलाने के क्रिया को वैज्ञानिक पद्धति की नजर से देखते हुए स्वीकार कर लेना चाहिए.  सैकड़ो लोगो की मजारों, कब्रों पर जो हजारो और लाखो करोड़ रूपये खर्च करके बड़े बड़े मकबरे और भवन बनाये गये है अथवा बनाये जाते, वह धन आगे बच जायेगा बल्कि वह धन किसी अच्छे, प्राणिमात्र के लाभ प्रद कार्य अर्थात शिक्षा, अनाथालय अस्पताल आदि में व्यय होगा. इससे कब्र में जाया होने वाली जमीन बचेगी और पर्यावरण का भी लाभ होगा. साथ ही मुर्दे भी परेशानी का सबब नहीं बनेगें.

राजीव चौधरी

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