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अमानवीय, कुप्रथा, और पर्सनल लॉ

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के प्रति लिंगभेद समेत विभिन्न मसलों को लेकर दाखिल जनहित याचिका में शुक्रवार को मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद को पक्षकार बनने की अनुमति दे दी। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति आर भानुमति की 3 सदस्यीय पीठ ने केंद्र और इस संगठन को 6 हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। वही जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि पर्सनल लॉ को इस आधार पर वैधता नहीं मिली है कि इन्हें किसी कानून या सक्षम अधिकारी ने बनाया है। पर्सनल लॉ का मूलभूत स्रोत उनके अपने धर्मग्रंथ हैं। मुस्लिम कानून मूलरूप से पवित्र कुरान पर आधारित है और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 13 में उल्लिखित ‘लागू कानून’ की अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आ सकता। इसकी वैधता को संविधान के भाग-3 के आधार पर दी गयी चुनौती पर नहीं परखा जा सकता|
भारत की मुस्लिम बेटियां समाज का सबसे अशिक्षित वर्ग हैं, सम्मानित रोजगार में उनकी तादाद सबसे कम है, अपने ही समाज में दहेज के कारण ठुकराई जा रही हैं, गरीबी-बेरोजगारी और असंगठित क्षेत्र की शोषणकारी व्यवस्था की मजदूरी में पिस रही हैं. तीन तलाक की तलवार उनकी गर्दन पर लटकती रहती है, कम उम्र में शादी इसके बाद धार्मिक कानून की आड़ में बच्चे पैदा करवाना एक किस्म से वो अपनी जिन्दगी जी ही नहीं पाती कश्मीर की एक लाख से ज्यादा बेटियां ‘हाफ-विडो’ यानी अर्द्ध-विधवा होकर जिंदा लाश बना दी गई हैं| जब पड़ोस में तालिबान अपनी नाफरमान बेटी-बीवी को बीच चौराहे गोली से उड़ा रहा हो, जब आईएसआईएस यौन-गुलामी की पुनर्स्थापना इस्लाम के नाम पर कर रहा हो- ऐसे में वे कौन लोग हैं जो मुस्लिम महिलाओं को पंडावादी लूट, अराजकता, गंदगी और अंधविश्वास के केंद्र- मजार और दरगाह के ‘गर्भ-गृह’ में प्रवेश की लड़ाई, को सशक्तिकरण और नारीवाद का नाम देकर असली लड़ाइयों से ध्यान हटा रहे हैं? आज मुस्लिम समाज शिक्षा,दीक्षा में काफी पिछड़ा है, कुछ लोग दीनी तालीम पाकर मस्जिद मदरसों में मौलवी तो बन जाते पर अपने समाज को बुनियादी चीजो, आधुनिक शिक्षा, और समाज की मुख्य धारा से अलग रखने की वकालत करते नजर आते है| लेकिन अभी जिस तरीके से कुछ महिला पत्रकार मुस्लिम समाज की महिलाओं के लिए मुखर हुई है उसे देखकर लगता है कि यदि उदारवादी मुस्लिम जगत का साथ मिल गया तो समूचे विश्व में मुस्लिम महिलाओं की दशा में सुधार की एक उम्मीद सी जग जायेगी
पिछले दिनों पेशे से पत्रकार 29 वर्षीय आरिफा जौहरी ने बोहरा समुदाय की खतने की विवादास्पद परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दिया है। खतने का विरोध करने वाले संगठन साहियो की संस्थापक जौहरी कहती हैं,बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना किए जाने की परंपरा भयावह है। यह सिर्फअफ्रीकी जनजातियों में किया जाता है। बोहरा समुदाय में माना जाता है कि वहसिर्फ स्किन का एक हिस्सा काट रहे हैं। लेकिन इसकी कोई वैज्ञानिक प्रक्रियानहीं है,मात्र एक कुरीति के ऊपर हर साल लाखों बच्चियां इस पीड़ा का दंश झेलती है जिनमे करीब पैतीस फीसदी तो गरीबी के कारण या सही उपचार ना मिलने पर मौत की गोद में सो जाती है| स्त्रियों के खतना का यह बेहद क्रूर,दर्दनाक और अमानवीय बहुत प्राचीन रिवाज पर सरकारे मौन क्यों हो जाती है? अब सवाल पैदा होता है कि असल समस्याओं से जूझती मुस्लिम महिलाओं का दुःख दर्द इन तथाकथित मौलानाओं को क्यों दिखाई नहीं देता वो कौन लोग हैं जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तीन-तलाक, भगोड़े पति, पति की दूसरी शादी से उत्पन्न अभाव, परिवार नियोजन का अभाव, जात-पात, दहेज, परिवारों में ही बलात्कार जैसी भयानक समस्याओं के निराकरण के बजाए ये धार्मिक गुरु अपने लिए भारत में पूर्ण शरियत का तो विरोध करते है किन्तु जब सविंधान के अनुरूप महिलाओं को कुछ लाभ या राहत मिलती दिखाई देती है तो ये शरियत का बाजा बजाकर अपने धर्मग्रंथ का हवाला देने लगते है|
जब देश का सविंधान बेहतर शिक्षा,समान अधिकार और आर्थिक खुशहाली पर बल देता है तो यह धर्मगुरु अपने ग्रन्थ हाथ में लिए लिए खड़े पाए जाते है| किन्तु बाद में यही लोग मंच पर अपनी गरीबी का रोना रोकर सरकारों पर भेदभाव का आरोप लगाते है आखिर क्यों? क्या सामाजिक खुशहाली और सर्व समाज समानता भी किसी धर्म में बाधक हो सकती है?

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