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अयोध्या, राजनीति के आगे बेबस आस्था

किसी नेता या राजनैतिक दल का अस्तित्व और भविष्य कितना होता है पता नहीं! लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम या अन्य किसी महापुरुष का अस्तित्व हमारे प्राणों में बसता है और भविष्य में भी सदा बसता रहेगा। कहा जाता है 16वीं सदी में एक मुस्लिम आक्रान्ता द्वारा तोड़ा गया उनका एक मंदिर आज भी पुनर्निर्माण की बाट जोह रहा है। आस्था लगातार 25 वर्षो से कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही है। आज हर किसी को याद है 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने को 25 बरस पूरे गये। पर कितने लोग जानते हैं कि इससे पहले राम मंदिर कब टूटा था? शायद उन वर्षो की गिनती उँगलियों पर नहीं की जा सकती। हालाँकि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा हमेशा रहा है। पर संविधान, राजनितिक दलों और कथित अल्पसंख्यकों के हित के एजेंडे को देखते हुए यथा स्थिति बनी हुई है।

भारत में मस्जिद का टूटना एक दुखद सन्देश की तरह है जबकि सब जानते हैं कि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के बाद विश्व भर के मुस्लिमों में इसकी प्रतिक्रिया में सैकड़ों मंदिर तबाह कर डाले गये थे। अकेले बांग्लादेश में ही क्या-क्या हुआ आप तसलीमा नसरीन की पुस्तक लज्जा से जान सकते हैं। बाबरी मस्जिद शहीद हुई थी यह सुनते-सुनते काफी वर्ष बीत गये पर क्या मस्जिदें सिर्फ भारत में ही शहीद होती हैं क्योंकि इस्लामिक मुल्कों में कोई महीना या सप्ताह ही ऐसा जाता होगा जब वहां किसी मस्जिद में विस्फोट न होता हो? या फिर ऐसा हो सकता है कि मस्जिदें सिर्फ हथोड़ों से शहीद होती हो बम विस्फोटों और आत्मघाती हमलों से नहीं?

इसी वर्ष मोसुल में 800 साल पुरानी अल-नूरी मस्जिद को आई.एस.आई.एस. के विद्रोहियों ने उड़ा दिया था। तब कहीं भी इस विरोध में कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं दी। न कहीं दंगे हुए, न इसके विरोध में बम ब्लास्ट, जैसे की बाबरी के विरोध में मुंबई की जमीन हजारों लोगों के खून से सन गई थी। चलो भारत में तो बाबर की मस्जिद टूटी थी जोकि एक हमलावर था लेकिन 5 जुलाई, 2016 सउदी अरब में इस्लाम के पवित्र स्थलों में से एक मदीना में पैगंबर की मस्जिद के बाहर एक आत्मघाती विस्फोट किया गया। इसके विरोध में किसने प्रतिक्रिया दी किसने विरोध दर्ज किया? चलो ये तो थोड़ी गुजरी बात हो गयी, पिछले महीने ही मिस्र के उत्तरी सिनाई में जुमे की नमाज के दौरान एक मस्जिद पर हुए  आतंकी हमले में कम से कम 235 लोगों की मौत हुई थी और करीब इतने ही घायल हुए थे क्या वह मस्जिद नहीं थी या मरने वाले लोगों के अन्दर मजहब नहीं था? हर वर्ष न जाने कितने लोग मजहब बनाने या उसकी पुरातन भव्यता प्राप्त करने के लिए हजारों लोगों को शहीद करते हैं उनकी गिनती किसी ऊँगली पर नहीं होती न कोई शोक और काला दिवस मनाया जाता लेकिन मात्र पत्थरों से बनी ईमारत के लिए हर वर्ष न जाने कितनी राजनीति होती है।

खैर वही बात करते हैं जो वर्तमान में लोगों को पसंद है और पसंद बनाई भी जा रही है तो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 4 दिसम्बर से अपनी आखिरी सुनवाई शुरू की लेकिन पक्षकारों के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष न्यायालय ने सुनवाई 8 फरवरी 2018 के लिए टाल दी गयी है। मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि जब भी मामले की सुनवाई होगी, कोर्ट के बाहर भी इसका गंभीर प्रभाव होगा। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए 15 जुलाई 2019 के बाद इस मामले की सुनवाई करें। जबकि  केंद्र सरकार ने बिना स्थगन के रोज सुनवाई की मांग कर रही है। यदि इस मामले की रोज सुनवाई भी होती है तो सभी पक्षों और सभी सबूतों की अनुवादित कापियां जांचने में कोर्ट कम से कम एक वर्ष का समय लग जायेगा। इस पर सिब्बल का कहना है कि 2019 के आम चुनाव में सत्ताधारी दल इस मसले से फायदा उठा सकता है। इससे साफ है कि वकील हो या राजनेता यहाँ लोगों की आस्था से ज्यादा अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की परवाह कर रहे हैं।

अयोध्या विवाद किसके हक में जायेगा इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है। 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले के बाद पिछले महीने शिया सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुलह का फार्मूला पेश किया था। शिया वक्फ बोर्ड ने कहा था कि विवादित जगह पर राम मंदिर बनाया जाए और मस्जिद अयोध्या में बनाए जाने के बजाए लखनऊ में बनाई जाए। इस मसौदे के तहत पुराने लखनऊ के हुसैनाबाद में घंटाघर के सामने शिया वक्फ बोर्ड की जमीन है। उस जगह पर मस्जिद बनाई जाए और मस्जिद का नाम किसी मुस्लिम राजा या शासक के नाम पर न होकर ‘‘मस्जिद-ए-अमन’’ रखा जाए। इस मसौदे के मुताबिक, विवादित जगह पर भगवान श्रीराम का मंदिर बने ताकि हिन्दू और मुसलमानों के बीच का विवाद हमेशा के लिए खत्म हो और देश में अमन कायम हो सके।

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस मसौदे का लोगों ने भी समर्थन किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में पार्टी नहीं है और 1949 से चला आ रहा एक धार्मिक और राजनितिक विवाद एक बार फिर अधर में लटक गया है। हालाँकि सत्तारूढ़ दल को यह भी पता है कि इस बार उसके पास कोई बहाना भी नहीं है। निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक वही सत्ता में विराजमान  है।

हालाँकि 1949 में शुरूआती मुद्दा सिर्फ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में पहले से कायम राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे। लेकिन अब 2017 में अदालतों राजनितिक दलों के लम्बे सफर के बाद अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिन्दू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है? दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाकी ने बनवाया? लेकिन अब इतिहास में हुई गलती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नहीं किया जा सकता। इसलिए सब मिलाकर यह मामला पूरे भारतीय समाज और संविधान-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बना खड़ा है। हर किसी के पास अपने सुझाव है पर सुझाव मानने वाले लोग कहाँ हैं?

राजीव चौधरी

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