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जिन्ना और कन्हैया

राजीव चौधरी

एक विचारधारा जो बोद्धिक जाल के जरिये हर समय सत्ता का विरोध करे तो वामपंथी कहलाये जाते है और हथियार से आगे बढे तो चरमपंथी. एक विचारधारा दिल जोडती है, एक विचारधारा जो देश तोडती है, एक विचाधारा जो देश के लिए मरने मिटने वाले शहीद सैनिको का सम्मान करती है और एक विचारधारा जो शहीद सैनिको की मौत पर जश्न मनाती है. एक विचारधारा डीयू और जेएनयू में उमर खालिद के विरोध में खड़ी हो जाती है तो एक विचाधारा बीजेपी नेता शाजिया इल्मी के विरोध में जामिया मिलिया में खड़ी हो जाती है.

इतिहास बताता है कि एक विचारधारा ने 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिमों की बेहतरी के लिए अलग देश पाकिस्तान की मांग रखी थी. विचाधारा का नाम मुस्लिम लीग था. शायद मुस्लिम लीग भी नहीं जानती थी कि इसके बाद उसी के देश में शिया, सुन्नी, हनफी, वहाबी, अहमदिया आदि विचाधारा पनपेगी और इनके बाद भाषा की एक अलग विचारधारा खड़ी होकर 71 में बांग्लादेश बना लेगी. जो लोग आज उमर खालिद और उसके गेंग के नारों को अभिव्यक्ति की आजादी बता रहे है उन्हें पता होगा कि बरसों पहले एक साम्राज्य था सोवियत संघ के नाम से जाना जाता था. 20वीं सदी के इतिहास को, अर्थव्यवस्था को, और तकनीक को प्रभावित करने वाला सोवियत संघ. आखिर कैसे एक रात में टूट गया? वो देश टूट गया जिसके पास पृथ्वी का छठा हिस्सा था. जिस साम्राज्य ने हिटलर को परास्त किया, जिसने अमरीका के साथ शीत युद्ध किया और परमाणु होड़ में हिस्सा लिया. साथ ही वियतनाम और क्यूबा की क्रांतियों में भूमिका निभाई. जो देश बम, बन्दुक से नही टुटा उसे अमेरिका ने बस एक विचाधारा खड़ी कर पन्द्रह हिस्सों में तोड़ दिया. एक विचारधारा चेक गणराज्य और स्लोवाकिया को बाँट देती है क्योंकि चेक गणराज्य केंद्रीय व्यवस्था पर नियंत्रण रखना चाहता था, जबकि स्लोवाक ज्यादा स्वायत्तता चाहते थे.

हमेशा धार्मिक विचाधारा नये देश स्थापित कर लेती आई है. लेकिन धार्मिक विचारधाराओं से देश नहीं चलते देश चलते है राष्ट्रीयता समरसता की भावना, आम नागरिकों की जिम्मेदारियों और सरकारों की जवाबदेही से. एक विचारधारा एक समय में प्रासंगिक हो सकती हमेशा नहीं! यदि धार्मिक विचारधारों से देश चलते, फलते फूलते तो आज मध्य एशिया के देश सबसे खुशहाल होते.

एक विचाधारा  जो नक्सली के नाम से भी जानी जाती हैं और भारत में बीते चालीस सालों से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहे हैं. खुद को गर्व से माओवादी कहते है. भले ही आज चीन माओवादी अर्थशास्त्र के विपरीत हैं. जिसकी अब खुद चीन में ही उनकी अनदेखी की जा रही है. लेकिन इन लोगों के लिए माओ आज भी प्रासंगिक है क्यों? कारण लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अविश्वास सिर्फ इतना सोचते जितने से इनका पेट भर जाये और गरीब लोग हथियार उठा ले.

दुनिया में दो विचारधारा हमेशा से सबसे ज्यादा फली फूली एक सत्ता विरोध और दूसरी धार्मिक कट्टरता जिसने नये नेताओ को जन्म दिया, जिसने नये राष्ट्र बनाये, जिसने मानवता को अच्छे सपने दिखाकर आँखों में आंसू दिए. एक विचाधारा अरब में छठी शताब्दी में खड़ी हुई थी, जिसने देश के देश और एक बड़े को जनसमूह अपनी विचाधारा को मानने पर मजबूर किया. जिसका परिणाम आज भी अरब  देशों में हिंसा का और युद्ध जैसा माहौल है. इस हिंसा के दोनों पहलू में इस्लाम का नाम शामिल है कहीं जिहाद के नाम पर तो कहीं इस्लाम की हिफाजत के नाम पर. क्योंकि विचाधारा को जब आस्था से जोड़ दिया जाता है तो वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाती है.

अमेरिका और पश्चिंमी एशिया में इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) और अफ्रीका में बोको हरम की कारगुजारिओं की वजह से अमेरिका और दुसरे पश्चिमी देशों में मुस्लिम विरोधी विचारधारा में दिन-ब-दिन बढ़ोत्तरी हो रही है. इसे लोग धार्मिक टकराव का नाम दे रहे है दरअसल यह वैचारिक टकराव है बस युद्ध धर्म आस्था के नाम पर लड़ा जा रहा है. वैसे देखा जाये पश्चिमी देशों में मुस्लिम और इस्लाम विरोध का पुराना इतिहास रहा है. इस्लाम और पश्चिम की यह लड़ाई मनोवैज्ञानिक तरीके साथ-साथ मैदान -ए-जंग में भी लड़ी जाती रही है.

मात्र छ: लोग की विचारधारा मिलकर यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम’ (उल्फा) संगठन खड़ा कर लेती जो 1979 में ‘संप्रभु और समाजवादी असम’ की मांग कर हत्या कर रहे है. वर्षों से कुल 3 से 5 परिवार कश्मीर में लोगों के मन मस्तिक्ष से खेल रहे है. वर्षों पहले एक विचारधारा खालिस्तान के नाम से थी जिसका दंश दशकों तक झेला. यदि आज उमर खालिद को राजनितिक लालसा में प्रोत्साहन दिया गया मतलब एक विचारधारा को राजनैतिक मिटटी प्रदान कर अभिव्यक्ति की आजादी के पानी से सिंचित करना है. जो नेता आज वोट बेंक के लालच में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारों को समर्थन कर अखंड भारत का स्वांग भरते दिखाई देते है उन्हें ज्ञात होगा अखंड ही थे हम 1947 में एक विचारधारा को हमे बड़ा खंड देना था. उसके बाद भी अखंड ही थे हम लेकिन 62 में दूसरी विचाधारा को तिब्बत दे बैठे थे. यदि आज बस्तर और कश्मीर की आजादी मांगने वालों को सरकार विरोध समझकर समर्थन कर रहे है तो कल यह विचाधारा जब बड़ी होगी तब क्या होगा?

 

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