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आओ मिलकर वेद बचाएं

आदिकाल से ही श्रेष्ठ कार्यों में बाधा डालने वाले पैदा होते रहे हैं। ऋषियों के यज्ञों का विध्वंस करने वाले भी शास्त्रवेत्ता माने जाते थे। आज जब मैं लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हूँ, तो अनेक पण्डितम्मन्यों में कोलाहल मच रहा है। नानाविध बाधाएं खड़ी की जा रही हैं, निन्दा की जा रही है, व्यंग्य हो रहे हैं, लोगों को भ्रमित करके हमसे तोड़ा जा रहा है। कभी महर्षि दयानन्द जी ने सत्य ही कहा था कि विद्वानों के मतभेद ने ही सबको भ्रमजाल में डाल रखा है। मैं अपना विरोध करने वाले समस्त विद्वानों से विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ कि क्या आप यह स्वीकार नहीं करते कि वेद की प्रतिष्ठा को बचाना हम सबका साझा लक्ष्य होना चाहिए? क्या ब्राह्मण ग्रन्थों को समझे बिना संसार में कोई वेदों के विज्ञान को समझ सकता है? क्या सबसे बड़े वेद ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण के विज्ञान को समझना अनिवार्य नहीं है? यदि हाँ, तो कोई भी मेरा विरोधी विद्वान् मेरा विरोध करने के स्थान पर ऐतरेय ब्राह्मण, जिसमें कुल 285 खण्ड हैं, में से एक भी खण्ड का सुसंगत वैज्ञानिक व्याख्यान करने की कृपा करेगा? यदि कोई कहे कि यह हमारा विषय नहीं है, तब इस विषय से अनजान होकर भी मेरे कार्य में बाधा क्यों डाल रहे हैं? यदि किसी का विषय निरुक्त शास्त्र है, तो क्या कोई निरुक्त के दैवत काण्ड के विज्ञान को प्रकाशित करके संसार के विज्ञान को कुछ देने का प्रयास करेगा? यदि कोई व्याकरण का विद्वान् है, तो क्या कोई व्याकरण का प्रयोग वेद में करके वेद के विज्ञान को प्रकट करके आधुनिक विज्ञान को चुनौती देने का संकल्प लेगा? क्या वह महाभाष्य के ‘‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः’’ के द्वारा मांसाहार के समर्थन की प्रतीति वाले उदाहरण का उचित व तर्कपूर्ण समाधान करेगा? हमारे दर्शन के विद्वान् क्या वैशेषिक दर्शन के पदार्थ विज्ञान को संसार में प्रतिष्ठित करते हुए योग व ब्रह्मसूत्रों वा वेदों के द्वारा ईश्वर के कार्य करने की प्रक्रिया को विश्व में प्रकाशित करके वेद व ऋषियों का गौरव बढ़ाएंगे?

मेरे मित्रो! महर्षि दयानन्द जी ने महर्षि ब्रह्मा जी से लेकर महर्षि जैमिनी जी तक महर्षियों को प्रमाण माना था। क्या हममें से कोई महर्षि ब्रह्मा, महादेव शिव, भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, महर्षि सनत्कुमार, महर्षि भरद्वाज, महर्षि अगस्त्य, महर्षि भृगु, महर्षि वशिष्ठ आदि की कभी चर्चा भी करता है? क्या इनके विषय में कुछ जानता वा जानने का प्रयास भी करता है? क्यों हमने इन पूज्य भगवन्तों को कचरे के पात्र में फैंक दिया है? क्या हमने आर्य समाज को संकुचित करके एक सम्प्रदाय मात्र नहीं बना दिया है? क्या हम वेदों की ईश्वरीयता व सर्वविज्ञानमयता को वर्तमान वैज्ञानिक परिवेश में सिद्ध करने की क्षमता रखते हैं? यदि हममें यह क्षमता होती, तो आज हम लोग CBSE के पाठ्यक्रमों के गुरुकुल खोलकर गौरवान्वित नहीं हो रहे होते किंवा इनसे धन कमाने का लक्ष्य न बनाते। क्या यह मैकाले की शिक्षा पद्धति की दासता नहीं है? क्या विकल्प है, हमारे पास? विचारो, क्या अपनी सन्तान के तार्किक व वैज्ञानिक प्रश्नों का उत्तर आप शास्त्रों से दे सकते हैं? क्या विज्ञान के प्रवाह के समक्ष ऋषियों को खड़ा भी करने का साहस कर सकते हैं?

हममें से अनेक महानुभाव वर्तमान विज्ञान के साथ हमारे अनुसंधान की आलोचना भी करते हुए बाहरी जगत् व शरीर से दूर हटकर अन्दर देखने की बात करते हैं, वे देर रात तक इन्टरनेट चलाकर क्या परमात्मा का दर्शन करते हैं? वर्तमान विज्ञान की आलोचना करना सरल है परन्तु उसे समझकर उसकी समालोचना करते हुए उसके समकक्ष वा उससे श्रेष्ठ वैदिक विज्ञान संसार को देना दुष्कर है। संस्कृत भाषा की महिमा का वर्णन करना सरल है परन्तु इसे वैज्ञानिक ढंग से सिद्ध करना कठिन है। ऋषियों का जयघोष करना सरल है परन्तु उनके ऋषित्व वा विज्ञान को समझना जटिल है। शास्त्रों का अनुवाद करना सरल है परन्तु उनके गूढ़ विज्ञान को समझना अति कठिन है।

मेरे बन्धुओ व भगिनियो! मैंने इसी गम्भीर व भयावह परिस्थिति को अनुभव करके भीषण संकल्प लिया था। मैं वेद की ईश्वरीयता व विज्ञानमयता के साथ-2 महान् ऋषियों व देवों के महान् विज्ञान के द्वारा आधुनिक भौतिक विज्ञान को नई दिशा देने हेतु उद्यत होने वाला हूँ। मैं संस्कृत के विद्वानों को बताना चाहता हूँ कि मैं संस्कृत भाषा विशेषकर वैदिक संस्कृत को ब्रह्माण्ड की भाषा सिद्ध करने हेतु दृढ़संकल्प हूँ। मैं पौराणिक वेदपाठी वा आर्यसमाजी वेदपाठी ब्रह्मचारियों को बताना चाहता हूँ कि आज आपके वेदपाठ व वैदिक कर्मकाण्ड का भविष्य अंधकार में दिखाई देता है, उस अन्धकार को मिटाने हेतु मैं वेद ऋचाओं के वैज्ञानिक स्वरूप रूपी सूर्य के द्वारा मिटाने का साहस करने जा रहा हूँ। अहो! क्या यह सर्वहितकारी कार्य भी आपके अन्दर कष्ट उत्पन्न करने लगा? हमारे कुछ मित्र ‘ओम्’ की ध्वनि के ब्रह्माण्ड में होने का खण्डन करके भी ‘ओम्’ उपासक प्रसिद्ध हो रहे हैं? इन महानुभावों को छन्दशास्त्र एवं वैदिक ऋचाओं के विज्ञान का कुछ भी ज्ञान नहीं है पुनरपि वे मेरा विरोध करने में कभी प्रमाद नहीं करते। अहो! ऐसी सक्रियता यदि वेद को समझने में दिखाते, तो आर्य समाज अथवा वेद का कितना हित होता। कुछ महानुभाव तो इतने बुद्धिमान् हैं, कि स्वयं कुछ न लिखकर अपने भक्तों से मेरे विरुद्ध लिखवाते हैं। वे विचारते हैं कि किसी को इसका बोध नहीं होगा। वे भक्त भी स्वयं के विवेक का प्रयोग नहीं करके त्वरित ही लिख बैठते हैं। इस ईर्ष्या, द्वेष के कारण ही आर्य समाज एवं वेद की यह अधोगति हुई है। अहो! विचारो, कहाँ जा रहे हो? गायत्री मंत्र को मंत्र न मानने वाले भी मैंने सुने हैं। तो कोई भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण एवं महावीर हनुमान् जैसे महामानवों की अवमानना करने में ही अपना पाण्डित्य मान रहे हैं?

अहो! मेरे आर्यो! क्या हो गया है, आपको? मेरा विरोध करते-2 ‘ओम्’ व ‘वेद’ का भी विरोध करने लग गये। यदि आप मुझसे श्रेष्ठ वैदिक विज्ञान दे सकते हैं, तब मैं आपका हृदय से स्वागत करूंगा। मैं चाहूंगा कि आप भारत को बौद्धिक दासता से मुक्त करने का संकल्प लें। भारत को विदेशी शिक्षा से मुक्त करके वैदिक विज्ञान की शिक्षा देने की योजना बनाएं। वेदादि शास्त्रों के विमल वैज्ञानिक स्वरूप को संसार के समक्ष प्रकट करें। अपनी सन्तान को इसी शिक्षा को पढ़ायें। जब तक आप ऐसा नहीं करते, तब तक वेद वा ऋषियों की जय बोलना निरर्थक है। जागो मेरे मित्रो! द्वेष, ईर्ष्या को त्याग मेरे इस महान् संकल्प में सहयोगी बनने का प्रयास करो। यदि सहयोगी न बन सको, तो विरोधी तो न बनो। मैं पौराणिक भाइयों से भी कहना चाहूँगा कि वे जिन महापुरुषों की मूर्तियों को पूज्य मानकर स्वयं को धन्य मान रहे हैं, उन महापुरुषों के वैज्ञानिक गौरव एवं विमल इतिहास व चरित्र की स्थापना करना मेरा ध्येय है। क्या आप मेरे इस ध्येय में मेरा साथ देंगे? मैं किसी को अपना विरोधी का प्रतिस्पर्धी नहीं मानता। मैं तो वेद, ऋषियों, देवों, देश तथा विश्वमानवता के वास्तविक कल्याण के लिए आप सबका सहयोग चाहता हूँ।

अग्निव्रत नेष्टिक

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