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आखिर क्यों खाली हुआ कश्मीर!!

अभी कुछ दिन पहले एक महोदय ने पूछा आप लोग कश्मीर पर इतना क्यों लिखते हो, तब हमने कहा था जो घाव ज्यादा गहरा हो वो ही सबसे ज्यादा दर्द करता हैं, कारण सैनिक द्रष्टि से प्रत्येक बार कश्मीर पर सफलता पाने के बावजूद भी हम राजनैतिक द्रष्टि से हर बार हारते रहे और खारे खून के आंसू आँखों से रिसते रहे| लेकिन जब हम सच के गहरे तल में जाकर देखते है कि 1947 में जिस राज्य का राजा हिन्दू हुआ करता था आज वहां हिन्दू प्रजा भी नजर नहीं आती क्योंकि शेष भारत की तरह इस क्षेत्र में भी हिन्दू समाज विभिन्न जातियों और उपजातियों में बंटा हुआ था | जनसँख्या की द्रष्टि से उसमें ब्राह्मण, राजपूत और हरिजन प्रमुख थे वैश्य तथा अन्य जातियां भी थोड़ी-बहुत संख्या में थी | ब्राह्मणों और राजपूतोंमें एक प्रकार की वैमनस्य की भावना भी थी| इसी का फायदा उठाते हुए शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के उन हिस्सों में जो हिन्दू जनसँख्या बाहुल था उसमें मुस्लिमों को बसने का आदेश दिया नतीजा बहु-प्रथा के कारण उनकी आबादी बढती चली गयी दूसरी और किश्तवाड़ और भद्रवाह की स्थानीय हिन्दू जनसँख्या उंच-नीच की जातिगत कारणों से धर्मपरिवर्तन कर कम होती चली गई| फलस्वरूप उधमपुर जिला समग्र रूप से हिन्दू-बाहुल था इसका पीरपंचाल के साथ लगने वाला यह उत्तरी भाग मुस्लिम बाहुल हो गया था शेख अब्दुल्ला की नीति कामयाब हो गयी थी सबसे पहले उसने इन मुस्लिम-बाहुल क्षेत्रों को जम्मू से काटने की योजना बनाते हुए जिलों के पुनर्गठन के नाम पर मुस्लिम जिले बना दिए जिनका प्रशासनिक केंद्र मुस्लिम इलाको में बना दिया था|
मुस्लिम समुदाय की हमेशा से एक नीति रही हैं कि वो पहले दुसरे समुदायों में जो उपेक्षित हैं, प्रताड़ित हैं, जिस पर जातिगत रूप से टिप्पणी या धार्मिक स्थलों से जिसका तिरस्कार किया जाता है उसे उसकी उपेक्षा का आभास करा अपने साथ करता है, और फिर धार्मिक रूप सामाजिक रूप से संपन्न समुदाय पर हथियारों के बल पर हमला करता हैं तब उसे अहसास होता है कि वो उपेक्षित लोग छोटी जाति के नही बल्कि हमारी धर्म संस्कृति की नीव थी| ठीक यही हाल कश्मीर में हुआ पहले उपेक्षित समुदाय खुद में मिलाया फिर कश्मीरी पंडितो पर हमला किया पंडित नेहरु खुद को कश्मीर का ठेकेदार समझते रहे जिस कारण वे कश्मीर के मसले पर शेख अब्दुल्ला के अतिरिक्त किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे और शेख अब्दुल्ला की द्रष्टि मुस्लिमों के हित और चिंतन तक सिमित थी| वरना उस समय भारत की सैनिक शक्ति पाकिस्तान से तीन गुना ज्यादा थी और पाकिस्तान की आंतरिक और आर्थिक स्थति भी भारत की अपेक्षा अधिक अस्त-व्यस्त थी| इसलिए यदि उस समय भारत ने लाहौर पर हमला किया होता तो पाकिस्तान को गिलगित समेत जम्मू-कश्मीर के पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों से पीछे हटने को विवश किया जा सकता था इस प्रकार कश्मीर की पूरी रियासत हिंदुस्तान के कब्जे में होती|
उस समय भारतीय शासकों को दो बाते ध्यान रखनी योग्य थी एक तो भारत-पाकिस्तान का बंटवारा जनसँख्या के आधार पर नहीं बल्कि धर्म के आधार पर हुआ था और धर्म किसी राजपरिवार की बपोती नहीं थी और फैसले धर्म को आधार रखकर लेने थे वो जनमानस के अंतर्मन की पुकार होती हैं अत: भारत सरकार को कश्मीर के हिन्दुओं के हित के कदम उठाने थे जबकि ऐसा नहीं हुआ और पाकिस्तान की और से आये कबीलाई लुटेरों ने राजनेताओं की अयोग्यता के कारण कश्मीर की संस्कृति और धर्म का मर्दन करते चले गये जो आजतक नहीं रुका| दूसरा संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए गोपालस्वामी आयंगर और शेख अब्दुल्ला को भेजा गया| आयंगर इस कार्य के लिए अयोग्य सिद्ध हुए | उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और कश्मीर समस्या का कोई ज्ञान नहीं था, और शेख अब्दुल्ला के लिए कश्मीर से पहले उसका मजहब था जबकि इस काम के लिए न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे लेकिन पटेल का करीबी होने के कारण इस प्रखर राष्ट्रवादी का टिकट काट दिया गया| और कश्मीर समस्या के साथ-साथ लाखों हिन्दुओं का भविष्य भी संयुक्तराष्ट्रसंघ के साथ पाकिस्तानी मुस्लिमों की तलवार की धार में अटक गया ….प्रस्तुत आंकड़े बलराज मधोक की पुस्तक “कश्मीर जीत में हार” के आधार पर|

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