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आखिर गलती किसकी है?

एक कहावत है आगे कुआँ पीछे खाई हाल ही में यह कहावत इस्लामिक मुल्क लेबनान में चरित्रार्थ होती दिखी। लेबनान की राजधानी बेरूत में कुछ समय पहले सेंकडों लड़कियां ने आईएस के आतंकियों से जान और मान बचाकर शरण ली थी। किन्तु वहां के आतंकियों से न बच सकी और 10 से 19 वर्ष की साल की ये करीब 400 लड़कियां लेबनान के आतंकी गुटों की हवस मिटाने का साधन मात्र बनकर रह गई हैं। उनके साथ यौन दासी की तरह व्यवहार किया जा रहा है। इस सबसे डरे सहमे कुछ के माता-पिता तो उनका बाल विवाह तक कर रहे है ताकि उन दरिंदों से उनकी बेटियां बच जाये।

इस्लामिक मुल्कों से ऐसी खबरें आना आम बात है। ये ना पहली खबर है और न ही आंखिरी। क्योंकि इससे पहले भी मानवाधिकार मामलों पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस्लामिक आतंकियों की शिकार यजीदी समुदाय की बच्चियों और महिलाओं पर एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें कहा गया था कि बंदी बनाई गई यजीदी लड़कियों में 10 से 12 साल की लड़कियां भी हैं। जिनका यौन शोषण किया गया और उन्हें सिगरेट के दामों बेचा गया तथा सीरिया और इराक में इन लड़कियों का आईएस आतंकियों और उनके समर्थकों के बीच तोहफे के तौर पर लेन देन भी हुआ। कई बार वे एक व्यक्ति से दूसरे के पास भेजी जाती रहीं। इन लड़कियों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए भी मजबूर किया गया।

संस्था के अनुसार करीब 5000 से अधिक बंधक बनाई उन यजीदी महिलाओं और बच्चियों के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं थी। इन्हें सेक्स गुलाम के तौर पर बेचा गया, जहां रेप, गुलामी और प्रताड़ना ही इनकी जिंदगी थी। संस्था के सलाहकार डोनाटेला रोवेरा ने तो यहाँ तक बताया था कि इस सबसे यजीदी महिलाओं और लड़कियों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। बलात्कार के डर से कई लड़कियों ने आत्महत्या तक कर ली थी।

आतंकियों के चंगुल से बची यजीदी मूल की एक लड़की लामिया की कहानी तो इतनी दर्दनाक है कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाये। लामिया को जब आतंकी उठाकर ले गये तो उस रात उसके साथ 40 आतंकियों ने गैंग रेप किया और फिर बेच दिया गया। उस पर क्रूरता के साथ उसे आत्मघाती हमलावर बनने को मजबूर किया गया। जब-जब लामिया ने भागने की कोशिश की तो उसे पकड़कर मौसुल की शरिया अदालत में मौलानाओं के सामने पेश किया गया जहाँ उसे मारने और एक पैर काटने का फैसला सुनाया गया। ऐसे ही एक दूसरी 17 साल की यजीदी लड़की यास्मीन तो बार-बार रेप और यौन शोषण से इतनी खौफजदा हो गई और उसने शिविर के भीतर ही अपने ऊपर गैसोलीन पदार्थ डालकर खुद को जला लिया था कि जलने के बाद वह बदसूरत हो जाएगी और इसके चलते आईएस लड़ाके उसका फिर से बलात्काबर नहीं करेंगे।

मानवता के द्रष्टिकोण से देखा जाये इस्लामिक देशों में ऐसे जघन्य अपराध कई शताब्दियों से जारी है, न मध्यकाल में इनके खिलाफ कोई खड़ा हुआ और न आज इस कारण इस बर्बरता को एक किस्म से स्वीकार सा कर लिया गया। जबकि आज की आधुनिक दुनिया में जब जहाँ कोई अपराध होता है तो उसका विश्लेषण किया जाता है। अपराधी को यह सोच कहाँ मिली, उसका उद्देश्य, उसकी मानसिकता आदि पर तथ्य सामने रखे जाते है। किन्तु इस्लाम के अन्दर से जब ऐसी घटनाएँ सामने आती है तो महज इन्हें चरमपंथ से जोड़कर या भटके हुए लोग बताकर खारिज कर दिया जाता है।

आखिर आतंकी ऐसा क्यों करते है इन्हें ऐसा करने का आदेश कौन देता है यह सवाल सार्वजनिक रूप से पूछे भी नहीं जा सकते न इनका विश्लेषण किया जा सकता। हाँ इस सवाल का उत्तर पिछले कुछ समय पहले मिस्र के मशहूर अल-अजहर यूनिवर्सिटी की एक महिला प्रोफेसर सउद सालेह ने दिया था। सउद सालेह ने मिस्र के स्थानीय टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में इस सवाल का ईमानदार जवाब देते हुए कहा था कि अल्लाह मुस्लिमों को अधिकार देता है कि वह गैर मुस्लिम महिलाओं का रेप कर सकें। गैर मुस्लिमों को सबक सिखाने के लिए खुदा ने यह अधिकार मुस्लिमों को दिया है।

सालेह ने आगे इस साक्षात्कार में कहा कि मुस्लिम मर्दों को गुलाम महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाने का अधिकार है, इसमें कुछ गलत नहीं है। क्योंकि इस्लाम में मुस्लिम मर्दों को गैर मुस्लिम महिलाओं के साथ संबंध बनाने की छूट दी गई है। सालेह यही नहीं रुकी बल्कि उसनें आगे ये भी कहा था कि इजरायल महिलाओं को गुलाम बनाने और उनके साथ रेप करने में कुछ भी गलत नहीं हैं, मुस्लिम मर्द अगर ऐसा करते हैं तो यह स्वीकार्य है और इसे बढ़ावा देना चाहिए। इसी तरह युद्ध में बंधक बनाई गईं महिला कैदियों को सबक सिखाने के लिए भी ऐसा किया जा सकता है। पराजित सेना की महिलाएं विजेताओं की गुलाम होती हैं। विजयी मुस्लिम योद्धाओं को अधिकार है कि बंधक महिलाओं के साथ कुछ भी करने की खुली है। हालंकि सालेह के इस अंसवेदनशील बयान की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हुई थी दुनिया भर के प्रोफेसर और शिक्षाविदों ने उनके बयान की आलोचना की थी। किन्तु एक छुपा रहस्य बाहर आ गया था। कुछ लोगों ने कहा था कि सालेह ने बस वह बोला जो इस्लाम के अन्दर सिखाया जाता रहा है। अब यदि ऐसा है तो फिर इसमें आतंकियों का कोई दोष नहीं है। बस उन्हें जो सिखाया जाता वो सिर्फ उसे अंजाम देते है और यदि ऐसा है तो आखिर गलती किसकी है और इन अपराध जिम्मेदार कौन है और उसे कब सामने लाया जायेगा?

लेख राजीव चौधरी 

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