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आदर्श गुरु स्वामी विरजानन्द और आदर्श शिष्य स्वामी दयानन्द

Apr 19 • Uncategorized • 453 Views • No Comments

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आदर्श मनुष्य का निर्माण आदर्श माता, पिता और आचार्य करते हैं। ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि वह सन्तान भाग्यशाली होती है जिसके माता, पिता और आचार्य धार्मिक होते हैं।  धार्मिक होने का अर्थ है कि जिन्हें वेद व वेद परम्पराओं का ज्ञान होता है। ऋषि दयानन्द भाग्यशाली थे कि उन्हें धार्मिक माता-पिता मिले। उनके जन्म व उसके बाद माता-पिता ने उन्हें धार्मिक संस्कार दिये। पिता कर्षनजी तिवारी पौराणिक ब्राह्मण थे अतः वह उन्हें पौराणिक कृत्य मूर्तिपूजा आदि करने के लिए प्रेरित करते थे। स्वामी दयानन्द जी की आयु का चौहहवां वर्ष था। शिवरात्रि के पर्व पर पिता ने अपने पुत्र को शिव जी की पौराणिक कथा सुनाई और उन्हें शिवरात्रि का व्रत रखने के लिए प्रेरित किया। कथा के प्रभाव से बालक मूलशंकर वा स्वामी दयानन्द व्रत उपवास रखने को सहमत हो गये। उन्होंने व्रत रखा परन्तु रात्रि को शिव मन्दिर में जागरण करते हुए मन्दिर में बिलों से कुछ चूहे बाहर निकले और शिव की पिण्डी के निकट आकर उस पर भक्तों द्वारा चढ़ाये गये अन्न आदि पदार्थो को खाने लगे। यह देखकर स्वामी दयानन्द का बाल मन आहत हुआ। उन्हें विचार आया कि शिव तो सर्व शक्तिमान हैं। वह ऐसा क्यों हो दे रहे हैं। वह अपने ऊपर से उन चूहों को भगा क्यों नहीं रहे हैं। मनुष्य के शरीर पर मक्खी या मच्छर भी बैठे तो वह उसे उड़ाकर भगा देता है। शिव तो मनुष्यों से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं फिर वह असमर्थता का परिचय क्यों दे रहे हैं। वास्तविकता यह है कि मनुष्य में जो थोड़ी बहुत शक्ति है वह भी परमात्मारूपी शिव की ही दी हुई होती है। इस घटना से मूर्तिपूजा पर उनका विश्वास जाता रहा। पिता व मन्दिर के पुजारी कोई उनकी शंका व जिज्ञासा को दूर न कर सका। इसके बाद घर पर बहिन व चाचा की मृत्यु से उनको वैराग्य हो गया। माता-पिता को जब इन बातों का ज्ञान हुआ तो वह उनका विवाह करने लगे। स्वामी दयानन्द की विचार शक्ति असाधारण थी। वह बन्धनों में बन्धना नहीं चाहते थे। यदि वह बन्धनों में फसते तो वह ईश्वर साक्षात्कार और मोक्ष के साधनों का पालन न कर पाते। अतः सच्चे शिव की खोज व ज्ञान प्राप्ति जिससे जन्म मरण के बन्धन कटते हैं व मोक्ष प्राप्त होता है, उस अमृतत्व की खोज व प्राप्ति के लिए वह अपने जीवन के बाईसवें वर्ष में अपने माता-पिता व भाई बन्धुओं को छोड़ कर चले गये थे।

  स्वामी दयानन्द जी ने ईश्वर विषयक ज्ञान व उसकी प्राप्ति के साधनों की खोज व साधना को अपने जीवन मुख्य उद्देश्य बनाया और स्थान स्थान पर जाकर धार्मिक पुरुषों, विद्वानों, संन्यासियों से अपने मनोरथ को पूर्ण करने की चर्चा की और उनसे जो ज्ञान व साधना विषयक निर्देश मिल सकते थ,े उन्हें जाना व सीखा। उनका यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। वह उत्तराखण्ड के पर्वतों पर भी घूम घूम पर साधकों, विद्वानों व योगियों की खोज करते रहे और जहां जो ग्रन्थ व शास्त्र मिलता था उसका अध्ययन करते थे। संस्कृत आदि का अध्ययन उन्होंने पिता के घर पर रहकर ही किया था। अतः उन्हें संस्कृत के ग्रन्थ मिलने पर भी उन्हें पढ़ने व समझने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। यदि कहीं कुछ शंका व भ्रम होता था तो वह विद्वानों की शरण में जाकर उसका निवारण कर लेते होंगे, ऐसा अनुमान होता है। इस प्रकार से उन्होंने अनेक योगियों व विद्वानों की संगति की और ज्ञान प्राप्त करने सहित योग साधनों का अभ्यास किया। शास्त्रों का ज्ञान भी उनको प्राप्त हुआ। उनको अपने एक संन्यासी गुरु से ज्ञात हुआ था कि मथुरा के प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती उनको विद्या दान देकर उनकी सभी शंकाओं का निवारण करा सकते है और उन्हें ईश्वर साक्षात्कार सहित मोक्ष प्राप्ति के लिए उचित मार्गदर्शन कर सकते हैं। अतः सन् 1857 की देश को आजाद करने की प्रथम क्रान्ति के बाद देश में कुछ शान्ति होने पर स्वामी दयानन्द मथुरा पहुंचे और स्वामी विरजानन्द जी से अध्ययन कराने की प्रार्थना की। यह सन् 1860 का वर्ष था। इस समय स्वामी दयानन्द जी की आयु लगभग 35 वर्ष थी। इस आयु में भी एक बालक की भांति उन्होंने गुरु विरजानन्द जी की सेवा करते हुए संस्कृत भाषा की आर्ष व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य व निरुक्त पद्धति का अध्ययन किया। संस्कृत की विलुप्त अष्टाध्यायी-महाभाष्य पद्धति को पुनर्जीवित करने का श्रेय भी स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी को ही है। यदि स्वामी दयानन्द जी को गुरु विरजानन्द जी न मिले होते तो उन्होंने अपने जीवन में देश व समाज उन्नति के जो कार्य किये वह सम्पन्न न किये जा सकते। देश उनके किये योगदान से वंचित रहता। इस कारण स्वामी दयानन्द को उच्च कोटि का ज्ञान देकर उन्हें योग्यतम वेदाचार्य व विद्वान बनाने का श्रेय स्वामी विरजानन्द जी को ही है। स्वामी दयानन्द के निर्माण में गुरू विरजानन्द जी का योगदान निर्विवाद है। स्वामी दयानन्द का अधिकांश समय अपने गुरु के सान्निध्य में ही व्यतीत होता था अतः वह पढ़ाई से बचे समय में अनेक शास्त्रीय समस्याओं व उनसे संबंधित शंकाओं व जिज्ञासाओं का समाधान करते कराते थे। स्वामी दयानन्द की योग्यता को समझकर स्वामी विरजानन्द भी आश्वस्त थे और वह मन ही मन देश व धर्म की उन्नति के अपने स्वप्न को पूरा होता अनुभव करने लगे थे। लगभग तीन वर्ष में स्वामी दयानन्द जी का अध्ययन पूरा हो गया। गुरु दक्षिणा का अवसर आया। स्वामी दयानन्द गुरुजी की प्रिय वस्तु लौंग लेकर उनके समीप पहुंचे और उसे गुरू जी को भेंट की। स्वामी विरजानन्द जी को देश की दुर्दशा व वैदिक धर्म व संस्कृति के पतन व उसके कारणों का पूर्ण ज्ञान था। वह स्वामी दयानन्द से इस विषय में पूर्व चर्चा कर चुके थे। उन्होंने स्वामी दयानन्द को अपनी पीड़ा से परिचित कराया और कहा कि वह चाहते हैं कि गुरु दक्षिणा में वह उन्हें वचन दें कि वह वेद, वैदिक धर्म व आर्य संस्कृति का पुनरुद्धार करेंगे। स्वामी दयानन्द जी ने अपने गुरु को वचन दिया और वहां से प्रस्थान कर गये। उसके बाद का उनका जीवन चिन्तन मनन कर वेद प्रचार की योजना बनाने व उसे क्रियात्मक रूप देने में व्यतीत हुआ।

  स्वामी दयानन्द ने कुछ समय आगरा में निवास कर अपनी धर्म प्रचार योजना को अन्तिम रूप दिया और आगरा में प्रवचन व व्याख्यान आदि भी दिये। उसके बाद उन्होंने देश भर में घूम कर वेद व धर्म विषयक अनेक प्रवचन व व्याख्यान दिये। उनके प्रवचनों में विद्या व अविद्या का समग्रता से प्रकाश किया जाता था। वह मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, छूआछूत, सामाजिक असमानता आदि का खण्डन करते थे और इसके साथ ही स्त्री पुरुष दोनों की समानता के पक्षधर थे। उन्होंने सबको समान व निःशुल्क शिक्षा दिये जाने का समर्थन किया। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के भी वह समर्थक थे। स्वामी जी ने समाज में विद्यमान सभी प्रकार के अन्धविश्वासों का विरोध किया और उन्हें धर्म के मूल ग्रन्थ वेदों के विरुद्ध सिद्ध किया। महाभारत के बाद स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था। हमारे सभी व अधिकांश पौराणिक विद्वान वेदों के यथार्थ स्वरूप व मंत्रों के अर्थों को भूल चुके थे। स्वामी जी ने यजुर्वेद 26/2 मन्त्र को प्रस्तुत कर सबका वेदाध्ययन करने का अधिकार सिद्ध किया। स्वामी जी की धार्मिक सभाओं वा व्याख्यानों सभी प्रकार के बन्धु व्याख्यान सुनने आते थे और उनसे किसी प्रकार का पक्षपात व भेदभाव नहीं किया जाता था। स्वामी दयानन्द जी के समय में वेद व उनके यथार्थ अर्थ लुप्त हो चुके थे। स्वामी जी ने वेदों की मूल संहिताओं की खोज की व उन्हें प्राप्त किया। उनकी प्रामाणिकता की परीक्षा की और उसके बाद उन्होंने 16 नवम्बर, सन् 1869 को काशी के पण्डितों से मूर्तिपूजा के वेद विहित होने पर शास्त्रार्थ किया। मूर्तिपूजा के पक्षधर पौराणिक विद्वान मूर्तिपूजा को वेद विहित सिद्ध नहीं कर सके। आज भी स्थिति यही है कि मूर्तिपूजा वेद विहित न होकर वेद विरुद्ध है। वेद ईश्वर के निराकार व सर्वव्यापक स्वरूप को स्वीकार करते हैं। वेद अवतारवाद के सिद्धान्त के भी विरुद्ध है अर्थात् वेदों से ईश्वर के अवतार लेने का समर्थन नहीं होता।

 स्वामी जी के विचारोत्तेजक व्याख्यानों को सुनकर क्या विद्वान और क्या साधारण जन सभी मूर्तिपूजा का त्याग करने लगे और अपनी मूतिर्यों को नदियों में प्रवाहित करने लगे। इससे कुपित होकर अनेक पौराणिकों ने उनके विरुद्ध षडयन्त्र किये और उनके प्राणों पर आघात किये। विद्वानों का अनुमान है कि लगभग 18 बार स्वामी दयानन्द जी को विष देकर मारने का षडयन्त्र किया गया। मई, 1883 में जोधपुर प्रवास में भी उन्हें विष ही दिया गया था जिसके कारण 30 अक्तूबर, सन् 1883 को अजमेर उनका देहावसान हुआ। स्वामी जी ने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि, पंचमहायज्ञविधि, गोकरूणानिधि, व्यवहारभानु सहित वेदों पर संस्कृत व हिन्दी में भाष्य भी किया है। यजुर्वेद पर उनका भाष्य पूर्ण हुआ और वह सर्वत्र सुलभ है। ऋग्वेद पर वह आंशिक, लगभग आधे भाग का, भाष्य ही कर पाये थे। शेष भाग सहित सामवेद व अथर्ववेद का भाष्य उनके शिष्य अनेक विद्वानों ने पूर्ण किया। यदि स्वामी दयानन्द को कुछ वर्ष का समय और मिलता तो वह चारों वेदों का पूर्ण भाष्य स्वयं कर जाते। इसे हम मानव जाति का हतभाग्य ही मानते हैं। स्वामी दयानन्द जी के ग्रन्थों के कारण देश में चहुंओर जागृति व जनजागरण हुआ। देश को आजादी का सूत्र, मन्त्र व विचार देने वाले भी स्वामी दयानन्द ही थे। सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में उन्होंने स्वराज्य को सर्वोपरि उत्तम बताया है और विदेशी राज्य को माता-पिता के समान कृपा, न्याय व दया से युक्त होने पर भी स्वराज्य की तुलना में हेय बताया है। स्वामी दयानन्द ने 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। आज पूरे विश्व में आर्यसमाज की शाखायें विद्यमान हैं और करोड़ों लोग वेद व स्वामी दयानन्द द्वारा प्रचारित वेद धर्म के सिद्धान्तों का पालन करते हैं। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के अनुयायी सन्ध्या व अग्निहोत्र सहित पंच महायज्ञों का पालन भी अपने दैनन्दिन जीवन में करते हैं। सभी आर्य सत्यार्थप्रकाश व वेद आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय भी करते हैं। इससे अविद्या का नाश हुआ है। सभी मतों में अविद्यायुक्त मान्यतायें व सिद्धान्त विद्यमान हैं। इसका प्रकाश व दिग्दर्शन भी स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में कराया है। इसका उद्देश्य लोगों को सत्य को जानने में सहायता करने सहित सत्य को स्वीकार करने के लिए किया गया है।

 महाभारतकाल के बाद स्वामी विरजानन्द पहले ऐसे गुरु हुए जिन्होंने वेदों के पुनरुद्धार सहित सर्वश्रेष्ठ वैदिक धर्म व आर्य संस्कृति को विश्व का प्रमुख व एकमात्र धर्म बनाने व प्रचलित करने कराने का स्वप्न देखा था। वेद ईश्वरीय ज्ञान है व सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद अविद्या से रहित हैं और पूर्ण धर्म ग्रन्थ हैं जिनमें सभी सत्य विद्याओं का बीज रूप में समावेश है। इसके विपरीत सभी मतों व पन्थों के धर्मग्रन्थों में अविद्यायुक्त अनेकानेक बातें, किस्से कहानियां व सिद्धान्त विद्यमान हैं जिससे देश व विश्व में अशान्ति व लड़ाई झगड़े होने के साथ मनुष्यों की लौकिक व पारलौकिक उन्नति भी बाधित होती है। गुरु विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द जैसा योग्यतम शिष्य तैयार किया। उनके समान आदर्श शिष्य उनसे पूर्व व पश्चात उत्पन्न नहीं हुआ। हां, स्वामी दयानन्द जी के अनेक शिष्यों ने उनके अनुरूप जीवन व्यतीत करने के पुरजोर प्रयत्न किये हैं। उन सबके जीवन भी आदर्श ही हैं। स्वामी दयानन्द और उनके गुरु के जीवन पर दृष्टि डालने पर गुरु विरजानन्द अपूर्व आदर्श गुरु सिद्ध होते हैं। स्वामी दयानन्द ने अपने गुरू के स्वप्नों को साकार करने के लिए अपने जीवन का एक एक क्षण व्यतीत किया और देश को सन्मार्ग पर आगे बढ़ाया जिस पर चलकर देश का अनन्त उपकार हुआ। इस दृष्टि से स्वामी दयानन्द आदर्श शिष्य हैं। हम आदर्श गुरु विरजानन्द जी और उनके व देश के सर्वश्रेष्ठ आदर्श शिष्य के रूप में स्वामी दयानन्द को हृदय से नमन करते हैं। स्वामी दयानन्द जी आदर्श शिष्य होने के साथ विश्व के सर्वोत्तम गुरू के आसन पर भी प्रतिष्ठित है। हम अपने अनुभव से यह भी निवेदन करते हैं कि विश्व का अन्तिम वैज्ञानिक व ज्ञान से पूर्ण धर्म वेद ही होगा। हमें इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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