आर्यसमाज द्वारा दलितोद्धार का प्रेरणादायक प्रसंग

Aug 19 • Samaj and the Society • 710 Views • No Comments

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श्योराज सिंह बेचैन का जन्म चमार दलित परिवार में हुआ था। बचपन में पिता का साया सर से उठ गया। माता ने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेले पिता ने पढ़ने लिखने में रूचि रखने वाले श्योराज की पुस्तकें जला दी। विषम परिस्थितियों में श्योराज सिंह ने जीवन में अत्यन्त गरीबी को झेलते हुए, मजदूरी करते करते कविताओं की रचना करना आरम्भ किया। आर्यसमाज के भजनोपदेशक उनके छोटे से गांव में उत्तर प्रदेश में प्रचार करने के लिए आते थे। उनके राष्ट्रवादी, समाज कल्याण एवं आध्यात्मिकता का सन्देश देने वाले भजनों से प्रेरणा लेकर श्योराज सिंह ने कवितायेँ लिखना आरम्भ किया। गांव के एक आर्यसमाजी शास्त्री ने जातिवाद की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर उनके पढ़ने लिखने का प्रबंध किया। स्वामी दयानन्द से प्रेरणा लेकर प्रगति की सीढियाँ चढ़ते हुए श्योराज सिंह को आज साहित्य जगत में लेखन के लिए साहित्य भूषण पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में प्रोफेसर है। वाणी प्रकाशन द्वारा आपकी आत्मकथा को प्रकाशित किया गया है।

आर्यसमाज ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक न जाने कितने होनहार लोगों का जीवन निर्माण किया हैं। आशा है स्वामी दयानन्द कि यह कल्याणकारी चेतना संसार का इसी प्रकार से कल्याण करती रहे।

मेरे बचपनकी कहानी सचमुच सकारात्मकता की कहानी है। मैं जब पांच वर्ष का था तो पिताजी की मृत्यु हो गई। उसके सदमे में मेरे दादा भी चल बसे। मैं दृष्टिहीन बाबा (दादाजी के भाई) के साथ रहता था। मां का पुनर्विवाह हुआ। हमारे सौतेले पिता का एक बेटा था। उसके साथ हमें पढ़ने स्कूल भेजा। थोड़े दिनों बाद उन्होंने स्कूल में जाकर पूछा कि बच्चे पढ़ाई में कैसे हैं तो अध्यापक ने कहा कि आपके बड़े बेटे (हमारा सौतेला भाई) में तो संभावना नहीं है, लेकिन छोटा बच्चा कुछ होनहार लगता है। इस पर ध्यान दीजिए। अध्यापक की बात का हमारे पिताजी पर उल्टा ही असर हुआ। उन्होंने हमारी किताबें छीनी, पट्‌टी फोड़ दी। हमारी मां उनसे किताबें लेने की कोशिश करती रहीं, लेकिन उन्होंने किताबें सामने जल रहे चूल्हे में जला दीं। फिर कह दिया कि आज से कोई स्कूल नहीं जाएगा। मेरी आत्मकथा ‘मेरा बचपन, मेरे कंधों पर’ में मैंने सबकुछ बयान किया है। अब इसका दूसरा भाग ‘युद्धरत’ रहा है।
इस तरह हमारी पढ़ाई रुक गई, लेकिन पढ़ने की बेचैनी थी। हम कोशिश करते कि कोई किताब मिल जाए पढ़ने की। साथ के बच्चे थे, उनके पास जाकर कुछ सीखने की कोशिश की। उन्हें वह भी बुरा लगता था। हमारे सौतेले पिता के भाई जुआरी थे। बदायूं के पास नदरौली गांव की बात है। दीपावली का समय था और वे जुए में जीतकर आए थे। सारे पैसे जिसमें थे वह कुर्ता घर में टंगा था और वे बाहर गए थे। मैंने सोचा इतने रुपए में एक रुपया निकालकर किताब खरीदी जा सकती है। रुपया निकालकर मैं दुकान पर जाकर किताब देख रहा था कि पिताजी के बीच वाले भाई ने देख लिया। मैंने आशंका से किताब नहीं खरीदी और चला आया। घर लौटा तो देखा कि मेरी मां रास्ते पर कराह रही है, उसे बहुत मारा है। उन पर रुपया चुराने का इल्जाम लगाया गया था। मैंने सोचा सच्चाई बताई तो जो हालत मां की हुई है, उससे ज्यादा बुरी हालत मेरी हो जाएगी। बाद में पढ़ाई भी की। मैं सोचता रहा कि मां को यह बात बताऊंगा पर कभी बता नहीं पाया। मुझे इसका बड़ा अफसोस रहा। जब मां थीं, मुझे रोजगार नहीं मिल सका कि मैं बताऊं कि किताब के लिए चुराने का कितना अच्छा नतीजा निकला है। यह कसक लंबे समय बनी रही।
इस घटना के बाद मेरी मां मुझे दिल्ली ले आईं मेरी मौसी के यहां राजौरी गार्डन में। उनका एक बेटा पढ़ता था। मेरी मां मुझे वहां छोड़कर चली गईं। वहां मैंने काम करना शुरू किया। कुछ दिन तो घरों में अखबार डाले। कुछ दिन मुझे एक रुपए रोज पर होटल में बर्तन साफ करने का काम मिल गया था। उसी दौरान मुझे मौसाजी ने सब्जी मंडी जाकर नींबू लाकर बेचना सीखा दिया था। मैं राजौरी गार्डन में नींबू बेचता था। मौसाजी के पड़ोस में रिटायर्ड अफसर रहते थे। बुजुर्ग थे और दृष्टिहीन हो चुके थे। उनके बच्चे विदेश चले गए थे उन्होंने मौसाजी से कहा कि इस बच्चे को सामने के नगर निगम के स्कूल में दाखिला दिला दो। यह दोपहर तक नींबू बेचकर जाता है और यहां दोपहर की दूसरी पाली में इसका एडिमिशन हो जाएगा। मेरा एडमिशन हो गया, लेकिन पहले ही दिन मेरे नींबू नहीं बिके और मुझे लौटने में देर हो गई। मैं 12-12:30 तक जाता था, लेकिन उस दिन 1 बजे से भी ज्यादा वक्त हो गया। मौसाजी ने बहुत फटकारा कि स्कूल तुम्हारे मौसा का नहीं है। स्कूल हाथ से निकल गया। पढ़ने का मौका फिर रह गया।
वहीं एक सिख युगल था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम इस बच्चे को गोद लेना चाहते हैं। उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए कुछ पुरानी किताबें दीं और कहा कि हम इसे पढ़ाएंगे। मां को पता चला तो वे भागी-भागी आईं और मोह-ममता में हमें वहां से लेकर चली गईं। वे हमें जहां हम पैदा हुए थे नदरौली में छोड़कर वे अपने पति के घर चली गईं, क्योंकि वहां उनके दो बच्चे थे। गांव में फिर मजदूरी शुरू हो गई।
उस वक्त गांव में स्कूल बन रहा था। गांव में दो-तीन स्वतंत्रता सेनानी थे, जो स्कूल के लिए लोगों से श्रमदान करा रहे थे। मैं भी चला गया। काम के साथ-साथ मैं कुछ कविता गुनगुुना रहा था। शौक था तुकबंदी का। दो स्वतंत्रता सेनानी अध्यापकों ने सुना तो अलग ले गए और पूछा कि किसकी कविता गा रहे हो। मैंने कहा कि मन बहलाने के लिए खुद ही लिख लेता हूं, गा लेता हूं। चूंकि मैं दलित बच्चा था, कपड़े फटे थे, मजदूरी करता था तो कोई सोच नहीं सकता था कि मुझे अक्षर-ज्ञान होगा। उन्होंने पूछा क्या तुम पढ़े हुए हो? गांव के लोगों को खुशी हुई कि जिसका दादा दृष्टिहीन है, पिता है नहीं, मां नहीं है और कविता करता है, यह तो चमत्कार है। उन दिनों में एक राजमिस्त्री के साथ काम कर रहा था और सुबह थैला लेकर भागा-भागा जा रहा था तो एक अध्यापक खेत में फसल देख रहे थे। उन्होंने मुझे बुलाया और कहां तुम्हें हम पढ़ाएंगे। दया की कोई बात नहीं है। स्कूल के बाद तुम हमारे यहां काम कर लेना तो हम वह खर्च वसूल लेंगे। हमने फैसला ले लिया। यह जिंदगी के जुएं जैसा था। मैं वहां चला गया। सालभर वे काम कराते रहे। उसी साल सीधे छठी की परीक्षा दी तो मैं पास हो गया। मैंने पास के गांव जाकर स्कूल में परीक्षा दी थी तो वहां के प्रिंसिपल ने एक सरकारी योजना के तहत मुुझे सीधे आठवीं में प्रवेश दिला दिया। फिर मैं नौवीं और दसवीं कक्षा भी पास कर ली थी मैं दिल्ली गया। मेरे मौसेरे भाई ने एमबीबीएस कर लिया था। उन्होंने कहा दसवीं से कुछ होगा नहीं, तुम थोड़ा और पढ़ लो।
गांव लौटा तो जुलाई गुजर गया था। इंटर कॉलेज गया तो प्रिंसिपल ने कहा कि भई तुम लेट आए हो और मजबूरी है कि प्रवेश दे नहीं सकते। जब मैं निराश होकर लौट रहा था उन्होंने बुलवाकर कहा कि एक तरीका है। 15 अगस्त को हमारे यहां वाद-विवाद स्पर्द्धा होती है। यदि तुम वह जीत लो तो तुम्हें एडमिशन मिल जाएगा। हमारा मैनेजमेंट उसके लिए तैयार रहता है। मैंने चुनौती ली। बहुत बेचैनी थी। नींद नहीं रही थी। मेरे बाबा ने पूछा क्या बात है बेटा। मैंने समस्या बताई तो बोले, ‘रुपया-पैसे की बात तो है नहीं कि हार मान लो, ज्ञान की बात है पूरा दम लगा दो।’ मेरे मौसेरे भाई ने दिल्ली में कई दूतावासों में मेरा नाम लिखा दिया था। उन दिनों विदेशी दूतावास अपना प्रचार साहित्य मुफ्त भेजा करते थे। मैंने उसी में से रेफरेंस निकाल-निकालकर अपना भाषण तैयार किया। यह 1977 की बात होगी। लोग भाषण सुनकर चकित रह गए कि यह मजदूर बच्चा दुनियाभर के रेफरेंस दे रहा है। हम स्पर्द्धा जीत गए। हमारा एडमिशन हो गया।
बीए करने चंदौसी के लिए निकला तो किराए के पैसे तक नहीं थे। घर के बर्तन तक बहन की शादी में चले गए थे। मजदूरी से छोटी-सी लुटिया थी। सीधे बेचता तो चोरी का आरोप लगता इसलिए उसे तोड़कर बेचा और किराये की व्यवस्था हुई। फिर बीए किया। इतनी मुश्किल से मैंने शिक्षा पूरी की। एमए में हम ट्रेन से बिना टिकट जा रहे थे। चैकिंग शुरू हुई तो मैंने सोचा कि पकड़े गए तो पढ़ाई छूट जाएगी, इसलिए चलती ट्रेन से कूद गया। सिर फुट गया, कपड़े फट गए, किताबें फट गईं। मुझ पर गांव के आर्य समाज का बहुत असर था। उनके भजनों के असर से ही मैं कवि बना। गांव में दो शास्त्री भाई पक्के गांधीवादी थे। मैं जब लिखने लगा तो छोटे भाई कवि थे। वे उसकी समीक्षा करते, प्रोत्साहन देते। सफर कठिन और बहुत लंबा रहा। मेरे जीवन का मूल मंत्र रहा है शिक्षा। हर हाल में पढ़ना। पढ़ाई की ललक ऐसी थी कि मैं कोई भी जोखिम लेने को तैयार था, भूखा रहने को तैयार था, कुछ भी करने को राजी था। घर छोड़ना है, नाते-रिश्ते छोड़ने हैं। सबसे बड़ी बात है कि मेरी जीत हुई और बड़ी जीत हुई है। बीए करने दूसरे शहर जाना था तो किराये के पैसे नहीं थे। घर में मजदूरी करके खरीदी हुई एक लुटिया थी। उसे बेचकर किराये के पैसे जुटाए। मुझे कहा गया कि वाद-विवाद स्पर्द्धा जीत लो तो इंटर कॉलेज में प्रवेश मिल जाएगा। मुझे चिंता में देख मेरे बाबा ने कहा, ‘रुपए-पैसे की बात तो है नहीं कि हार मान लो। ज्ञान की बात है तो पूरा दम लगा दो।’

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