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आर्यों! वैदिक धर्म का पालन करो

Apr 23 • Arya Samaj • 996 Views • No Comments

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जिस समय महर्षि दयानन्द सरस्वती संसार में आए थे उस समय संसार की भारी दुर्दशा थी। नर-नारी धर्म-कर्म, वेद पठन-पाठन, संध्या-हवन, पुण्य-दान, जप-तप भूल चुके थे। यज्ञों में नर बलि, पशु बलि, पक्षी बलि दी जाती थी। स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था। बाल विवाह, अनमेल विवाह होते थे और कहीं सदाचार, ब्रह्मचर्य की शिक्षा नहीं दी जाती थी। उस समय लाखों बाल विधवाएं रोती थीं जिनमें से हजारों विधर्मी, ईसाई, मुसलमानों के घरों को बसा रही थीं। अर्थात् सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ था।

 नर-नारी कर्म प्रधानता का वैदिक सिद्धांत त्याग कर जन्म-जाति को बढ़ावा दे रहे थे। वेदों के स्थान पर पुराणों की कथा होती थी। सेवा करने वाले गरीब कमजोर व्यक्तियों को नीच समझकर ठुकराया जाता था। इसी का परिणाम था रोजाना राम, कृष्ण के वंशज हजारों की संख्या में ईसाई, मुसलमान बन रहे थे। उस समय विदेश यात्रा करना महापाप समझा जाता था। विधर्मी लोग हमें असभ्य-जंगली, महामूर्ख बताते थे। ईसाई पादरी वेदों को गडरियों के गीत बताते थे। भारतीयों में पाखण्डी लोगों ने यह धारणा बिठा दी थी कि वेदों को शंखासुर नाम का राक्षस पाताल लेकर चला गया है। अर्थात् वेद इस संसार में नहीं हैं।

 उस समय धर्म की हालत आटे के दीपक की तरह थी जिसे घर के अन्दर रख दें तो चूहे खा जाए और यदि बाहर रख दें तो कौए लेकर उड़ जाएं। उस समय भंगी-चमार के छूने पर, तेली के आगे आ जाने पर धर्म नष्ट होना माना जाता था। भारत के राजा लोग अज्ञानता वश आपस में लड़ते रहते थे। विदेशी अंग्रेज शासक हमारी इस फूट का भरपूर लाभ उठा रहे थे। उस समय वैदिक सभ्यता, संस्कृति, गौ-ब्राह्मणों का कोई रक्षक नहीं था अपितु सभी भक्षक बने हुए थे। ऐसे भयानक समय में महर्षि देव दयानन्द का इस देव भूमिमें प्रादुर्भाव हुआ था। स्वामी जी ने संसार के भले के लिए अपने भरे पूरे परिवार को छोड़ा और जीवन के सभी सुखों को त्याग कर मानवता की सेवा करने का बीड़ा उठाया। महर्षि दयानन्द ने स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से संन्यास की दीक्षा ली और योग सीखा। मथुरा में वेदों के प्रकाण्ड पंडित स्वामी विरजानन्द सरस्ती के पास जाकर उनकी सेवा की और वैदिक ज्ञान प्राप्त किया। शिक्षा पूर्ण होने पर दक्षिणा के रूप में गुरुदेव को संसार में वेद ज्ञान का प्रचार करने का वचन दिया, जिसे जीवन भर निभाया।

 स्वामी जी ने भारत में घूम-घूमकर वेद प्रचार किया और नर-नारियों को कर्म प्रधानता का महत्त्व समझाया। उन्होंने ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, अजन्मा, अनादि, अजर, अमर, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता बताया। मूर्ति पूजा को अज्ञानता का मूल बताकर मूर्ति पूजा से होने वाली हानियों का बोध कराया। उन्होंने नारी जाति और गऊ माता को पूज्य बताया तथा स्त्रियों व शूद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। स्वामी जी ने सबसे पहले स्वराज्य का मंत्र भारतवासियों को दिया और विदेशी राज्य महादुखदायी बताया। उन्होंने भारत के सभी राजाओं को मिलकर चलने और अपना एक नेता बनाने के लिए प्रेरित किया। सन् 1857 ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम महर्षि दयानन्द महाराज के प्रयासों का ही सुफल था। स्वामी जी ने राव युधिष्ठिर से मिलकर सर्व प्रथम रेवाड़ी ;हरियाणाद्ध में गौशाला की स्थापना कराई। स्वामी जी यह अच्छी तरह जानते थे कि गौ जैसा उपकारी पशु संसार में कोई नहीं है इसलिए उन्होंने गोकरुणानिधि शास्त्र की रचना करके गौ सेवा को परमधर्म बताया।

 स्वामी जी ने भारत के सभी मतों को मानने वाले विद्वानों को समझाया कि अगर तुम संसार का भला चाहते हो तो एक ईश्वर, एक धर्म, एक ग्रंथ, एक अभिवादन मानकर वेद ज्ञान का प्रचार करो। बड़े दुःख के साथ लिखना पड़ता है। उन स्वार्थी, दम्भी लोगों ने स्वामी जी की सलाह नहीं मानी। स्वार्थी पाखण्डी लोगों ने उन पर गोबर फेंका, पत्थर बरसाए और उन्हें सत्रह बार विष पान कराया। किन्तु वे अपने धर्म पथ से विचलित नहीं हुए। अगर स्वामी दयानन्द जी इस धरती पर नहीं आते तो आज कोई भी वेद शास्त्रों की चर्चा करने वाला, राम, कृष्ण आदि महापुरुषों और ऋषियों मुनियों का नाम लेने वाला दुनिया में नजर नहीं आता। वास्तव में उन जैसा त्यागी-तपस्वी, वीर, साहसी, ईश्वर विश्वासी, वेदों का विद्वान् महाभारत काल के बाद कोई दूसरा व्यक्ति इस संसार में नहीं हुआ। वे वस्तुतः सच्चे युगनायक संन्यासी थे। उनका ऋण हम कभी नहीं चुका सकते।

 आर्यों! बड़े खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि महर्षि दयानन्द जी ने हमारे भले के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था। किन्तु हम उनकी शिक्षाओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं। महर्षि ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन पंच यज्ञ करने की शिक्षा दी थी। किन्तु हम पंच यज्ञों का करना-कराना भूल चुके हैं। अब तो यह स्थिति आ गई है कि आर्य समाज के भवनों में संन्यासी, विद्वानों, उपदेशकों को भी नहीं ठहरने दिया जाता। शहरों में आर्य समाज के भवनों में बरात घर बना दिए गए हैं और बनाए जा रहे हैं। बारात घरों में आए दिन बारातियों द्वारा हुड़दंग मचाने एवं शराबबाजी करने की खबरें समाचार पत्रों में छपती रहती हैं। महर्षि दयानन्द ने कर्णवास के राजा राव कर्मसिंह को रासलीला के नाम पर महापुरुषों का स्वांग भरने पर फटकार लगाई थी किन्तु आज आर्य समाज के उत्सवों में बाल-बालिकाओं को महापुरुषों के स्वांग भरने की खुली छूट दी जाने लगी है जो शर्म की बात है। स्वामी जी ने सह शिक्षा को घातक बताया था किन्तु अब आर्य समाज के विद्यालयों में सहशिक्षा दी जाती है। आर्य समाजों के पदाधिकारी कई स्थानों पर शराबी, मांसाहारी, बेईमान व्यक्ति बने हुए हैं जिन्हें वैदिक सिद्दांत का कोई ज्ञान नहीं है। आर्य समाजों और सभाओं में पदों और सम्पत्तियों के ऊपर मुकदमेंबाजी हो रही है जिससे आर्य समाज की प्रतिष्ठा मिट रही है। यह हमारे लिए शर्म की बात है।

 इस समय संसार में हजारों व्यक्ति वेद के विरु( मत-मतांतर चलाकर, ईश्वर की पूजा छुड़वाकर गुरुडम एवं पाखण्ड फैला रहे हैं। जिनमें से सैकड़ों पाखण्डी जेलों में बन्द हैं। इस समय चरित्रहीनता, भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं। जिससे सारा संसार दुखी है। अगर महर्षि दयानन्द को यह ज्ञात होता कि हम इतने स्वार्थी प्रमादी लोभी बन जायेंगे तो वे कदापि विषपान नहीं करते। पं. लेखराम ने कहा था-लेखनी का कार्य और शास्त्रार्थ बंद नहीं होने चाहिएं। स्वामी श्रद्धानन्द ने कहा था शुद्धि का कार्य कभी भी बंद नहीं होना चाहिए। आप ठण्डे दिल से विचार करें कि क्या हम उनकी बात मान रहे हैं? जो अपने आगे किसी को भी कुछ नहीं समझते। याद रखो यह धन यहीं पड़ा रह जाएगा। इस संसार में जो व्यक्ति निःस्वार्थ भावना से परोपकार एवं संसार की भलाई के काम करते हैं यह संसार उन्हीं की महिमा के गीत गाता है। अगर आप भी महान् बनना चाहते हैं और महर्षि दयानन्द महाराज के सच्चे शिष्य बनने का दम भरते हैं तो वेद प्रचार के लिए अच्छी तरह कमर कसकर कर्म क्षेत्र में कूद पड़ो।

अन्त में :-

‘‘आर्य कुमारो! अब तो जागो, आगे कदम बढ़ाओ तुम।

कहने का अब समय नहीं है, करके काम दिखाओ तुम।।

देश, धर्म के काम जो आए, उसे जवानी कहते हैं।

सारा जग खुश होकर गाए, उसे कहानी कहते हैं।।

जगत् गुरु ऋषि दयानन्द के, सपनों को साकार करो।

करो परस्पर प्रेम सज्जनों, वेदों का प्रचार करो।।

स्वामी श्रद्धानन्द बनो तुम, जग में नाम कमाओ तुम।।

लेखराम, गुरुदत्त बनो तुम, वैदिक नाद बजाओ तुम।

अगर नहीं जागोगे मित्रो, भारी दुःख उठाओगे।

हंसी उड़ाएगी फिर दुनियां, अज्ञानी कहलाओगे।।’’

-पं. नन्दलाल निर्भय, सिद्धांताचार्य

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