gokula jaat

आर्य क्षत्रिय परंपरा के अमर बलिदानी वीर गोकुला जाट

Jan 9 • Samaj and the Society • 1021 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading...

आर्य क्षत्रिय परंपरा के अमर बलिदानी वीर गोकुला जाट

(1 जनवरी को वीर गोकुल जाट के बलिदान दिवस पर प्रकाशित- डॉ विवेक आर्य)

आर्य धर्म की महान क्षत्रिय परम्परा को कौन नही जानता, एक ऐसी परम्परा जिसमें समय समय पर अनेकों शूरवीर सामने आये और कभी राष्ट्रभक्ति तो कभी धर्म के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए। इस महान क्षत्रिय परम्परा के शौर्य और वीरता के कारण ही भारत के सामने विश्व थर थर काँपता रहा है और आज भी जो भारत हमारे सामने है उसमे क्षत्रिय परम्परा के शूरवीरों का अहम योगदान माना जाता है।  इस परम्परा के अतर्गत पृथ्वीराज चौहान, महाराज शिवाजी, महाराणा प्रताप की शूरवीरता से तो आप सब परिचित ही है। परन्तु इनके अलावा और ऐसे असंख्य महावीर शूरवीर है।  जिन्होंने अपने शौर्य और पराक्रम से जन जन को प्रेरित किये रखा।  जिनके बारे में हमे पढ़ाया नही गया।  एक ऐसे ही एक महान शूरवीर गोकुल सिंह थे। जिसे इतिहासकार ‘गोकुला’ महान के नाम से परिचित करवाते है। गोकुल सिंह अथवा गोकुला सिनसिनी गाँव का सरदार था।  हिन्दू क्षत्रिय जाट व औरंगजेब की सेना में 10 मई 1666 को तिलपत में लड़ाई हुई।  लड़ाई में हिन्दू क्षत्रियों की विजय हुई।  इसके बाद मुगल शासन ने इस्लाम धर्म को बढावा दिया और किसानों पर कर बढ़ा दिया।  मगर गोकुला ने किसानों को संगठित किया और कर जमा करने से मना कर दिया।  गुस्साये औरंगजेब ने बहुत शक्तिशाली सेना भेजी  और गोकुला को बंदी बना लिया गया।  1जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया।  गोकुला के बलिदान ने मुगल शासन के खातमें की शुरुआत हुई थी।
सन 1666 का समय था जब औरंगजेब के अत्याचारोँ से हिँदू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी।  हिँदुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया।  मथुरा के सिनसिनी गाँव के सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया।  मुग़ल सैनिकों ने लूटमार से लेकर किसानों के ढोर-डंगर तक खोलने शुरू कर दिए और संघर्ष शुरू हो गया। मई 1669 मेँ धर्मपरायण हिन्दू  क्षत्रिय योद्धा गोकुला जाट और उसकी किसान सेना और औरंगजेब की अब्दुन्नवी के नेतृत्व में सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ।  अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर जाटोँ के सामने टिक ना पाई और सारे गाजर-मूली की तरह काट दिए गए।  मुगलोँ की सदाबद छावनी जला दी गई।  अब्दुन्नवी की चीखेँ दिल्ली की सल्तनत को भी सुनाई दी थी।  मुगलोँ की जलती छावनी के धुँए ने औरंगजेब को अंदर तक हिलाकर रख दिया।  औरंगजेब इसलिए भी डर गया था क्योँकि गोकुला की सेना मेँ जाटोँ के साथ गुर्जर, अहीर, ठाकुर, मेव इत्यादि भी थे। इस विजय ने मृतप्राय हिँदू समाज मेँ नए प्राण फूँक दिए। औरंगजेब ने सैफ शिकन खाँ को मथुरा का नया फौजदार नियुक्त किया और उसके साथ रदांदाज खान को गोकुल का सामना करने के लिए भेजा। लेकिन असफल रहने पर औरंगजेब ने महावीर गोकुला को संधि प्रस्ताव भेजा।  गोकुला ने औरंगजेब का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योँकि औरंगजेब कोई सत्ता या जागीरदारी के लिए नहीँ बल्कि धर्मरक्षा के लिए लङ रहा था और औरंगजेब के साथ संधि करने के बाद ये कार्य असंभव था। गोकुल ने औरंगजेब का उपहास उड़ाया।  अब औरंगजेब दिल्ली से चलकर खुद आया गोकुल से लङने के लिए। औरंगजेब ने मथुरा मेँ अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति हसन अली खान को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ मुरसान भेजा।  ग्रामीण रबी की बुवाई मेँ लगे थे तो हसन अली खाँ ने ने गोकुला की सेना की तीन गढियोँ/गाँवोँ रेवाङा, चंद्ररख और सरकरु पर सुबह के वक्त अचानक धावा बोला।  औरंगजेब की शाही तोपोँ के सामने किसान योद्धा अपने मामूली हथियारोँ के सहारे ज्यादा देर तक टिक ना पाए और जाटोँ की पराजय हुई।  इस जीत से उत्साहित औरंगजेब ने अब सीधा गोकुला से टकराने का फैसला किया। औरंगजेब के साथ उसके कई फौजदार और उसके गुलाम कुछ हिँदू राजा भी थे।  औरंगजेब की तोपोँ, धर्नुधरोँ, हाथियोँ से सुसज्जित विशाल सेना और गोकुला की किसानोँ की 20000 हजार की सेना मेँ तिलपत का भयंकर युद्ध छिङ गया। 4 दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारोँ के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारोँ से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पङ रही थी।  इस लङाई मेँ सिर्फ पुरुषोँ ने ही नहीँ बल्कि उनकी क्षत्राणियों ने भी पराक्रम दिखाया था।  मनूची नामक यूरोपिय इतिहासकार ने जाटोँ और उनकी चौधरानियोँ के पराक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “अपनी सुरक्षा के लिए ग्रामीण कंटीले झाडियों में छिप जाते या अपनी कमजोर गढ़ियों में शरण लेते, स्त्रियां भाले और तीर लेकर अपने पतियों के पीछे खड़ी हो जातीं।  जब पति अपने बंदूक को दाग चुका होता, पत्नी उसके हाथ में भाला थमा देती और स्वयं बंदूक को भरने लगती थी।  इस प्रकार वे उस समय तक रक्षा करते थे,जब तक कि वे युद्ध जारी रखने में बिल्कुल असमर्थ नहीं हो जाते थे। जब वे बिल्कुल ही लाचार हो जाते, तो अपनी पत्नियों और पुत्रियों को गरदनें काटने के बाद भूखे शेरों की तरह शत्रु की पंक्तियों पर टूट पड़ते थे और अपनी निश्शंक वीरता के बल पर अनेक बार युद्ध जीतने में सफल होते थे” . मुगल सेना इतने अत्याधुनिक हथियारोँ, तोपखाने और विशाल प्रशिक्षित संख्या बल के बावजूद जाटोँ से पार पाने मेँ असफल हो रही थी।  4 दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी तभी हसन अली खान के नेतृत्व मेँ 1 नई विशाल मुगलिया टुकङी आ गई और इस टुकङी के आते ही गोकुला की सेना हारने लगी। तिलपत की गढी की दीवारेँ भी शाही तोपोँ के वारोँ को और अधिक देर तक सह ना पाई और भरभराकर गिरने लगी।  युद्ध मेँ अपनी सेना को हारता देख औरतोँ, बहनोँ और बच्चियोँ ने भी अपने प्राण त्यागने शुरु कर दिए।  हजारोँ नारियोँ जौहर की पवित्र अग्नि मेँ खाक हो गई।  तिलपत के पत्तन के बाद गोकुला और उनके ताऊ उदय सिँह को 7 हजार साथियोँ सहित बंदी बना लिया गया। इन सभी को आगरा लाया गया।  लोहे की बेङियोँ मेँ सभी बंदियोँ को औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो औरंगजेब ने कहा ” जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत? ” अधिसंख्य धर्म-परायण जाटों ने एक सुर में कहा – ” बादशाह, अगर तेरे खुदा और रसूल का का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना।  ” गोकुल की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला तो हजारोँ चीत्कारोँ ने एक साथ आसमान को कोलाहल से कंपा दिया। बरछे से कटकर चबूतरे पर गिरकर फङकती हुई गोकुला की भुजा चीख-चीखकर अपने मेँ समाए हुए असीम पुरुषार्थ और बल की गवाही दे रही थी।  लोग जहाँ इस अमानवीयता पर काँप उठे थे वहीँ गोकुला का निडर और ओजपूर्ण चेहरा उनको हिँदुत्व की शक्ति का एहसास दिला रहा था . गोकुला ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बङे ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा कि दूसरा वार करो।  दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खङी जनता आंर्तनाद कर उठी और फिर गोकुला के शरीर के एक-एक जोङ काटे गए। गोकुला का सिर जब कटकर धरती माता की गोद मेँ गिरा तो धरती माँ भी खून के आंसू रोने लगी।  यही हाल उदय सिँह और बाकी बंदियोँ का भी किया गया।  गोकुला वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश, इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद, उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके, बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व व अतुलनीय है। भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो। वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन चला। 1जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया।  गोकुला के बलिदान ने मुगल शासन के खातमें की शुरुआत की। वीर छत्रसाल, गुरु गोविन्द सिंह, वीर शिवाजी, वीर दुर्गादास जैसे महान पराक्रमी आर्य क्षत्रियों की श्रेणी में शामिल वीर गोकुल का नाम सदा सदा के लिए अमर हो गया।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes