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आर्य शब्द पर वाद विवाद क्यों ?

Feb 22 • Arya Samaj • 729 Views • No Comments

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आर्य जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु गुणवाचक शब्द है

 

ओ3म इन्द्रं बर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम-।

अपध्नन्तो अराव्णः-।।। ऋग्वेद

ऋग्वेद में ईश्वर ऋषियें द्वारा आदेश देते है कि सम्पूर्ण्रा मानव जाति को आर्य अर्थात श्रेष्ट बनावो। पहले स्वंय आर्य बनो, तभी संसार को आर्य बना सकते हो।

आर्य समाज के संस्थापक युग पुरूष महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने आठारवीं शताब्दि में पुनः वेदों की ओर लौटाया, उन्होने कहा कि सृष्टि प्रारम्भ से महाभारत काल तक सम्पूर्ण मानव समाज एक निराकार ईश्वर की पूजा करता था और वैदिक धर्म के संस्कार संस्कृति व सभ्यता को अपनाता था।

महाभारत काल के वाद आर्य धर्म, आर्य संस्कृति, व आर्य सभ्यता, अवैदिक मार्ग पर भारतवासियों के चलने से आर्य शब्द अपवाद बनता गया। महर्षि दयानन्द जी ने एक सत्य समाज में रखा, उन्होने महाभारत काला के बाद विदेशियों के गुलाम व सामन्तशाहियों की शोषण वृति व अवैदिक मार्गको भारत का काल इतिहास बताया था। उन्होने अनादि काल से महाभारत काल तक का इतिहास समाज के सामने रखा, और अन्धकार युग से प्रकाशयुग की तरफ मानव समाज को लौटाया। आइये कुछ विचार करते है।

सृष्टि प्रारम्भ से महाभारत काल तक आर्यों का सांकेतिक इतिहास 

सृष्टि प्रारम्भ मे वेद रचित ऋषियों के पश्चात सबसे पहले आर्य राजा श्रीमान मनु जी हुए। मनु के सात पुत्र थे, जिनकी एक शाखा में आर्य भगीरथ, अंशुमान, दलीप और रघु आदि हुए, और दूसरी शाखा में सत्यवादी आर्य हरीशचन्द्र आदि हुए थे। वेवस्वतः आर्य राजा मनु के पश्चात तत्कालीन आर्य सूर्यवंश की 39 पीढिया बीत जाने के बाद आर्य मर्यादा पुरूष श्री राम आयोध्या में जन्म लेते है। मर्यादा पुरूषोत्तम आर्य श्रीराम के काल में तीन संस्कृति, का आगमन स्पष्ट देखा जा सकता है, एक आर्य संस्कृति द्वतीय वानर संस्कृति तृतीय राक्षस संस्कृति का आगमन शुरू हो गया था। प्रारम्भ में केवल एक ही वंश था, बाद में कालचक्र से विभिन्न संस्कृति फैलती गयी। विशेष बात यह है कि तीनो ही वैदिक संस्कृति को मानते थे। तीनो में ही वेदो के अध्यन की परम्परा थी। 39 पीड़ियों तक एक ही वंश का संसार में राज्य था।

श्रीराम के युग में स्पष्ट देखने में आता है कि तीन विचार धाराओं में जन्म ले लिया था। और तीनो संस्कृति के तीन केन्द्र बन गये थे। आर्य संस्कृति का केन्द्र अयोध्या था, वानर संस्कृति का केन्द्र किष्ककंधा था, और राक्षस संस्कृति का केन्द्र श्रीलंका में था। वानरो की पूछ होने की कल्पना हैं जब्कि बानर अयोध्या वासियों की तरह वैदिक संस्कारो पर चलते थे। वानर शब्द का अर्थ पूंछ वाले वानर नहीं है अपितु वनो में रहने के कारण वानर नाम पडा था। वैसे राक्षस भी मनुष्यों की तरह थे। आर्य समाज, तपस्या और वैदिक विद्या के अनुसार वर्णो और आश्रमों की मर्यादा का पालन करते थें और राक्षस लोग तो निश्चत रूप से खावो, पियो मौज उडावो, भोग वादि व स्वेच्छाचारी, संस्कृति व संस्कारो के प्रतीक थे। वानर संस्कृति दोनो के बीच की रही थी, किन्तु वानर संस्कृति का रूझान आर्य संस्कृति के तरफ था। और आर्य संस्कृति की उपेक्षा के कारण शन्नै शन्नै अनैतिकता की खाई मे गिरते गये, और आर्य नैतिकता के उच्च आदर्शों तक नहीं पहुंच पाये। आर्य संस्कृति व वानर संस्कृति यज्ञ प्रधान थी और राक्षस संस्कृति हिन्सा परायण थी। किन्तु तीनो समुदाय वेदो ंको ही धर्म मानते थे, और वैदिक संस्कारो पर चलते थे।

आर्यव्रत (भारत) में अन्धेर युग का प्रारम्भ

श्री आर्य मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम के पश्चात तीनो संस्कृति में केवल दो विचार धारायें आर्यव्रत में चलने लगी थी, आर्य और अनार्य, अर्थात देवता और राक्षस समुदाय का आपस में संर्घश प्रारम्भ हुआ, और दोनो ही समुदाय अपने को बचाने के लिये आपस मे युद्ध करने लगे। शन्नै शन्नै काल चक्र घूमता गया, और देव संस्कृति घटने लगी और राक्षस संस्कृति बढने लगी। महाभारत काल के एक हजार वर्ष पूर्व से आर्य संस्कृति में गिरावट आने लगी और राक्षस विचार धाराये पनपने लगी। और महाभारत काल के प्श्चात से आज विश्व में राक्षस प्रवर्ती चरम सीमा पर पहुंच गयी हैं आप स्वंय विचार कीजियेगा। आइए अब हम आर्य शब्द के अपवाद पर विचार करते है।

 उत्तराखण्ड में आर्य शब्द पर जातिवाद का अपवाद

देवभूमि उत्तराखण्ड में जातीवाद चरम सीमा पर हैं। और आर्य शब्द को अनुसूचित जाति का समझा जा रहा है। और जो भी नाम के आगे आर्य लगाता है, उसको छोटी जाति का समझा जा रहा है। क्योंकि देवभूमि उत्तराखण्ड पर भी राक्षस प्रवर्ती की विचार धारये होने के कारण। वेदों के ज्ञान के अभाव में, वैदिक संस्कारो के अभाव में, जातिवाद, छुआ-छूत, ऊच-नीच चरम सीमा पर अग्रसर हो रखा हैं फल स्वरूप् स्वंय को ऊंची जाति बतलाने वाले अधिकांश अपने मूल को ही नहीं जानते है, और अपने नाम के आगे काल्पनिक जाति शब्द लागा कर, अपने को ऊचा बताते है और आर्य शब्द व आर्य समाज संगठन को नीचा मानते है।

मै उत्तराखण्ड की ऊंची जाति वालो से आग्र करूंगा कि अपनी पन्द्रह बीस पीडियों की उत्पत्ति का इतिहास तो जानिये। आप पायेंगे कि जाति के आगे उपजाति मनुष्यों द्वारा बनाया गया है। बस यही नाम के पीछे कथित जाति वाचक शब्द सब अहंकार व समाज को बांटने की प्रक्रिया है। और अपने अपने को ऊंचा मानना, दूसरे गरीब को नीचा माना ही ईश्वर की दृष्टि में महापाप है।

धन्य हो महर्षि दयानन्द जी आपने सबको जगा दिया, आपने थोथी जातिवाद धर्मवाद, समाजवाद व राजनीतवाद को सम्पूर्ण भारत में एक तरफ से नकार दिया था और आर्य समाज वैचारिक क्रान्ती का संगठन खोलकर सदैव के लिये, ज्ञान का प्रकाश पुंज जला दिया। आर्य शब्द जाति वाचक नहीं है अपितु श्रेष्ट गुणवाचक हैं।

  भारत के इतिहास में आर्य जाति बाहर से आई एक सफेद झूठ है

पराधीन भारत में अंगेजो ने सर्व प्रथम यह समझा आर्य संगठन, सच्चा ईश्वर भक्त व धार्मिक संगठन व समाजवादी है। इसका प्रभाव भारत पर कम करना चहिए और आर्य समाजी बदल गये तो हमारी पश्चिमी संस्कृति भारत में फल फूल सकी है। इसलिये लार्ड मैकाले ने शिक्षा के कोषो मे यह गलत लिखवा दिया कि आर्य बाहर से आये थे और भारत पर काबिज हो गये। यह सफेद झूठ था। और भारत आजादी के बाद भी उस इतिहास के पन्नो को नही मिटा सका है।

आर्य अनार्य की परिभाषा

जो सच्चा ईश्वर भक्त अर्थात, निराकार, सर्वशाक्तिमान, सचिदानन्द स्वरूप ईश्वर के मानने वाला हो जो ईश्वरीय वाणी वेदों को मानने वाला हो, जो पंच महायज्ञ का अनुगामी हो जो सदैव सत्य की रक्षा करने मे तत्पर रहता हे, जे प्रत्येक धार्मिक, सामाजिक, राजनैति अन्धविश्वासों को नही मानता हो जो सदैव दूसरो के कष्टो को दूर करने में अग्रणी रहता हो जो पूर्वजो के सत्य मार्ग पर जीवन बिताता हो, वह आर्य है। और जो उक्त सभी तथ्यों को नहीं मानता हो वह अर्नाय है। यही सन्देश वेदो मे, आर्य ग्रन्थो में दिया गया है।

 

मानव समाज की सुखशान्ति का मार्ग केवल वैदिक मान्यताओ पर ही चलना है।

यह एक सच्चाई है, कि छ हजार वर्षों से हमने वैदिक धर्म की उपेक्षा करके, अपने अपने स्वार्थो को पूरा करने के लिये, अनेक मत मतान्तरो को बना कर अनैतिक चरम सीमा पार कर दी हैं और संसार मे अशान्ति, शत्रुता, अन्धविश्वास फैलाने में हम भारतीयों ने कोई कसर नहीं छोडी है। समाज मे अशान्ति का कारण व शीत युद्ध का शन्ने शन्ने  आगमन का कारण ही भविष्य में मानव सृष्टि के विनाश का कारण बनेगा। यदि हम अपने को ईश्वर भक्त कहते है तो हमे ईश्वरीय नियम, सृष्टि क्रमानुसार, वैज्ञानिक आधार पर धार्मिक, सामाजिक व स्वच्छ राजनीति को अपनाना ही होगा। और भारत में नाम के पीछे जातिवाचक शब्द को हटाना होगा। और प्रत्येक धार्मिक संगठन, विशेष करने आर्य समाज को इस जातिवाद के भयंकर कैंसर से मुक्ति अपने नाम के आगे उपजाति शब्द हटा कर एक नई पहल शुरू कर सकता है। आर्य संगठन को अब करवट लेनी ही पडेगी, क्योंकि समाज में तमाम बुराइयों को समाप्त करने में आर्यों को आगे आना ही होगा तथा अन्य समाज सुधार संगठन भी आगे आयें।

पं. उम्मेदसिंह विशारद

वैदिक प्रचारक

 

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