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आ गया 2018 अन्धविश्वास निरोधक वर्ष

‘‘बता तू कौन है, वरना तुझे जला कर भस्म कर दूंगा?’’ ओझा ने महिला की चोटी पकड़ कर जब उस से पूछा, तो वह दर्द के मारे चीख पड़ी, ‘‘बाबा, मुझे छोड़ दो।’’ महिला को दर्द से कराहते देख कर भी बाबा को उस पर जरा भी तरस नहीं आया। वह उसे सोटा मारने लगा, तो वह दर्द से चीखती हुई बेहोश होकर वहीं औंधे मुंह गिर पड़ी। तो सितम्बर, 2015 को गरिमा का 9 महीने के बेटे मयंक का अपहरण उसी की सगी बूआ सावित्री ने किया था, जो बेऔलाद थी। वह एक ओझा से अपना इलाज करा रही थी। बच्चे का अपहरण बलि के उद्देश्य से किया गया था। शायद यह दोनों खबर पढ़कर हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देगा क्या हम 21वीं सदी के भारत में जी रहे हैं?

अपने मन से पूछिए क्या यह धर्म है?

इस तरह की दुकान इस भारत देश में हर चार कदम पर धर्म के नाम पर चल रही है। किसी शहर में भूत उतारे जा रहे हैं किसी में काला जादू और ताबीज बन रहे हैं। कहीं संतान के नाम पर, कहीं मन्नत के नाम पर, कोई शनि देव से डरा हुआ है कोई सिरडी जाने के लिए बस ट्रेन में धूल फांक रहा है। कहीं-कहीं तो अंधविश्वास का ऐसा तांडव देखने को मिलता है कि आम आदमी की रूह कांप जाए। किस प्रकार कदम-कदम पर पंडित और पुरोहित अपना जाल बिछाए बैठे हैं, अज्ञानियों को पकड़ने के लिए। किस प्रकार लोग भगवान को बेच रहे हैं। हजार दो हजार रुपये के अनुष्ठान में कोई बैकुंठ बेच रहा है। कोई पचास सौ रुपये में शनि और मंगल ग्रह को इधर-उधर कर रहा है। कोई चालीस दिन की धूनी रमाये बैठा है तो कोई टीवी पर यंत्र-तन्त्र बेच रहा है।

धर्म नहीं शर्म का विषय है?

क्या संसार कभी पूर्णतया सुखी रहा है? इसी तरह आज भी हर कोई दुखी है। किसी को बच्चे की कमी, तो किसी को कारोबार में घाटा। कोई इश्क में फंसा है, तो कोई घर में ही अनदेखी का शिकार है और इन सबका इलाज मियां कमाल शाह और बंगाली बाबा कर रहे हैं। कहीं मजार पूजी जा रही है, कहीं चादर चढ़ाई जा रही है। धर्म के नाम पर व्यापार फलफूल रहे हैं। लोग इन्हें देखकर गर्व करते हैं कि देखो हमारा देश धर्मात्माओं का देश है दरअसल यह गर्व का नहीं बल्कि शर्म का विषय है और  इसमें सुबह उठकर अपनी राशिफल पढ़ने वाला भी उतना ही दोषी है जितना एक भूत उतरवाने वाला।

क्या पैसे से परमात्मा खरीदा जा सकता है? 

हममें से ज्यादातर लोग ऐसे ही किसी दृदृश्य को देखते हैं तो बेचैन हो उठते हैं। दूसरों को लुटते देख कर, दूसरों का शोषण होते हुए देख कर व्यथित होते हैं। सवाल उठता है क्या लोग सत्य और अंधविश्वास के बीच के भेद को जानते हैं? हमारे पास कसौटी क्या है? इसलिए सीधा सा रास्ता है कि सत्य को स्वीकार करो और अपने दीये स्वयं बनो। अंधविश्वास का मतलब है, जो हम नहीं जानते उसको मान लेना। अंधविश्वास का यह मतलब नहीं होता कि जो हमसे विपरीत है, वह अंधविश्वासी है। लेकिन इसके विपरीत कहीं ना कहीं हम अपने आसपास देखते हैं कि हर भटका हुआ व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को रास्ता दिखा रहा है। कह रहा है नहीं उस मजार से फला काम हुआ था, उस बाबा से या इस ढोंग से फला की मन्नत पूरी हुई। मसलन मेरा पड़ोसी जो करता है मैं भी वही करूंगा ताकि में अपनी सोसाइटी में उससे कम धार्मिक न रह जाऊ? पड़ोसी सौ रुपये चढ़ा रहा है मैं दो सौ चढ़ा दूंगा तो उससे ज्यादा धार्मिक हो जाऊंगा। इस भीड़ में किसको परमात्मा के दर्शन हुए हैं?  बस जाग जाओ इसके बाद परमात्मा का अकूत खजाना है उसका साम्राज्य है।

क्यों श्रद्धा अंधश्रद्धा हो गयी?

कहने का अर्थ यह कि ईश्वर की खोज न तो विश्वास से होती है, न अंधविश्वास से। उसके लिए तो संदेह की स्वतंत्र चित्त-दशा चाहिए। उसके लिए अन्तकरण में मनन और चिंतन चाहिए। संदेह ने अनुसंधान और विज्ञान के द्वार खोले हैं। यही कारण है विज्ञान में पंथ और सम्प्रदाय नहीं बने। जो व्यक्ति विश्वास कर लेता है, वह कभी खोजता नहीं। खोज तो संदेह से होती है, अंधश्र(ा से नहीं, इसलिए अन्धविश्वासों पर सन्देह करो तर्क की कसौटी पर कसो जो निचोड़ आये उसे  स्वीकार करो।

किसी दफ्तर में रिश्वत लेना-देना यदि भ्रष्टाचार है तो मन्नत के लिए मन्दिरों में चढ़ावा आस्था कैसे?

फर्ज कीजिये आप किसी दफ्तर में किसी काम से जाते हैं वहां आपको रिश्वत देकर कोई काम कराना पड़े तो क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? यदि है तो अपनी आत्मा से जवाब दीजिये मंदिर हो या बाबा, वहां पैसे देकर अपनी मन्नत मांग रहे हैं तो यह आस्था कैसे? दरअसल यह एक भीड़ है! भिखारियों की, चालबाजों की, बेईमानों की, पाखंडियों की, धोखेबाजों की, यह भीड़ है,जो लोगों को सदियों-सदियों से चूस रही है। इस भीड़ में किसके भीतर का दीया जला है? नहीं जला। शायद इन सबसे व्यथित होकर आर्य समाज का जन्म हुआ। यदि यह सब पाखण्ड न होते तो आर्य समाज नहीं होता। इस भ्रमजाल को, तन्त्र विद्या को, भूत-प्रेत, मंगल-अमंगल, शनि और राहू-केतु समेत तमाम पाखण्ड पर चोट करने के लिए 2018 में आर्य समाज ने कमर कस ली है। वर्ष 2018 आर्य समाज सिर्फ अन्धविश्वास निरोधक वर्ष के रूप में अपना कार्य तेज करेगा। हम गली से मोहल्लों तक, रेलवे स्टेशन से लेकर मेट्रो स्टेशन तक लोगों के बीच जायेंगे। अन्धविश्वास और पाखंड पर लोगों को जागृत करेंगे। हर एक वह अन्धविश्वास जिसमें चाहें किसी को मांगलिक बताकर डराया जा रहा हो या किसी से वास्तुदोष के नाम से पैसा उगाहा जा रहा हो। देश और धर्म को अन्धविश्वास के इस कुचक्र से बचाने के लिए आप सभी का सहयोग जरूरी है। आर्य समाज एक नाम नहीं बल्कि हम सबकी एकजुट और ताकत का नाम ही आर्य समाज है जिससे हमेशा अन्धविश्वास भागता आया है।

राजीव चौधरी

 

 

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