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ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करते हुए जीवात्मा परमात्मा में स्थित हो जाता है:

Jun 7 • Uncategorized • 890 Views • No Comments

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गुरुकुल पौंधा देहरादून के 18वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा और गुरुकुल ने मिलकर यहां एक चार दिवसीय ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका स्वाध्याय शिविर का आयोजन किया गया है।  शिविर के तीसरे दिन बुधवार 31 मई, 2017 को प्रातः 10 बजे से आरम्भ सत्र में वैदिक विद्वान डा. सोमदेव शास़्त्री जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना विषय को आगे बढ़ाते हुए कहा कि आहर विषयक योगों में एक मिथ्या योग होता जो सर्दी व जुकाम आदि में कोल्ड ड्रिंक अथवा आईसक्रीम जैसे पदार्थों का सेवन करने को कहते हैं। इनके सेवन से स्वास्थय बिगड़ता है। सम्यक् योग का तात्पर्य शरीर की आवश्यकता के अनुरूप हितकर वस्तुओं का सेवन करना होता है। आचार्य जी ने कहा कि समाधि योग की आठ सीढ़िया यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि हैं। सन्ध्या का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि सन्ध्या में 19 मन्त्र हैं। सभी मनुष्यों को कम से कम आधा घण्टा ईश्वरोपासना अवश्य करनी चाहिये। सन्ध्या में मन को प्रकृति से हटाकर परमात्मा में लगाना होता है। आचार्य जी ने कहा कि बाह्य विषयों से मन को हटाने से जीवात्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसके बाद ईश्वर के ध्यान व चिन्तन को जारी रखते हुए जीवात्मा परमात्मा में स्थित होता है।

उन्होंने बताया कि जीवात्मा और परमात्मा देखने की नहीं अपितु अनुभव करने की वस्तुएं हैं। समाधि के अतिरिक्त जीवात्मा की स्थिति वृत्तियों के अनुरूप होती है। यह वृत्तियां क्लिष्ट व अक्लिष्ट दो प्रकार होती हैं। क्लिष्ट वृत्ति क्लेश पहुंचाने वाली होती हैं तथा अक्लिष्ट वृत्तियां वह होती हैं जिनसे जीवात्मा को कोई दुःख नहीं पहुंचता। मन के अनुकूल चीजों से सुख व प्रतिकूल चीजों से दुःख मिलता है। यह क्लष्टि एवं अक्लिष्ट वृत्तियां पांच प्रकार की होती हैं जिन्हें प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा व स्मृति के नाम से जानते हैं। आचार्य जी ने इन पांच वृत्तियों के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने विपर्यय वृत्ति का उल्लेख कर कहा विपरीत वा मिथ्या ज्ञान को विपर्यय वृत्ति कहते हैं। इसका उदाहरण देते हुए आपने कहा कि अंधेरे में रस्सी देखकर सर्प की भ्रान्ति होना विपर्यय वृत्ति के कारण होता है। विकल्प वृत्ति का उदाहरण देते हुए आपने कहा कि आकाश पुष्प व सींग वाला मनुष्य इसके उदाहरण होते हैं। यह नाम शब्द मात्र हैं परन्तु इन नामों की संज्ञा वाली वस्तुओं का अस्तित्व नहीं होता। निद्रा एवं स्मृति वृत्तियों पर भी विद्वान वक्ता ने प्रकाश डाला। आचार्य जी ने कहा कि समाधि की तुलना निद्रा के साथ की जाती है। समाधि में मनुष्य में सतो गुण का प्रभाव होता है। समाधिवस्था में वह जीवात्मा व परमात्मा दोनों का अनुभव करता है व उसे ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। निद्रा में उसे किसी प्रकार की प्रतीती नहीं होती।

डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि जब समाधि का अभ्यास हो जाता है तो उपासक उसमें घंटो बैठा रहता है, उसे समय का पता नहीं चलता है। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द 18 घंटे व उससे अधिक भी समाधि में बैठा करते थे, ऐसा उल्लेख उनके जीवन चरित्रों में आता है। स्मृति वृत्ति का उल्लेख कर आचार्य जी ने कहा कि कर्मो के संस्कारों का मन पर प्रभाव होना स्मृति कहलाता है। आचार्य जी ने कहा कि पांचों इन्द्रियों के अपने अपने विषयों से सीघे सम्पर्क से जो भ्रान्तिरहित ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष कहलाता है। अनुमान प्रमाण की चर्चा कर आचार्य जी ने कहा कि अनेक वस्तुओं को अनुमान के आधार पर जाना जाता है। अनुमान से जिन पदार्थों को जाना जाता है उनका प्रत्यक्ष अनुभव पहले किया हुआ होता है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि धुएं को देखकर उस स्थान पर अग्नि का ज्ञान होता है। यह अग्नि व धुएं को हमने पहले अनेकों बार देखा होता है अतः दूर से धुएं मात्र को देखकर हमें वहां निश्चित रूप से अग्नि होने का अनुमान होता है। आचार्य जी ने शब्द प्रमाण को आगम प्रमाण बताया। जिस प्रकार से हम माता-पिता द्वारा बताई बातों पर पूर्ण विश्वास करते हैं उसी प्रकार वेद की बातें हैं जिन पर पूर्ण विश्वास रखना शब्द प्रमाण कहलाता है। आचार्य जी ने कहा कि ऋषि परमात्मा की सत्ता का अनुभव करने वाले समाधि सिद्ध व ईश्वर के द्रष्टा को कहते हैं। उन्होंने कहा कि शब्द प्रमाण भी वेदों के अनुकूल बातों का ही होता है। उन्होंने कहा कि ऋषि के पीछे शब्द भागते है और मनुष्य शब्दों के पीछे भागता है। आचार्य जी ने कहा कि किसी विषय की इच्छा होने व उसकी उपलब्धि न होने पर उसके हानिकारक प्रभाव का चिन्तन करने से उस इच्छा का दमन व उससे विरक्ति होती है। इसके कुछ उदाहरण भी आचार्य जी ने दिये। आचार्य जी ने इस बीच भक्त फूल सिंह की कथा भी सुनाई और कहा कि आर्यसमाजी बनने पर उन्होंने न केवल रिश्वत लेना ही छोड़ा अपितु अतीत में जिन व्यक्तियों से रिश्वत ली थी उनके घर जा जाकर उनका धन लौटाया। इसके लिए उसने अपनी सम्पत्तियां भी बेच डाली थी। रिश्वत के धन पर ब्याज का विचार कर उन्होंने विद्यालय खोले जो आज महाविद्यालय और विश्वविद्यालय का रूप ले चुके हैं। आचार्य जी ने बताया कि इस व्यक्ति ने अतीत में जिनको थप्पड़ मारा था उनके पास जाकर उन्हें खुद को जोर जोर से थप्पड़ मारने के लिए बाध्य किया जिससे उनके उस अशुभ कर्म का प्रायश्चित हो जाये। इन कार्यों को करके पटवारी फूल सिह भक्त फूल सिंह के नाम से विख्यात हुए।

आचार्य जी ने कहा कि दीर्घकाल तक निरन्तर सन्ध्योपासना आदि का अभ्यास करने से दृण भूमि होती है। उन्होंने कहा इन कार्यों को करते हुए इनके प्रति श्रद्धा का गहरा भाव भी होना चाहिये। उन्होंने आगे कहा कि सन्ध्या के लिए निश्चित स्थान, निश्चित समय सहित नियमितता और श्रद्धा होनी चाहिये तभी इन कार्यों में सफलता मिलती है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के बिना कोई कार्य नहीं होता। उपासना के लिए श्रद्धा की आवश्यकता होती है। अभ्यास के बिना उपासना में सफलता नहीं मिलती। आचार्य जी ने कहा कि उपासना करने वाला व्यक्ति दूसरों की सेवा करता है। इसके बदले में वह उनसे किसी प्रकार की प्रशंसा नहीं चाहता। वह सोचता है कि जिस प्रकार वह परमात्मा के बनाये पदार्थों का उपयोग करता है उसी प्रकार दूसरों की सेवा करना उसका भी कर्तव्य है। ईश्वर प्रणिधान की चर्चा कर आचार्य जी ने कहा कि भगवान को हर समय याद रखना व उसकी कृपाओं को स्मरण करना ईश्वर प्रणिधान है। आपने स्वामी श्रद्धानन्द जी और पं. लेखराम जी का इस विषय का एक संस्मरण सुनाते हुए बताया कि दोनों महापुरुषों द्वारा एक यात्रा करते हुए पण्डित लेखराम जी द्वारा बिना शरीर शुद्धि के सन्ध्या करने पर स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आपत्ति की तो पंडित लेखराम जी ने कहा था कि शारीरिक शुद्धि करना शरीर का धर्म है जबकि सन्ध्या करना आत्मा का धर्म है। आचार्य जी ने कहा कि लेखराम जी ने निष्कर्ष रूप में कहा था कि शरीर का धर्म आत्मा के धर्म पालन करने में बाधक नहीं बनना चाहिये। सन्ध्या व ईश्वर प्रणिधान को आगे बढ़ाते हुए आचार्य जी ने कहा कि जो मनुष्य ईश्वर को समर्पण करते हैं ईश्वर उन्हें सम्भालता है। ऐसा करके उपासक को समाधि का लाभ होता है।

5 क्लेशों के अन्तर्गत अविद्या क्लेश की चर्चा करते हुए आचार्य जी ने कहा कि अनित्य को नित्य तथा अपने को अमर मानना अर्थात् अपनी मृत्यु के प्रति विचार न करना व उनकी उपेक्षा करना अविद्या है। अपवित्र को पवित्र और पवित्र को अपवित्र मानना भी अविद्या है। आचार्य जी ने अभिनिवेश क्लेश की चर्चा की और उस पर विस्तार से प्रकाश डाला। आज के स्वाध्याय का समापन कराते हुए आपने कहा कि परमात्मा पुरुष विशेष है। वह पुरुष विशेष ही ईश्वर है। इसके बाद दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के उपमंत्री श्री सुखवीर सिंह आर्य जी ने आचार्य जी का धन्यवाद किया और स्वाध्याय शिविर में भाग लेने वालों को सूचनायें देने के साथ स्वच्छता व दूसरों के कार्यों में सहयोग करने का भी अनुरोध किया। आयोजन में आर्य विद्वान डा. वेदव्रत आलोक भी पधारे हैं। उन्होंने भी योग विषयक अपने विचारों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हमें ईश्वर के स्वरूप में स्थित होने के लिए द्रष्टा बनना है। वास्तविक द्रष्टा परमात्मा है। उन्होंने आगे कहा कि उपासना में मन निद्र्वन्द होना चाहिये। डा. वेदव्रत जी ने कहा उपासना में हम अपने चित्त के कुसंस्कारों को साफ करते हैं।

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के स्वाध्याय में आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई पहले पूर्व स्वाध्याय किये हुए उपासना विषय के वेदमन्त्रों व योग सूत्रों का पाठ दोहराते हैं। फिर बाद के मन्त्रों व सूत्रों को पढ़कर उनके ऋषि कृत संस्कृत व्याख्यान के आधार पर उनके अर्थों को बताकर उनकी व्याख्या करते हैं। इसके बाद श्रोताओं को उन मन्त्र व सूत्रों के ऋषि के हिन्दी अर्थों को पढ़ने को कहते हैं और उसमें आये विषयों पर टिप्पणी व व्याख्यान देते हैं। इससे पूरा विषय श्रोताओं को हृदयंगम हो जाता है। दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा और गुरुकुल पौंधा के संयुक्त तत्वावधान में यह आयोजन सम्पन्न हो रहा है। दिल्ली सभा के उपमंत्री श्री सुखवीर सिंह आर्य जी यहां पहले से पधारे हुए हैं और हर कार्य में उपस्थित रहकर शिविरार्थी की तरह स्वयं भी लाभ उठाते हैं। कल सायं तक इस शिविर में भाग लेने वाले शिविरार्थियों की संख्या लगभग 150 तक पहुंच गई थी। गुरुकुल में सभी शिविरार्थियों के निवास व भोजन की अच्छी व्यवस्था है। सभी शिविरार्थी इस स्वाध्याय शिविर को उपयोगी अनुभव कर रहें हैं और उन्हें इससे ऋषि के सभी ग्रन्थों का अध्ययन करने की प्रेरणा मिल रही है। दिल्ली सभा और गुरुकुल पौंधा का यह प्रयास पूर्णतः सफल है, ऐसा सभी का अनुभव है। शिविर की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण गुरुकुल के आचार्य डा. धनंजय जी की विगत कुछ महीनों से कठोर तप व साधना है जिसके हम प्रत्यक्षदर्शी हैं। विगत 17 वर्षों में गुरुकुल ने एक पौधे से वट वृक्ष का सा रूप ले लिया है, इसमें भी मुख्य भूमिका में हमें आचार्य धनंजय जी का तप व पुरुषार्थ ही दृष्टिगोचर होता है। ईश्वर आचार्य धनंजय जी को अच्छा स्वास्थ्य, सुख व दीघार्य प्राप्त करें, ऐसी प्रार्थना हम ईश्वर करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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