ईश्वर के गुण

Apr 14 • Arya Samaj • 693 Views • No Comments

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(1) वह चेतन दिव्य शक्ति परमेश्वर एक ही है। अर्थात् कोई दूसरा उसके तुल्य अधिक वा तुल्य नहीं, अकेला अर्थात् उससे भिन्न न कोई दूसरा न तीसरा है, अनेक नहीं।

(2) वह द्रष्टा है और सब जगत में परिपूर्ण होके जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार के जगत को देखता है,उसका कोई द्रष्टा (अध्यक्ष) नहीं और वह स्वयं किसी का दृश्य भी नहीं हो सकता।

(3) वह सर्वज्ञ है अर्थात् सब कुछ जानता है और उसका ज्ञान संसार की सब वस्तुओं से प्रकट होता है।

(4) वह सर्वव्यापक है अर्थात् सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् पदार्थ के अन्दर और बाहर ओत-प्रोत है।वह इस ब्रह्माण्ड में पूर्ण (सर्वत्र व्याप्त) हो रहा है और वह जीव के भीतर भी व्यापक अर्थात् अन्तर्यामी है। वह सूक्ष्मतर से भी सूक्ष्मतम और महत्तर से भी महत्तम है। इससे कोई सूक्ष्म तथा बड़ी वस्तु न तो है, न होगी और न थी।

(6) वह स्वयं स्थिर है। जैसे एक वृक्ष शाखा,पत्र तथा पुष्पादिकों को धारण करता है,उसी प्रकार परमेश्वर पृथिवी सूर्यादि समस्त जगत् को धारण करता हुआ उसमें व्यापक होकर ठहरा हुआ है।
जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते हैं, परन्तु आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात् किसी से बंधता नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर को भी जानना चाहिए।

(6) वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उसकी महिमा ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थान और प्रत्येक कार्य से प्रगट होती है तथा वह सृष्टि-निर्माण, संचालन व संहार के लिये आंख-कान-नाक आदि इन्द्रिययुक्त शरीर या (प्रकृति या जीव के अतिरिक्त) अन्य किसी पदार्थ (उपकरण-साधन-निमित्त) के सहाय की अपेक्षा नहीं रखता। जो कुछ करता है, बिना किसी साधन व व्यक्ति (पैगम्बर-अवतार) की सहायता के करता है ।

(7) वह निराकार है क्योंकि सर्वव्यापक है और किन्हीं दो वस्तुओं के शरीर से नहीं बना है।इसलिये उसको इन्द्रियों का विषय नहीं बनाया जा सकता।अर्थात् वह अशब्द,अस्पर्श,अरुप,अगन्ध,अस्वाद,अपाणिपाद,अमल और अयोनि(अकारण) है।तथा न उसकी कोई मूर्ति है और न बन सकती है। उसका रुप और शरीर नहीं है।सर्वव्यापक होने से वह मूर्ति में भी व्यापक है,पर मूर्त्ति वह नहीं। जैसे लोह खण्ड में ताप व्याप्त है,पर लोह खण्ड ‘ताप’ नहीं।
दूसरे यदि साकार होता तो,व्यापक न होता ,व्यापक न होता तो सर्वज्ञादि गुण भी ईश्वर में न घट सकते, क्योंकि परिमित वस्तु में गुण कर्म स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीत-उष्ण, राग-द्वेष,सुख-दुःख तथा भूख-प्यास, रोग-दोष और छेदन-भेदन से रहित न हो सकता।

(8) वह अजन्मा और निर्विकार है अर्थात् वह मनुष्य के समान जन्म,बाल्य,तारुण्य,प्रौढ़ता,वार्धक्य,मरण में नहीं आता।
उसका जन्म नहीं होता क्योंकि उसने जन्म के हेतु कर्म नहीं किये तथा उसको जन्म देने वाला कोई नहीं। जो पदार्थ जन्म ग्रहण करता है,उसमें ही षड्भाव विकार होते हैं,वही विकारी होता है। ईश्वर विकारी नहीं,इसलिये अजन्मा है।

(9) वह एक रस है उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता। यदि वह परिवर्तनशील होता, तो दूसरी वस्तुओं में परिवर्तन न कर पाता तथा निर्विकार न होता,परिणामी होता।

(10) ईश्वर का अवतार नहीं होता।उन्नत स्थान से निम्न स्थान को पहुँचना अवतार है और यह कर्म गतियुक्त पदार्थ में ही सम्भव है। ईश्वर सर्वव्यापक व अचल है,इसलिये उसका अवतार मानना ठीक नहीं है। परमेश्वर का आना-जाना और जन्म-मरण कभी सिद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि इसका भाव है-”ईश्वर का परिमित समय के लिए देहधारी बनना’,यह ईश्वर के सर्वज्ञत्व,सर्वव्यापकत्व आदि गुणों के विरुद्ध है।

उपरोक्त लक्षण सहित परमेश्वर ही को यथावत जानकर मनुष्य ज्ञानी होता है,अन्यथा नहीं।

उसी को जान के और प्राप्त होके जीव जन्म-मरण आदि क्लेशों के समुद्र समान दुःख से छुटकर परमानन्द-स्वरुप मोक्ष को प्राप्त होता है।अन्यथा किसी प्रकार से मोक्षसुख नहीं हो सकता।मोक्ष को देने वाला एक परमेश्वर के बिना दूसरा कोई नहीं है।

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