69561-gbzbustuzh-1506553506

एक गांधी क्या हजार गांधी भी इस देश को आजाद नहीं करवा पाते

Mar 23 • Samaj and the Society • 100 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।

कवि प्रदीप के इस गीत ने उन लाखों क्रांतिकारियों के लहू पर चरखा फेर दिया। जिन्होंने अपना सबकुछ गंवाकर अपनी खून की अंतिम बूंद से  इस राष्ट्र को सींचा है।

यह गीत उन लाखों बहनों , माताओं , पत्नियों , बच्चों का अपमान है जिन्होंने अपने भाईयों , बेटों, पतियों, पिताओं को हंसी खुशी राष्ट्र के लिए अर्पित किया है।

प्रदीप की इन पंक्तियों के जबाव में मैंने चार पंक्तियां लिखी  हैं -

दिला दी हमें आज़ादी देकर अपनी कुर्बानियां,

धन्य थी तुम्हारी जवानी, और धन्य थी तुम्हारी जननियां।

तुम अगर यूं राष्ट्रहित में अपना रक्त नहीं बहाते,

तो एक गांधी क्या हजार गांधी भी इस देश को आजाद नहीं करवा पाते।

रक्त बहाने की  इसी कड़ी में सरदार किशनसिंह का बेटा सरदार भगतसिंह और उसके दो साथी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। जिनको आज ही के दिन 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई।

जिनके कारण संविधान हैं और हमारा अस्तित्व है। जिन्होंने हमारे बेहतर आज के लिए अपना कल न्यौछावर कर दिया।

महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त और पंजाब के बहुत बड़े किसान सरदार अर्जुनसिंह ने अपने दो पोतों को छ: वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार के समय यह घोषणा करते हुए की मैं अपने दोनों पोतों को राष्ट्र को अर्पित करता हूं। जिनमें से उनका एक पोता सरदार भगतसिंह जो केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं बहुत बड़ा चिंतक, विचारक, लेखक, संपादक, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, और बहुत बड़ा क्रांतिकारी साहसी नौजवान था, जिसने अंग्रेज सरकार की चूलें हिलाकर रख दी थी।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु से सरकार कितनी ज्यादा डरी हुई थी, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है  कि तीनों नौजवानों को फांसी 24 मार्च को होनी थी। पर पुरे देश में विद्रोह का माहौल बन गया था और सरकार को इंटेलिजेंस ने रिपोर्ट दी कि भगतसिंह और उसके साथियों को 23 मार्च को फांसी ना दी जाये, इससे पुरे देश में एक साथ विद्रोह हो सकता है क्योंकि आज पुरा देश भगतसिंह के साथ खड़ा है। या तो फांसी कैंसिल कर दी जाये, या आगे पीछे दी जाये।

तो तीनों नौजवानों को सारे नियम कानून परंपराओं को नजरंदाज करते हुए 23 मार्च को शाम 7 बजकर 15 मिनट पर फांसी दी गई । और शव को एक घंटे तक लटकाकर रखा तथा सुपरिटेडेंट ने लिखा की एक घंटे तक फांसी के फंदे पर लटकाए रखने के बाद मैं यह प्रमाणित करता हूं कि भगतसिंह मर चुका है । भगतसिंह महज 23 साल 5 महीने 25 दिन की उम्र में फांसी के फंदे पर झूल गए।

ताकि इस देश की हर मां यह उम्मीद कर सकें की उसके घर में भगतसिंह जैसा बेटा पैदा हो इस देश की आने वाली पीढ़ियां आजादी की हवा में सांस ले सकें । जिस दिलेरी , प्रसन्नता और खुशी के साथ इन तीनों नौजवानों ने फांसी के फंदे को चूमा मैंने ऐसा जीवन में कभी नहीं देखा कि फांसी के फंदे को चूमते हुए भी भगतसिंह हंस रहे थे । उनके साथी अजय घोष लिखते हैं – भगतसिंह ऐसे ध्रुव के चमकते तारे थे। जो थोड़े समय के लिए चमके पर भारत 33 करोड़  लोगों के दिलों में आजादी की मशाल जलाकर चले गए।

मैं ऐसे महान् क्रान्तिकारी, चिंतक, दार्शनिक, दूरद्रष्टा 23 साल के नौजवान भगतसिंह और उनके दोनों साथियों का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद करता हूं। कि उनके कल के बलिदान की वजह से हमारा आज अस्तित्व है।

लेख-सोमवीर आर्य

 

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes