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एक निवेदन

Feb 16 • Arya Samaj • 655 Views • No Comments

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लेख प्रस्तुति-कर्ता  आचार्य नवीन केवली

हे समग्र-विश्वब्रह्माण्ड के रचयिता! हे सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक दयामय मघवन्! आपकी यह सृष्टि तो बहुत ही व्यापक व विशाल है, एक ही आकाश-गंगा में आपने अरबों-खरबों सौरमण्डलों को सुनियोजित किया हुआ है, ठीक ऐसे ही अनगिनत आकाश-गंगाओं का निर्माण किया है। आज के वैज्ञानिक अपने उत्कृष्ट से उत्कृष्ट आधुनिक दूर-वीक्षण यन्त्रों के माध्यम से भी जिसकी थाह पाने में अपने घुटने तक टेकने के लिए मजबूर हो रहे हैं। हमने आपके द्वारा प्रदत्त सब ज्ञान-विज्ञान का भण्डार वेद में भी यह पढ़ा है प्रभो! कि यह समग्र विश्व-ब्रह्माण्ड आपके किसी एक कोने में निर्मित है जैसे किसी बटवृक्ष में एक छोटा सा घोसला हो। इतना आपका पराक्रम, इतना आपका सामर्थ्य है, इतनी आपकी बुद्धिमत्ता है कि इन सभी आकाश-गंगाओं को तथा इनके अन्दर स्थित असंख्य सौरमण्डलों को सुव्यवस्थित रूप में एक दूसरे के आकर्षण में बाँध रखा है। आपने प्रत्येक सौरमण्डलों में एक-एक पृथिवी भी बनायी है, जैसे हमारे इस सौरमण्डल में कुछ ग्रह-उपग्रह सूर्य के आकर्षण शक्ति से बन्धे हुए हैं और उनमें से एक पृथिवी में हम सब प्राणी जगत जीवन व्यतीत करने में समर्थ हो पा रहे हैं। ठीक ऐसे ही इतने सारे सूर्य अथवा सूर्य-मंडल विद्यमान हैं तो इन सबमें भी अवश्य कुछ प्राणियों के निवास के लिए आपने व्यवस्था की हुई है क्योंकि आपका कोई भी कार्य व्यर्थ अथवा अनावश्यक नहीं होता।

यह सृष्टि तो आपकी ही है प्रभो ! यदि आप ही इसकी सुरक्षा व्यवस्था नहीं करेंगे तो आपके अतिरिक्त और कौन ऐसा सामर्थ्यवान् है जो इस सृष्टि में वैदिक व्यवस्था को लागू कर सके और सभी प्राणियों को सुख समृद्धि से युक्त कर सके। आपको तो पता ही है कि इस संसार में हम तीन चीजें हैं एक तो प्रकृति जो कि चेतनता-रहित जड़ पदार्थ है, दूसरा हम सब जीवात्माएं हैं जो कि अल्पज्ञ हैं और कुछ भी सामर्थ्य नहीं है, आपके द्वारा प्रदत्त साधनों के प्राप्त होने से ही हम कुछ जानने-करने में समर्थ हो पाते हैं, तीसरे आप हैं जो अनन्त ज्ञान-विज्ञान व सामर्थ्य से युक्त हैं । न प्रकृति कुछ कर सकती है और न ही हम सब जीवात्माएं मिल कर भी कुछ कर सकते हैं तो परिशेष न्याय से आप ही एक ऐसे हैं जो आपकी इस सृष्टि को सुव्यवस्था प्रदान करने में समर्थ हो सकते हैं। हे भगवन्! आपने जब-जब सृष्टि बनायी है तब-तब हम सब जीवों के कल्याण के लिए वेदों का ज्ञान प्रदान किया है और उसकी रक्षा के लिए तथा समाज में सुख-शान्ति कि स्थापना के लिए हजारों ऋषि-महर्षियों को भी उत्पन्न किया है हममें से किसी को ब्रह्मा भी बनाया है और ऐसे ही बहुतों को ब्रह्मवेत्ता, वेदवेत्ता, सूक्ष्म तत्त्वों के गवेषक ऋषि-वैज्ञानिक, मेधावी व बुद्धिमान के रूप में निर्मित किया है। यह प्रक्रिया आपकी हर सृष्टि में समान रूप से बनी रहती है। इस पृथिवी में भी आपने अनेकों ऋषियों को बना कर संसार को अन्याय, अधर्म, असत्य, अत्याचार, भ्रष्टाचार, छल-कपट, अविद्या, अन्ध-श्रद्धा, अन्ध-विश्वास आदि समाज के विनाशकारी तत्वों से पृथक रखते हुए सत्य,न्याय,धर्म,विद्या,श्रद्धा, परोपकार,कर्त्तव्य-परायणता,परस्पर के प्रति भ्रातृभाव, सौहार्दता, विश्वास, तथा आपके प्रति भी लोगों का प्रेम, भक्ति, निष्ठा, और वेद व वैदिक सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा-विश्वास को स्थापित किया है।

हे भक्त-वत्सल प्रभो! यह तो हमारा दुर्भाग्य रहा कि आपके इस पृथिवी में महाभारत-युद्ध जैसे महा-भयंकर विनाशकारी युद्ध हुआ जिसमें अनेक प्रकार की योग्यता व गुप्त-विद्याओं से युक्त हजारों-लाखों ऋषि-मुनियों व विद्वानों-आचार्यों को मृत्यु का सामना करना पड़ा, उनके साथ वे सब विद्यायें भी लुप्त हो गयीं। उसके पश्चात् वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन का क्रम टूट गया और अनेक प्रकार के वेद-विरुद्ध मत-मतान्तर, मिथ्या-सिद्धान्त, अन्ध-विश्वास, पाखण्ड आदि समाज में फैल गए। यह सब तो आपको भी विदित ही है। बहुत ही लम्बे काल के बाद आपकी कुछ करुणा की वर्षा हुई थी और वो भी अल्प काल के लिए। आपको भी स्मरण है कि आपने इस सृष्टि में एक ऐसे व्यक्तित्व को प्रेषित किया था जो कि आपके ही अनेक दिव्य-गुणों से विभूषित महर्षि थे और जिस महान आत्मा को हम महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के नाम से जानते हैं। प्रभो! ऐसी सामाजिक दुरावस्था फिर से आगई है, सारे संसार में, खास कर भारत वर्ष में अनेक प्रकार के अविद्या, अन्ध-विश्वास, पाखण्ड, अन्याय, अधर्म, असत्य आदि अपने चरम-सीमा को भी लाँघ रहे हैं। हे परमेश्वर! अब तो ऐसी स्थिति आगई है कि लोग आपको भी स्वीकार करते नहीं हैं, आपकी सत्ता को भी सिद्ध करना पड़ता है, आपके द्वारा प्रदत्त वेद ज्ञान को भी लोगों से स्वीकार करवाना पड़ता है कि वेद ज्ञान अपौरुषेय है, लोग वेद पढ़ना-पढ़ाना भी छोड़ बैठे हैं, अब तो पुनर्जन्म को भी मनवाना पड़ता है और दुरावस्था तो यह है कि जो हम सबका ही परम लक्ष्य है उसको तो बिलकुल ही लोग भूल गए हैं, मोक्ष नामक भी कोई चीज, कोई पद या कोई स्थिति है जिसको प्राप्त करके व्यक्ति सर्वथा सम्पूर्ण दुखों से रहित हो जाता है और एक अवधि पर्यन्त केवल आपके ही आनन्द रस में मग्न हो जाता है।

हे करुणाकर! परम-पिता परमेश्वर! अब तो फिर से वो समय आ गया है प्रभो! इस सृष्टि वालों के ऊपर फिर से एक बार करुणा की धारा बहा दो, हे दया के सागर फिर से एक दयानन्द जैसा भेज दो जो कि लोगों के अन्याय, अधर्म, छल-कपट आदि को भी सहन करते हुए कभी अपने मार्ग से विचलित न हो, वेद-धर्म के प्रचार-प्रसार में ही अपने जीवन को समर्पित करने में सदा तत्पर रहे , कभी आलस्य-प्रमाद न करे, अब तो कोई ऐसा ऋषि भेज दो प्रभो! जिसको बाल्यकाल से ही वैराग्य हो जाये , आपका साक्षात्कार हो जाये, अल्प अवस्था में ही वेदवेत्ता ब्रह्मा बन जाये, जिसकी अपनी कोई इच्छा, अभिलाषा या सांसारिक एषणा न हो, अन्ध-विश्वास,पाखण्ड और वेद-विरुद्ध मत-मतान्तरों को उखाड़ फैंकने में समर्थ हो । आज-कल हर कोई अपने आप को भगवान् सिद्ध करने में लगा हुआ है और भोली-भाली जनता भी उसे स्वीकार करके अनेक प्रकार से उनके द्वारा शोषित,प्रताड़ित व दुखी हो रही है। हर कोई मिथ्या सम्प्रदायों के आग्रही अपने मत को ही सत्य सिद्ध करने में तुले हुए हैं। महिलाओं के ऊपर जो अत्याचार, अनाचार, बलात्कार जैसे घृणित कुकृत्य आज-कल समाज में व्यापक रूप धारण किया हुआ है, उनकी रक्षा के लिये किसी ऐसे ऋषि को भेजिए भगवन्! जो नारी जाति का सम्मान करना सिखाये। आज कल जातिवाद अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा हुआ है, किसी ऐसे महान ह्रदय को प्रेषित कीजिये जो कि जातिवाद का समूल विनाश करके दलितों को भी समान अधिकार व सम्मान दिलाये और ऊँच-नीच का भेद मिटाए। जातिवाद के मामले में तो प्रभो! औरों की तो बात ही क्या, महर्षि दयानन्द जी ने जिस आर्य समाज की स्थापना की थी उन आर्यसमाजियों में भी यह मिथ्या धारणा फैली हुई  है, आपके द्वारा बताया गया वर्ण-व्यवस्था को भी कोई स्वीकार नहीं करता, नाम मात्र के आर्य-समाजी बन गए हैं, जाति देख-पूछ कर ही विवाह करते हैं, गुण-कर्म-स्वभाव का तो कोई मतलब ही नहीं। महर्षि जी ने वेद के अनुसार जिस मूर्ति-पूजा का विरोध किया वह आज आर्यसमाजियों के भी घर-घर में की जा रही है, आपकी उपासना की बात तो दूर रही। कोई आश्रम-व्यवस्था का भी ढंग से पालन नहीं करते। प्रभो! समाज में आपकी संस्कृत भाषा का कोई आदर ही नहीं करता, वैदिक विद्वान् बनने की बात तो दूर रही। देश में न कोई वैदिक राज्य-व्यवस्था प्रचलित है और न कोई दण्ड-व्यवस्था फिर आपकी कर्मफल-व्यवस्था या दण्ड-व्यवस्था का तो किसी को खयाल ही नहीं। ऐसे अनेक प्रकार की समस्यायें विद्यमान हैं।

प्रभो! अब तो एक ऐसा दयानन्द भेजना जो कि बुलेट-प्रूफ के साथ जहर-प्रूफ भी हो, यदि कोई गोली से मरना चाहे तो भी उसको गोली न लगे और जिसको हजारों बार भी जहर दे दिया जाये तो भी कोई कुप्रभाव न हो, कोई हिरण्यकशिपू जैसे वरदान-युक्त दयानन्द को भेजना जो किसी भी प्रकार से शीघ्र नष्ट होने वाला न हो  क्योंकि यहाँ के लोग कुछ ज्यादा ही बुद्धिमान (एडवान्स)  हो गए हैं तथा बहुत ही भौतिक प्रगति कर चुके हैं और कोई भी समाज-सुधार का कार्य करता है तो अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए उसी को ही शत्रुवत् मानकर यमलोक भेज देते हैं। समाज के इन सब बुराईयों को समूल-विनाश करने के लिए किसी तेजस्वी, पराक्रमी, मेधावी, अत्यन्त-बलवान, ऋषि को शीघ्र ही जन्म दो भगवन्! आज हम लोग महर्षि दयानन्द जी का जन्मोत्सव मना रहे हैं परन्तु हमने तो दयानन्द जी के बारे में सुना-पढ़ा ही है प्रभो! कभी किसी ऋषि को प्रत्यक्ष देखा नहीं है, अतः आपसे सविनय निवेदन है भगवन् कि  इतने बड़े विश्व-ब्रह्माण्ड में से किसी भी धरती से एक दयानन्द सा ऋषि को स्थानान्तरित करके इस धरती पर जन्म दे दो जिससे हम उसका भी जन्मोत्सव मना सकें। हमें यह पूर्ण विश्वास है कि आप हमारा निवेदन अवश्य स्वीकार करेंगे और इस धरती को भी वैदिक वातावरण-युक्त बना करके सुख-शान्ति व समृद्धि से परिपूर्ण कर देंगे ।

 

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