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ऐसा होता है कल्याण का मार्ग

यजुर्वेद के प्रथम अध्याय में कुल ३१ मन्त्र हैं. इन मन्त्रों की व्याख्या कर इसे पुस्तक रूप दिया गया और इस पुस्तक का नाम किया गया “ कल्याण का मार्ग ” प्रथम अध्याय के मन्त्रों में मानव मात्र को आकर्षक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया गया है. जीवन को आकर्षक बनाने के लिए जो उपाय बताये गए है, उनमें प्रमुख रूप से खुली हवा में घूमने के लिए प्रेरित किया गया है. खुली वायु हमारे कल्याण का कारण होती है क्योंकि यह वायु हमारे सब प्रकार के रोगों को दूर करने का कारण होती है. इसके साथ ही साथ धूप का सेवन करने की प्रेरणा भी की गई है. सब जानते हैं कि धूप का मानव जीवन में विशेष महत्व होता है. यह वायु से भी कहीं अधिक तीव्र गति से हमारे शरीर में स्थान पा गए रोगाणुओं को शीघ्र ही नष्ट करती है तथा हमें विटामिन डी भी विपुल मात्रा में देती है. जब हम धूप नहीं ले पाते तो चिकित्सक के पास जाना पड़ता है तथा वह हमें अनेक प्रकार की औषध का सेवन करने की सलाह देने के साथ ही कहता है कि धूप का सेवन ही यह कमीं दूर कर सकता है तथा हमारी हड्डियों को शक्ति दे सकता है.

       कहा गया है कि इस प्रकार खुली वायु व खुली धूप का सेवन करने वाला ही तेजस्वी होता है. वह सदा क्रियाशील रहता है. उसकी काया सदा निरोग होती है. जिसकी काया निरोग होती है, उसके शरीर में शक्ति का भी अपार भण्डार होता है तथा उसकी बुद्धि भी तीव्र हो जाती है. इस प्रकार की विशेषताएं जिस व्यक्ति के पास होती हैं,  उसका स्वभाव नम्र हो जाता है. नम्र व्यक्ति को देवता लोग बहुत पसंद करते हैं. इस कारण वह देवताओं का भी प्रिय हो जाता है. जब देवातागण उसे प्रिय समझते हैं तो निश्चय ही वह अनेक प्रकार के यज्ञों को करने वाला बनता है, प्रतिदिन अग्निहोत्र कर न केवल अपने आसपास का वातावरण ही शुद्ध करता है अपितु अपने बड़े लोगों का यथा मातादृपिता आदि का आशीर्वाद पाकर गौरवान्वित भी होता है.

जो मानव इस प्रकार का पवित्र जीवन व्यतीत करता है, वास्तव में उसका जीवन ही जीवन होता है. अन्य तो मात्र मांस का लोथड़ा बनकर केवल सांस ही लेते हैं. पेट को संग्रहालय बनाकर दिन भर कुछ न कुछ इस में डालते रहते हैं, करते कुछ भी नहीं द्य परिणाम स्वरूप अनेक प्रकार के रोग उन्हें आकर घेर लेते हैं.

      जब हम प्रथम अध्याय के मन्त्रों के अनुसार अपने जीवन को बना लेते हैं तो वास्तव में हमारा जीवन तब ही जीवन बन पाता है. सब प्रकार के सुखों की हमारे ऊपर वर्षा होने लगती है. सब प्रकार की शान्ति हमें मिलती है. सुख- समृद्धि के हम भंडारी बन जाते हैं. शान्ति हमारे जीवन का भाग बन जाती है. बड़े लोगों के साथ ही साथ प्रभु का भी हमें आशीर्वाद हमें मिलता है. विभिन्न यज्ञ करते हुए हम अनेक लोगों के सहायक तथा अनेक लोगों के मार्गदर्शक बनते हैं तो जिन लोगों के सुखों में वृद्धि का हम कारण बनते हैं, वह भी हमें अनेक प्रकार की उन्नति पाने के लिए शुभकामनाएं देते हैं. इस सब से हमारे जीवन में स्वर्गिक आनंद का प्रसार होता है.

       इस प्रकार से दूसरों की सहायता करने वाला, दूसरों के सुखों को बढाने वाला मानव जब अपनी गली से निकलता है तो हजारों हाथ उसकी सहायता पाने के लिए आगे आते हैं, हजारों आँखें अपनी पलकें उसके मार्ग पर बिछा देती है. सब लोग उसके उन्नत्त होने की, उसके शुभ के लिए लालायित हो उठते हैं. उसके कष्ट को सब लोग अपना कष्ट मानने लगते हैं. उसके जीवन का किंचित सा भी क्लेश सब का क्लेश बन जाता है तथा इस क्लेश को दूर करने के लिए हजारों हाथ पूर्ण शक्ति से आगे बढ़ते हैं, हजारों पाँव उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं.

       बस इस का नाम ही सुख है. इस अवस्था का नाम ही कल्याण है. इस प्रकार का कल्याण का मार्ग पाने के लिए प्रत्येक प्राणी सदा लालायित रहता है किन्तु जीवन के स्वार्थ, मोह आदि बंधनों में बंधा होने के कारण वह कल्याण के मार्ग पर न चलकर सदा विनाश का मार्ग ही पकड़ता है और इस मार्ग पर चल कर अपने आप को नष्ट कर लेता है.

इस उलटे मार्ग से बचने की प्रेरणा ही हमें यजुर्वेद के प्रथम अध्याय में दी गई है तथा उपदेश किया गया है कि हम कुटिलता को त्यागें तथा प्रेय मार्ग पर चलें, प्रभु से प्रेम करें तथा मानव मात्र के कल्याण के कार्य करें तो हमारा कल्याण स्वयमेव ही हो जावेगा. कल्याण का मार्ग की चर्चा को ही यजुर्वेद के द्वितीय अध्याय में ३४ मन्त्रों के माध्यम से आगे बढाया गया है. हमारा कर्तव्य है कि परमपिता परमात्मा के आदेशों का पालन करते हुए हम प्रथम अध्याय की छाया में ही इस द्वितीय अध्याय का भी वाचन करते हुए इसे भी अपने जीवन का अंग बनावें.

डा. अशोक आर्य

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