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ओउम हम सदा सद्गुणों को ग्रहण करें

आज के युग में गुणों से भरे मार्ग पर चलने वाले लोग उँगलियों पर गिने जा सकते हैं. गुणों के ह्रास से ही संसार आज अध्रूपतन की ओर जा रहा है. अपने अधिकार पाने की एक दौड़ सी लगी हुयी है. किसी को भी कर्तव्य की ओर देखने व उसे समझने तथा उस पर चलने की भावना ही नहीं रही. आज स्थिति यहाँ तक पहुंच गयी है कि एक बालक , जिसे पाल – पोस कर बड़ा किया जाता है, पढ़ाया – लिखाया जाता है. अच्छी प्रकार से उस का भरण – पोषण किया जाता है तथा उत्तम वस्त्र उसे पहनने को दिए जाते हैं. यह सब कर्तव्य पूर्ण करने में माता पिता जीवन भर की कमाई लगा देता है. जब उस की आयु ढल जाती है, वह बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचता है, अनेक रोग उसे घेर लेते हैं, इस अवस्था में उसे सहारे की आवश्यकता होती है. इसी अवस्था में वही संतान, जिसे बनाने के लिए उसने अपना जीवन खपा दिया, आज उसे दुत्कारती है तथा यह कहने पर कि माता पिता ने तेरा पालन किया है तो उतर देती है कि यह तो उनका कर्तव्य था , हमारे लिए नहीं अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए यह सब किया था, अपनी नाक बचाने के लिए यह सब किया था. जब कहा जाता है की तुम्हारा भी इन के लिए कुछ कर्तव्य बनता है , तो उतर होता है कि हमारा अपने बच्चों के लिए भी कर्तव्य है, उसे पूरा करें या इन को संभालें. जिस माता पिता ने उसे यह संसार दिखाया, आज उनकी देख रेख करने वाला कोई नहीं , क्योंकि हम ने संतान का पालन तो किया किन्तु उसे सुसंतान न बना पाए. अच्छे गुण उनमें नहीं-भर सके. ऋग्वेद के मन्त्र ५.८२.५ में प्रभु से प्रार्थना की गयी है कि हे प्रभु, हमें अच्छे गुण ग्रहण करने की शक्ति दो द्य मन्त्र मूल रूप में इस प्रकार है -विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुवा यद् भद्रं तन्न आ सुव .. ऋग्वेद ५.८२.५|| हे संसार के उत्पादक ,कल्याणकारी परमेश्वर , आप हमारे सारे दुर्गुण, दुर्व्यसन तथा दुर्गुणों को दूर कीजिये ओर जो कल्याणकारी गुण, कर्म, पदार्थ हैं , वह हमें दीजिये द्य इस मन्त्र में वैदिक संस्कृति के लक्षण बताये गए हैं. संस्कृति क्या है ?, इस का अर्थ क्या है ? आओ पहले इसे जाने , फिर हम आगे बढ़ेंगे. संस्कृति नाम है संस्कार का. संस्कार से परिष्कार होता है तथा तथा परिष्कार से संशोधन होता है. अत: संस्कार, परिष्कार व संशोधन को ही हम संस्कृति कह सकते हैं. बालक का जन्म होता है, उसे कुछ भी ज्ञान नहीं होता माता , पिता उसे संस्कार देते हैं, विगत संस्कारों को परिष्क्र्त कर , उनका संशोधन करते हैं , तब कहीं जा कर वह बालक एक उत्तम मानव की श्रेणी में आ पाता है द्य इस लिए हमारी संस्कृति के आधार हैं संस्कार, परिष्कार तथा संशोधन. इसे समझाने के लिए हम कृषि या खेती का बड़ा ही सुन्दर उदाहरण देख सकते हैं – किसान अपने खेतों में से अनावश्यक घास फुंस, जो स्वयं ही उग आता है तथा भूमि की उर्वरक शक्ति का शोषण करने लगता है, को खोद कर निकाल बाहर करता है. तत्पश्चात अपने खेत को समतल कर इस में उत्तम प्रकार के बीजों को डालता है द्य इस खेती में समय समय पर खाद व पानी दे कर इसे पुष्ट भी किया जाता है द्य इससे उगने वाले पोधों में अच्छे गुणों का आघान होता है तथा अच्छे फल स्वरूप इस का परिणाम किसान को मिलता है. कुछ एसा ही कार्य संस्कृति करती है. बालक के अन्दर जितने भी अवाच्छ्नीय तत्व होते हैं , जितने भी दुर्गुण होते हैं या किसी भी प्रकार की कमियां बालक में होती है, संस्कृति उन सब को दूर कर , उनके स्थान पर अच्छे गुणों को प्रतिस्थापित करती है द्य बस इस कार्य को ही हम संस्कृति कहते हैं. हम संस्कृति को संक्षेप में इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं! दुर्गुण निवारण और सद्गुण स्थापन ही संस्कृति है. ऊपर के प्रकाश को सम्मुख रखते हुए इस मन्त्र में कहा गया है कि जितने दुर्गुण, दुर्विचार या जितने भी दू:ख देने वाले तत्व हैं , हे प्रभू, वह सब हम से दूर कीजिये तथा जितने भी सद्गुण, सद्विचार अथवा शुभ तत्व हैं, वह सब हमें प्रदान कीजिये. इस प्रकार गुणों को प्राप्त करने व दुर्गुणों को दूर करने का कार्य यह संस्कृति मानव के जीवन पर्यंत करती रहती है, यह क्रम चलता रहता है. तब ही तो मानव दुराचारों तथा पापाचारों से अपने को बचाते हुए सद्गुणों कि प्राप्ति की और बढ़ता है , इन में प्रवृत होता है , इन्हें ग्रहण करता है. जब सद्गुणों में यह प्रवृति बद्धमूल हो जाती है , समा जाती है , तब मानव में से सब प्रकार की दुर्भावनाओं, दुराचारों का नाश हो जाता है तथा अच्छे गुण, अच्छे संस्कारों में निरंतर वृद्धि होती रहती है. इस प्रकार अच्छे गुणों को प्राप्त करते हुए मानव मानवता से देवत्व की और बढ़ता ही चला जाता है. जिस मानव में ऐसे गुणों की प्रचुरता आ जाती है , संसार उन्हें युगों युगों तक याद करता है, उसके पदचिन्हों पर चलने का प्रयास करता है तथा उसे देवता तुल्य आदर सत्कार देने लगता है. अत: हम मन्त्र की भावना को अपनाते हुए संसकृति के भाव को आत्मसात करते हुए अपने दुर्गुणों को त्यागें तथा अच्छे गुणों को गृहन कर संसार के सम्मुख अच्छा उदहारण रखें. डा. अशोक आर्य

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