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और वो पीड़ा लक्ष्य में बदल गयी!

May 17 • Arya Sandesh • 533 Views • No Comments

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कभी-कभी कुछ घटना हमें तोड़ देती है तो कुछ घटना हमें जोड़ देती है लेकिन कभी कुछ घटना जीवन में ऐसी भी होती है तो हमें कुछ करने को प्रेरित करती है. यह घटना ज्यादा पुरानी नहीं है लगभग एक वर्ष होने को है. उस दिन आर्य समाज के कार्यों को गति देने के उद्देश्य से हम मध्यप्रदेश के बमानियाँ में थे जिसे आदिवासी इलाका भी कहा जाता है. मेरे साथ प्रेमकुमार अरोड़ा, जोगिन्द्र खट्टर समेत दो व्यक्ति और थे. हमारी गाड़ी बमानियाँ से थानल मार्ग पर दौड़ रही थी. सुबह 9 बजे के बाद से ही गर्म हवा ने तपिश बढ़ा दी थी. आसमान से तीखी धूप मानो आग के गोले बरसा रही हो. जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया तापमान में भी बढ़ोत्तरी होती गई. दोपहर से पहले ही सड़कों पर सन्नाटा छा गया था. सडक से दूर-दूर इक्का दुक्का झोपडी नुमा कच्चे मकान के अलावा हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था.

हमारी चर्चा राजनीति तो कभी समाज में गिरते नैतिक मूल्य पर चल रही थी, हालाँकि हमारा किसी राजनैतिक दल से कभी कोई ताल्लुक नहीं रहा, लेकिन हम लोकतंत्र में मिले अपने अधिकारों के दायरे में रहकर राजनीति पर भी चर्चा कर रहे थे. अचानक गाड़ी के हल्के ब्रेक लेने के कारण हमारी इस चर्चा पर भी ब्रेक लग गया, जब हमने देखा कि सड़क के किनारे 25 से 30 बच्चें उस जलते रेत में नंगे पांव चले आ रहे थे. एक दो ने तो प्लास्टिक की बोतल को चपटा कर पैरों के नीचे कपडे से बाँधा हुआ था ताकि पैर न जले. किसी की कमीज फटी थी तो किसी का पायजामा. शायद किसी स्कूल से आ रहे थे. एक झटके में हमारा आत्मविश्वास और  सरकार के बदलते भारत के गीत,  उस मासूम बचपन के नन्हें पैरों के नीचे दब कर रह गये, हम सब कुछ पल को मूक दर्षक हो गये थे.

प्रेम कुमार जी ने गाड़ी को रुकवाया हम सब गाड़ी से उतरकर उन बच्चों के पास पहुंचे, हमने बच्चों से पूछा इस जलती रेत में जूते-चप्पल क्यों नहीं पहने? उनमे से कुछ बच्चे तो घबरा से गये लेकिन एक दो सूखे कंठ से थूक गटकते हुए जवाब दिया कि हमारे पास नहीं है स्कूल से साल भर में एक जोड़ी चप्पल मिलती है जो इतनी सस्ती होती है कि ज्यादा दिन नहीं चल पाती इसके बाद हम फिर अपने इसी हाल में आ जाते है, हमने उनकी किताबे देखी तो कुछ के पास किताबे ही नहीं थी वो सिर्फ स्कूल के ब्लेकबोर्ड के भरोसे ही शिक्षा प्राप्त करने को मजबूर थे. मन में यह प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगता है कि स्वतंत्र देश की लोकतांत्रिक यात्रा ने देश के इन बच्चों को क्या दिया है? जिस उम्र में उत्साहित बच्चें तितलियों और बादलों को पकड़ने के लिए दौड़ते है उस उम्र में यह बच्चें नारकीय रहन-सहन को आज भी मजबूर है. लेकिन इसके बाद भी उस मासूम बचपन के भीतर अपने देश और समाज के लिए कुछ करने जज्बा देखकर हमारा अन्तस् छलक आया.

वो बच्चे अपनी परेशानी या गरीबी को खुद को सहज रूप में अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे. लेकिन उनकी यह पहाड़ सी मुसीबत उनके हाल से साफ़ हो चुकी थी. हालाँकि बमानियाँ में आर्य समाज और महाशय धर्मपाल जी ने एक बड़ा स्कूल वहां के गरीब आदिवासी समुदाय को समर्पित किया है लेकिन इसके बावजूद भी यह सब देखकर मन में सवाल उभरा क्या सिर्फ यह काफी है? हम सब दिल्ली लौट चुके थे लेकिन मेरा मन अभी भी उन बच्चों की इस व्यथा के चारों और घूम रहा रहा था. बार-बार चेतना मनुष्य होने का बोद्ध करा रही थी, इसके कई दिन बाद यह पूरा प्रसंग महाशय धर्मपाल जी के सामने रखा. महाशय जी पूरा प्रकरण सुनने के बाद कहा इसमें दुखी होने के बजाय कुछ करके दिखाया जाये, इस पीड़ा को अब लक्ष्य बनाये तो बेहतर होगा, महाशय जी की इस प्रेरणा से हमारा विश्वास कुंदन की भांति दमक उठा, हम सब ने मिलकर आर्य समाज की पहल से “सहयोग” नामक एक योजना का गठन किया जिसमें यह तय किया गया कि हम सब मिलकर अपने मित्रो रिश्तेदारों व अन्य लोगों की मदद से उन बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करेंगे. लोगों से आग्रह करेंगे कि वो अपने व अपने बच्चों के दैनिक प्रयोग से बाहर हुए कपडे, बच्चों की पुरानी किताबें, पुराने खिलोने आदि जो भी सामान प्रयोग से बाहर हो चूका है उससे इन बच्चों की दैनिक जरूरते पूरी करने भागीदार जरुर बने.

“सहयोग” की इस सेवा भावना के कार्य में सिर्फ लोगों से कपडे व जरूरी सामान ही नहीं अपितु इस सहयोग की भी आशा करेंगे कि यदि मूलभूत सुविधाओं से जूझते बच्चें उन्हें मिले तो “सहयोग” को जरुर अवगत कराएँ. हालाँकि सारी दुनिया से गरीबी का मिटना तो एक सपने जैसे है लेकिन फिर भी एक इंसान मदद के लिए कहाँ जाए?  यही सोचकर “सहयोग” ने शिक्षा, और जरूरी सामान इन बच्चों तक पहुचाने का लक्ष्य बना लिया, सहयोग सिर्फ कपड़ों या सामान तक नहीं है बल्कि “सहयोग” इन बच्चों का भावनात्मक रूप से साथी बनेगा, समाज के लिए मन वचन से कार्य को प्राथमिकता देने का कार्य करेगा. मुझे आज लिखते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि सहयोग के इस कार्य में जिस तरह लोग अपने कपडे व अन्य सामान से “सहयोग” को उन बच्चों के लिए दे रहे है उससे सहयोग कई कदम आगे बढ़कर उस मासूम बचपन के नाजुक पैरो और नंगे बदन को सर्दी गर्मी से बचाने के लिए उनके हाथों में किताबें और मुस्कराहट देने के कार्य में पूर्ण निष्ठां के साथ आगे बढ़ रहा है.

विनय आर्य

 

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