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कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा सविंधान कैसे?

2008 में पेरिस में शरीयत के कानूनों को क्रियान्वित करने के जो अलग-अलग ढ़ंग और रूप हैं, उन पर इस्लामी विद्वानों में खुलकर बहस हुई थी. इस बात पर भी चर्चा हुई कि अनेक ऐसे कानून हैं जिन्हें इस्लाम मान्यता देता है लेकिन आधुनिक दुनिया नहीं, जैसे गुलामी इस्लामी कानून में वैध है. लेकिन बाहरी दुनिया और कानून इसे अवैध मानते है. वाशिंगटन के जार्ज टाउन विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास के प्राध्यापक जान वुल का मत था कि आज की मुस्लिम दुनिया में शरीयत का मतलब विभिन्न क्षेत्रों में सत्ता स्थापित करने से है, कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था से नहीं. यदि ऐसा होता तो पुरुषों के मामले में चोरी, बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराधो में शरियत का क्यों नहीं दिया जाता? शरीयत के कानून के अनुसार कोई मुसलमान अपना धर्म नहीं बदल सकता और कोई गैर मुसलमान मुस्लिम हो जाने के पश्चात पुनरू अपने धर्म में नहीं लौट सकता. क्या यह भी किसी के धार्मिक चिंतन और उसकी किसी आलोकिक शक्ति के प्रति लगाव या मानसिक शांति जैसी सोच पर गुलामी जैसा तो नहीं? अधिकांश मुस्लिम देशों में शरीयत निकाह, तलाक, विरासत और बच्चों की देखभाल जैसे निजी मामलों तक ही मर्यादित हो गई है। सबसे अधिक बहस महिलाओं के अधिकारों पर होती है जिन्हें शरीयत के नाम पर अत्यन्त संकीर्ण दायरे में मर्यादित कर दिया गया है। महिलाओं को यदि समान अधिकार नहीं दिया जाता है तो आधुनिक दुनिया में आधी जनसंख्या के साथ अन्याय होगा। क्या कोई आधुनिक समाज का देश यह पसंद करेगा?
जहाँ तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट, केंद्र और मुस्लिम मौलाना आमने सामने है तो वही मुस्लिम समाज में भी इस मुद्दे पर मुस्लिम मौलाना, इस्लाम का नव वैचारिक वर्ग, और तलाक से मुक्ति चाहने वाली मुस्लिम महिलाए भी मैदान में डटे खड़े है. मुस्लिम महिलाएं तो यहाँ तक मुखर है कि राष्ट्रीय महिला आयोग की एक सदस्या किसी धार्मिक नेता और मौलवी से सलाह ले रही है. हम भारतीय संविधान के युग में रह रहे हैं, न कि औरंगजेब के काल में. जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष ने इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि तीन तलाक और विवाह के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की गई राय अस्वीकार्य है और जमीअत उलमा हिंद इसकी न केवल सख्त निंदा करता है बल्कि इसका पुरजोर विरोध भी करेगा. जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष ने कहा कि मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा संविधान है और धार्मिक मामलों में व्यवस्था ही प्रासंगिक है जिसमें कयामत तक कोई संशोधन संभव नहीं और सामाजिक सुधारों के नाम पर व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता. उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश इस हलफनामे में कहा गया है कि “पर्सनल ला के आधार पर मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते और इस धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक के लिए कोई जगह नहीं है.”
देखा जाये तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 3.72 लाख भिखारी हैं. जिसमें से 25 प्रतिशत भिखारी मुस्लिम हैं. जबकि 72.2 प्रतिशत भिखारी हिंदू हैं. आंकड़ो के मुताबिक देश के कुल भिखारियों में महिलाएं कम हैं जबकि मुस्लिम भिखारियों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है. जिसका सबसे बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय के अन्दर जारी मौखिक रूप से तीन तलाक माना गया है. लेखिका जाकिया सोमन का कहना है कि वर्ष 2014 में शरई अदालतों में जो 235 मामले आए उनमें से 80 फीसदी मौखिक तीन तलाक के थे. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मौखिक तीन तलाक का प्रभाव न केवल प्रभावित महिलाओं पर ही पड़ता है बल्कि परिवार के बच्चे भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं. कई बार तो मुस्लिम महिलाओं को उम्र के उस दौर में अलग फैंक दिया जाता है जहाँ उसे रिश्तों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यह भी देखा गया है कि राजनीति और धर्मगुरुओं के गठजोड़ के चलते मुस्लिम महिलाओं के न्याय की बात उठाना मुश्किल रहा है. भारत देश में इसी गठजोड़ के कारण अब तक मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक, हलाला, बहुपत्नीत्व, कम उम्र में शादी जैसी कठिन समस्याओं को झेल रही हैं, जबकि यह सभी कुप्रथाएं कुरान की रोशनी में सही नहीं हैं. कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं है. फिर भी हमारे समाज में तीन तलाक का चलन है. समाज में हलाला जैसी बर्बरतापूर्ण और अमानवीय प्रथा का चलन चलता है और हमारे काजी और धर्मगुरु चुप रहते हैं…..
.कोई भी सस्कृति और कुप्रथा हमेशा समाज को प्रभावित करती है, समाज की पीढियां हमेशा से कुप्रथाओं के मकड़जाल में फंसी चली आ रही है. जो कुप्रथा जितनी पुरानी उसे हम इतना ही मूल्यवान समझ लेते है और उसकी प्राचीनता के प्रति श्रद्धा भाव जगाकर उसे बचाने के दुहाई देने लगते है. जबकि में समझता हूँ हमें हर 50 या 100 साल बाद अपनी परम्पराओं का विश्लेषण कर उसमें समयानुकूल परिवर्तन कर लेना चाहिए. जन माध्यमों या जन विचारधारा में मुस्लिम महिलाओं का जिक्र एक विशेष छवि के रूप में ही आता है. दुर्भाग्य से यह एक ऐसी महिला की छवि दिखलाता है, जिसकी कोई आवाज नहीं है या कोई अपनी पहचान नहीं है. जाहिर है, इसके चलते इन महिलाओं के मसलों एवं अधिकारों के बारे में बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता. फिर एक तरफ सरकार की ओर से अवहेलना या बेरूखी और दूसरी तरफ समाज के अंदर नाइंसाफी और दमन. यानी 1400 साल पहले दिए गए कुरानी हक तो नहीं मिले और दूसरी तरफ आजादी के 70 साल बाद लोकतंत्र में भी कोई विशेष सहभागिता नहीं मिली. मुस्लिम महिलाओं की खराब स्थिति के लिए सरकार और मजहबी रहनुमा दोनों ही बराबरी के जिम्मेदार हैं. यह कोई अनजाना खुलासा नहीं रह गया है. खुद मुस्लिम समाज के प्रगतिशील तबकों से यह बात अनछिपी नहीं रह गई है.
आज मुस्लिम समाज में बहुत सारे नव विचारक उठ खड़े हुए है. जिनमें वो अपने अधिकार, अपनी कुप्रथाओं पर प्रश्नचिंह और अपनी सामाजिक सहभागिता मांग रहे है किन्तु कमाल देखिये वो अपने ये अधिकार किसी सरकार या सेना से नहीं बल्कि अपने धर्म गुरुओं से मांग रहे है दरअसल, इस्लामिक उदारपंथ का चोला ओढ़ने वाले कई लोगों की तरह, मौलाना और मुफ्ती, काजी कुरान के दृष्टिकोण को लेकर ज्यादा फिक्रमंद रहते हैं. न कि प्रभावित मुस्लिम महिलाओं की सोच को लेकर. उनके सामाजिक जीवन को लेकर ऐसे लोग भारतीय संविधान का भी ख्याल नहीं करते जो आर्टिकल-14 के तहत नागरिकों के साथ बराबरी के मौलिक अधिकार और आर्टिकल-15 के तहत भेदभाव के खिलाफ मौलिक अधिकार की बात करती हैं.
इस संदर्भ में मुस्लिम विचारक फरहा फैज प्रासंगिक हो जाती हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय मुस्लिमों को मुस्लिम रूढ़िवादियों से बचाने के लिए (आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड) और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन) जैसे संगठनों पर बैन लगाए. क्योंकि इन रूढ़िवादियों की सोच, इनकी विचारधार जमात-उद-दावा के हाफिज मोहम्मद सईद जैसे लोगों से मेल खाती है. बेखोफ हिम्मत के साथ फैज मदरसा में दी जाने वाली शिक्षा में बदलाव की बात करती हैं और ये भी कहती हैं कि (भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन) दरअसल (आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड) की कठपुतली है. दोनों संगठन शरिया के हिमायती हैं. इस व्यवस्था को ऐसे ही चलते रहने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए. भारत में केवल एक संविधान होना चाहिए और जज भी जो उसी संविधान के अनुसार काम करें. यानी भारत के न्यायिक व्यवस्था के बराबर चलने वाली एक और व्यवस्था धर्म के नाम पर तो बिलकुल बंद होनी चाहिए! ताकि समाज के हर एक तबके की महिला निडर होकर अपनी पीड़ा बयान कर सकें …… लेख राजीव चौधरी

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