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कश्मीर नवजागरण में अभी समय लगेगा ?

Jul 17 • Uncategorized • 483 Views • No Comments

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हाल के सालों में स्वतन्त्रता और शरियत के नाम पर फैलते इस्लामी आतंकवाद को समझने और समझाने के लिए कई शब्द चल पड़े हैं जिनमें शामिल हैं- कट्टरपंथी इस्लाम, इस्लामी आतंकवाद, सलाफी-वहाबी इस्लाम, या चरमपंथी इस्लाम और तो और राजनैतिक तौर पर सही बने रहने के लिए ज्यादातर राजनीतिक इस्लाम का सहारा लिया जाता है। उदहारण के लिए जैसे भारत में आजम खान, ओवेसी बंधू और कश्मीर में अलगाववादी नेता जो राजनीतिक इस्लाम की पैरवी करते आसानी से दिख जाते हैं। लेकिन यह सब सत्ता पर काबिज होने की प्रणाली का हिस्सा है।

समय-समय पर भिन्न-भिन्न समुदायों और पंथों में नवजागरण का काल आया उदाहरण स्वरूप हिन्दू समुदाय में स्वामी दयानन्द, राजा राममोहन राय की अगुवाई में 19वीं सदी में राजनैतिक क्षेत्र में स्वाधीनता की भावना का उदय हुआ धर्म के क्षेत्र में मूर्तिपूजा जैसी अतार्कित आस्था पर स्वामी दयानंद ने प्रश्न उठाए। चिंतन एवं दर्शन के क्षेत्र में परालौकिक चीजों को हाशिये पर डालकर इहलौकिकता की प्रतिष्ठा हुयी। ईश्वर के साथ-साथ मनुष्य भी केंद्र में आया। इन सब चीजों से नवजागरण का वातावरण तैयार हुआ था और उक्त समुदायों ने उस नवजागरण को हाथों हाथ लिया। चूँकि अब मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका, यूरोप और भारत तक पहले स्थापित धार्मिक मूल्यों और परम्पराओं में इस्लाम की उम्र कम है तो यहाँ इस्लाम में नवजागरण में अभी समय लगेगा कारण इस्लामिक युवा पूर्ण रूप से अभी इसके लिए तैयार नहीं है। जिस कारण अभी भी कुछ लोग चरमपंथ को भी मजहब का हिस्सा समझे बैठे हैं।

बहराल इराक में इराकी सेना की कार्यवाही लगभग पूर्ण हुई पर शरियत यानि कि पूर्ण इस्लामी शासन के लिए बंधक मौसुल शहर स्वतंत्र तो हो गया लेकिन वहां सिर्फ लाशें और खंडहर दिखाई पड़ते हैं। पूर्ण शरियत के नाम पर जिस तरह वहां मानवता को रौंदा गया एक बार कथित इस्लामिक विद्वानों को उसे जी भरकर देख लेना चाहिए और इससे सीख लेनी चाहिए क्योंकि यही हालात भविष्य में कश्मीर के बनने वाले हैं। शरियत की मांग करने वाले चाहते हैं कि सरकार के सभी तंत्र इस्लाम के मुताबिक चलने चाहिए, इसका मतलब है कि इस्लाम ऐसे स्थिति की कल्पना ही नहीं करता जिसमें गैर मुसलमान शक्ति या सत्ता में साझीदार बन सकें। शायद इस कारण भी बहुसंख्यक मुसलमान लोकतान्त्रिक ढ़ांचे का विरोध करते दिख जाते हैं। पता नहीं यह समस्या स्थाई क्यों मान ली गयी है।

 

यदि काल गणना के अनुसार इस्लाम को समय में विभाजित करें तो हकीकत कुछ और ही निकलकर आएगी। पैगम्बर के बाद पहले खलीफा अबु बकर को छोड़ कर, उसके बाद आए सभी तीन खलीफा और शियाओं के 12 इमाम, सब की हत्या हुई थी। कहते हैं कि खुद पैगंबर मोहम्मद ने 27 जंगों में हिस्सा लिया था। इस्लाम के शुरुआती दौर में भी इस्लामिक स्टेट जैसे जिहादी गुटों का जन्म हुआ था, मिसाल के तौर पर जब पहले खलीफा अबु बकर ने तलवार उठाई थी और जकात ;टैक्सद्ध न देने वाले मुसलमानों के खिलाफ जिहाद की धमकी दी थी। इस काल के बाद यदि मध्य काल की बात करें तो इस्लाम की परम्पराओं को लेकर टकराव हुआ जिसमें अरबी प्रायद्वीप में अलग-अलग मुल्कों की स्थापना लिए संघर्ष हुआ। इस्लामिक राज्य बने उसके बाद आज सीधे वर्तमान परिदृश्य में आयें तो आप देखेंगे कि मात्र इंसानी नाम चेहरे और स्थान बदले हैं वरना हिंसा का रूप धार्मिक मांग और कृकृत्य बाकि सब सामान है।

कश्मीर के संदर्भ में अपनी बात रखने के लिए उपरोक्त उदाहरण अनिवार्य से बन जाते हैं और एक कहावत भी है कि जब हम देखेंगे नहीं तो सीखेंगे कहाँ से? आज जो लोग कश्मीर के लोकतंत्र को नकारकर शरियत कानून या आजादी की बात कर रहे हैं उन्हें अतीत के इतिहास से काफी कुछ सीख लेना चाहिए। जो लोग अरब के अमीर इस्लाम का उदहारण देते हैं उन्हें भी समझ लेना आवश्यक होगा कि कुछ अरब देश इस कारण अमीर नहीं है कि वहां कोई इस्लामिक कानून है बल्कि उसका कारण प्राकृतिक गैस और तेल जैसे खनिज पदार्थ हैं। जबकि कश्मीर जैसे राज्य में ऐसा कुछ नहीं है वहां की सुन्दरता पर्यटकों को आकर्षित करती हैं न कि मजहबी मस्जिदें और इस्लामिक रीति-रिवाज! जो अलगावादी नेता आज कश्मीरी अवाम को पाकिस्तान से जुड़ने की सलाह दे रहे हैं आखिर उनका आधार क्या है? क्या पाकिस्तान में सिन्धी, बलूची, कच्छी खुश हैं? तो कश्मीरी समुदाय कैसे किस लिहाज से उनसे जुड़ पायेगा? दूसरा यदि आज कश्मीर में हिन्दू बहुसंख्यक होता तो क्या वह भारत से दूर जाने की सोचता? इस कारण ये भी कहा जा सकता है कि कश्मीर को आजादी भारत से नहीं कट्टरपंथ से चाहिए.

इस कारण विवाद फिर वही घूमकर आएगा। मात्र मजहबी कानूनों से कोई देश खुशहाल नहीं हो सकताऋ उदहारण के लिए सीरिया, सूडान, लीबिया, इराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान और खुद पाकिस्तान में कितनी खुशहाली है? कश्मीरी समुदाय इस बात पर भी चर्चा करे। उन्हें स्वीकार करना जरूरी भी है कि दुविधा वाली स्थिति क्यों बनी कि इस्लाम शांतिपूर्ण है और शांतिपूर्ण नहीं भी है? इसलिए इसके यह भी स्वीकार करना आवश्यक होगा कि इस्लाम में मजहबी आतंक और उसकी मांगे असामान्य रूप से विषैली और ताकतवर है जो इसे अन्य समुदायों से अलग ही नहीं करती वरन नफरत से देखने की और भी इंगित करती है। आज इस्लाम को आजादी नहीं नवजागरण चाहिए इस्लामिक युवाओं को आगे बढ़कर सच्चाई समझनी होगी। इससे निपटने की जरूरत है लेकिन इससे निपटने के लिए हमें पहले इसे इसके असली नाम से बुलाना होगा। कब तक अपनी बेतुकी मांगों को जायज ठहराने के लिए कुरान की आयतों और हदीसों ;पैंगबर की बातें और उनके कामद्ध का हवाला देते रहेंगे। सभी आतंकी गुट लोकतंत्र को खारिज करते हैं। शरियत के नाम पर मानसिक गुलामी की ओर धकेलते हैं इसके बाद यदि कुछ मिलता है तो शरियत के बदले सिर्फ खंडहर जिसका नवीन उदाहरण इराक का मोसुल शहर है। जो हम सबके सामने अपनी प्रस्तुति का हवाला देकर आंसू बहा रहा है।

-राजीव चौधरी

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