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क्या ये देश के समाजिक पतन का संकेत नहीं?

Aug 4 • Samaj and the Society • 151 Views • No Comments

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बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में स्थित एक बालिका गृह में काफी समय से मासूम बच्चियां जिन्हें अपना मानकर जिनके बीच अपना बचपन जीती रही उन्हीं अपनों की बुरी हरकतों से बच्चियों का बचपन सहम गया है। इन बच्चियों को शारीरिक व मानसिक रूप से तोड़ने वाला कोई और नहीं बल्कि वह है जिनके साथ वे खुद को सुरक्षित समझती थीं। सामाजिक सेवा के नाम पर चल रहे बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में स्थित एक बालिका गृह में रह रहीं 42 लड़कियों में से 34 के साथ बलात्कार होने की पुष्टि हो चुकी है। इससे पहले यहां रह रहीं 29 लड़कियों से बलात्कार की पुष्टि हुई थी। दिन पर दिन आगे बढी़ जाँच और उनसे उठ रहे सवालों को देखकर लगता है कि इस इमारत की दीवार पर बालिका गृह, देख-रेख एवं संरक्षण की जगह यदि कोई बालिका यातना गृह लिख दे तो शायद कुछ गलत नहीं होगा।

पिछले एक जून को इस पूरे मामले के खुलासा तब हुआ था, जब समाज कल्याण विभाग के आदेश पर बालिका गृह चलाने वाले एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति के संचालकों पर पॉस्को और यौन उत्पीड़न की धाराओं में केस दर्ज कराया गया था। इस मामले में सेवा संकल्प एवं विकास समिति के संचालक ब्रजेश ठाकुर समेत 10 आरोपी जेल में हैं, जबकि एक फरार है। इनमें आठ महिलाएं भी हैं। बालिका गृह यौन शोषण मामले में कई बड़े सफेदपोश और रसूखदार पुलिस की रडार पर हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि ब्रजेश ठाकुर बच्चियों के साथ न केवल मारपीट करता था, बल्कि उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां भी देता था। मालूम हो कि टीआईएसएस ने 7 महीनों तक 38 जिलों के 110 संस्थानों का सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण में बिहार के बालिका गृह को लेकर खुलासे हुए थे।

रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि रेप से पहले बच्चियों को मिर्गी का इंजेक्शन देकर उन्हें बेहोश किया जाता था। पुलिस ने यहां छापा मारकर 63 तरह की दवाएं भी जब्त की हैं। शोषण की शिकार हुई सभी बच्चियां 18 साल से कम उम्र की हैं। इनमें भी ज्यादातर की उम्र 13 से 14 साल के बीच है। बालिका गृह के कमरों में लक्ष्मी और दुर्गा के कैंलेंडर टंगे हैं किन्तु बच्चियां प्रताड़ना के जो किस्से बता रही हैं उसे सुनकर खून ठंडा पड़ जाए या खून खौलने लगे, इसे तय नहीं किया जा सकता है। इसे राष्ट्रीय शर्म का विषय कहें या सामाजिक शर्म का पर राजनितिक शर्म तो इस मामले में कहीं दिखाई दे नहीं रही है। क्योंकि विधानसभा में रेप अभियुक्तों के साथ सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की तस्वीरें लहराई जा रही हैं।

आज देश मौन है। क्यों मौन है? ये प्रश्न अपना वजूद खोता जा रहा है। आखिर क्यों 15 मार्च को सौंपी गई ये रिपोर्ट दो महीने तक समाज कल्याण विभाग में धूल खाती रही। यदि उक्त विभाग संवेदनशील होकर मामले पर तुरन्त कार्यवाही कर देता तो शायद ये बच्चियां और दो महीने पहले इस यातना गृह से मुक्त करायी जा सकती थी। प्राकृतिक आपदा में अपने परिवार खो चुकी, बेसहारा होकर यहाँ पहुंची ये बच्चियां नहीं जानती होंगी कि यहाँ आकर अपना सब कुछ गँवा देगी।

ज्ञात हो इसी तरह का मामला पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उजागर हुआ था जब पुलिस ने एक मदरसे से 51 लड़कियों को छुड़ाया था। मामला उस समय संज्ञान में आया था जब मदरसे की छत पर चढ़कर छात्राओं ने पर्ची फेंककर लोगों से मदद की गुहार लगाई थी। वहीं एक पीड़िता ने मदरसा संचालक मो. तैयब जिया पर लड़कियों का यौन शोषण और लड़कियां सप्लाई करने का भी आरोप लगाया था। इससे पहले एक ऐसा ही रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला साल 2013 में छत्तीसगढ़ के कांकेड़ झलियामारी में एक आदिवासी गर्ल्स हॉस्टल में से आया था जहाँ साल 2011 से हॉस्टल चौकीदार और एक कर्मचारी 11 लड़कियों के साथ कुकर्म करते रहे और बच्चियां सब कुछ भुगतने को मजबूर रहीं।

घिनौनी वारदात की लिस्ट लम्बी है जो स्वस्थ बाल मन को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर दे रही है। कहा जाता है कि हम जो कुछ भी अपने बचपन में देखते हैं, सुनते हैं, सीखते हैं या फिर सहते हैं वह जिन्दगी भर हमारे साथ रहता है। चाहें इसमें अच्छे अनुभव हो या बुरे शायद अब ये लड़कियां भी जीवन भर इस मानसिंक त्रासदी से जूझती रहेंगी क्योंकि महिला या बच्चियों के प्रति होने वाली यौन हिंसा के बारे में लोगों का रवैया उदासीन है। किसी समाज की संवेदनशीलता का स्तर उसके अपने बच्चों के साथ किये गए व्यवहार से परिलक्षित होता है। यदि इस देश के आंकड़े देखें तो शायद जरा भी गर्व की अनुभूति अन्दर शेष न बचे राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में बाल यौन उत्पीड़न के मामले तीन सौ छत्तीस प्रतिशत बढ़ गए हैं। साल 2001-2011 के बीच कुल 48,338 बच्चों से यौन हिंसा के मामले दर्ज किये गए, साल 2001 में जहाँ इनकी संख्या 2,113 थी वहीं 2011 में बढ़कर 7,112 हो गई। ये सब उस देश की स्थिति है जहाँ यौन हिंसा किसी भी सामाजिक स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और बच्चों को भगवान का रूप बताया जाता है।

मीडिया आज भी बाल यौन-शोषण जैसे मामलों को गंभीरता से नहीं कवर करता है। हमारे समाज का एक रूप इतना दकियानूसी है कि इस गंभीर अपराध को हमेशा छिपाकर रखने की कोशिश करता है। हम हत्या, चोरी, भ्रष्टाचार के अपराध को समाजिक पतन से जोड़कर देखते हैं लेकिन क्या बाल यौन-शोषण जैसे मुद्दे को अनदेखा कर दिया जाना सही है? क्या ये देश के समाजिक पतन का संकेत नहीं?

 लेख- राजीव चौधरी

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