क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओंगे?

Aug 20 • Arya Samaj, Samaj and the Society • 620 Views • No Comments

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हम सब लम्बे समय से सुनते आये है कि क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओंगे किन्तु बहुत कम लोग देखे सुने जिन्होंने इस वाक्य को जीवन में उतारा और जिन लोगों ने इस वाक्य को जीवन का आधार वाक्य बना लिया वो ही इस दुनिया में अमर हो गये क्योंकि अंततः यह सिद्ध है कि क्या लेकर आये थे क्या लेकर जाओंगे?
23 दिसम्बर को 89 वां स्वामी श्रद्धानन्द जी का बलिदान दिवस हमे बार-बार यहीं प्रेरणा दे रहा है कि दानी तो ना जाने कितने हुए किन्तु जमाना उनके सामने झुका जो यहाँ अपना सब कुछ अर्पण कर गये| एक ऐसी ही हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द जी थे सन 1856 को पंजाब के जालंधर जिले के तलवन गाँव में जन्मे मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) के निराशापूर्ण जीवन में आशा की क्षीण प्रकार रेखा उस समय उदय हुई, जब बरेली में उन्हें स्वामी दयानन्द का सत्संग मिला| स्वामी जी के गरिमामय चरित्र ने उन्हें प्रभावित किया| उस समय जहाँ भारतवर्ष के अधिकतर नवयुवक सिवाय खाने-पीने, भोगने और उसके लिए धनसंचय करने के अलावा अपना कुछ और कर्तव्य ना समझते थे गुलामी में जन्म लेते थे और उस दासता की अवस्था को अपना भाग्य समझकर गंदगी के कीड़ों की तरह उसी में मस्त रहते थे उस समय आर्यावर्त की प्राचीन संस्कृति का सजीव चित्र खींचकर न केवल आर्यसंतान के अन्दर ही आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया अपितु यूरोपियन विद्वानों को भी उनकी कल्पनाओं की असारता दिखाकर चक्कर में डाल दिया| जिस समय लोग राजनैतिक और धार्मिक दासता का शिकार थे| जिस समय लोग दुर्व्यसनो में लीन थे उस समय स्वामी श्रद्धानन्द जी ने लोगों को आत्मचिंतन, राष्ट्रचिन्तन करना सिखाया| ऋषि देव दयानन्द के अनुगामी जिन्होंने स्वयं का अध्यन कर अपने अन्त:करण के परिवर्तनों को खोलकर जनता के सामने रख दिया| सेवा कार्य चाहें व्यक्तिगत हो अथवा सामाजिक हो, बहुत ही कठिन होता है उसको पार पाना योगियों के लिए भी संभव नहीं| फिर भी जो लोग समाज सेवा में संलग्न रहते है, सचमुच वे फौलाद का दिल रखते है समाज के कल्याण के लिए मन समर्पित करने वालों की संख्या सर्वाधिक होती है उसके बाद वो लोग होते है जो धन समर्पित करते है बहुत विरले लोग होते होते है जो अपना तन,मन,धन, और तो और अपना परिवार तक समर्पित करते है अपनी पुत्री वेदकुमारी और अमृत कला को उस समय गुरुकुल में पढने के लिए भेजा जब अधिकांश लोग स्त्री शिक्षा के खिलाफ थे| अपने पुत्रो को गुरुकुल में पढ़ाने भेजा अपनी संपत्ति अपना परिवार, अपना जीवन और अपना सर्वस समाज के लिए दान करने वाले अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द जी को शत-शत नमन |

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