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क्यों आएं आप आर्य महासम्मेलन में?

Oct 6 • Arya Samaj • 566 Views • No Comments

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 लेख-विनय विद्यालंकार (प्रधान) आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तराखंड

आर्य समाज के सर्वोदय संगठन सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा 25 से 28 अक्तूबर 2018 को दिल्ली के स्वर्ण जयन्ती पार्क रोहिणी में अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। जिसकी गत वर्ष से ही तैयारी की जा रही है। भारत के कोने-कोने में जहां भी आर्य समाज की छोटी सी भी इकाई है वहां तक उत्साह की लहर है। भारत के बाहर भी अनेक देशों के आर्यजन इस सम्मेलन में आने का कार्यक्रम बनाकर आयोजकों को सूचित कर चुके हैं। लाखों आर्यजनों के सम्मिलित होने की सूचना है। यह तो ठीक है कि सम्मेलन की तैयारी भी हो रही है, लोगो के आने की भी सूचना है, ऐसे में आपके मन में एक प्रश्न उपस्थित हो रहा होगा कि आखिर इन सम्मेलनों का लाभ क्या है? क्यों इतना काम किया जाता है? संस्था के पदाधिकारियों द्वारा प्रत्येक देश, राज्य, नगर में जाकर इसका प्रचार किया जाता हैं, धन संग्रह करते हैं, विद्वानों, संन्यासियों, उपदेशकों, गुरुकुलों के संचालकों व आचार्यों के साथ-साथ राजनेताओं को बुलाया जाता है। इन सबके अतिरिक्त हम जैसे आर्यजन अपने काम पर कहां जाते है आदि-आदि।

       आर्य समाज एक सुधारवादी संस्था और संगठन है, जो 1875 से निरन्तर समाज की कुप्रथाओं, धर्म की अवैदिक मान्यताओं, शिक्षा की अपूर्ण विधियों, संस्कृति के दोषों और व्यक्तिगत जीवन के दुर्गुण-दुव्यस्थियों को दूर करने का संकल्प लेकर कार्य कर रहा है। इस संस्था के गौरवशाली इतिहास से हम सभी परिचित है। समय के साथ-साथ चुनौतियां बदलती रहती हैं। कभी आर्य समाज के सन्मुख सती-प्रथा, बाल विवाह, स्त्री-शिक्षा का न होना, विधवा विवाह न होना एवं भारत की पराधीनता जैसी समस्या थी, जिनके समाधन के लिए पूरी शक्ति से कार्य किया और उन कुरीतियों का उन्मूलन भी हुआ। आर्य समाज के विद्वान् सन्यासियों व उपदेशकों ने ऋषि की मुख्य योजना, वेदों की सार्वभौमिकता, सार्वकालिकता व सार्वजनीनता को सिद्ध करने का भी प्रमुख कार्य किया। प्रचुर साहित्य वेद सम्मत लिखा। वेद की प्रतिष्ठता के लिए पौराणिकों, जैन-बौद्ध, इस्लाम-ईसाई मत के बड़े-बड़े मठाधीषों से लाभार्थ हुए ग्रंथ लिखे गये और साथ ही बड़े-बड़े सम्मेलन करके भी आर्य समाज की शक्ति का अहावन कराते रहे। जिनमें ऋषि जन्म शताब्दी 1924 ई. में, सत्यार्थ प्रकाश शताब्दी, आर्य समाज स्थापना शताब्दी, ऋषि निर्वाण शताब्दी आदि प्रमुख है। मध्य में जब संगठन कुछ शिथिल हुआ तो पुनः अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन 2006 में दिल्ली में आयोजित हुआ जिसमें भारत के अतिरिक्त अनेक देशों का प्रतिनिध्त्वि रहा और निर्णय किया गया कि प्रतिवर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन आयोजित किए जाएं। भारत के बाहर 5 वर्ष तक अलग-अलग राष्ट्रों में सम्मेलन होंगे और छटे वर्ष भारत में होगा। इसका लाभ यह होगा कि जिस देश में यह सम्मेलन होगा उस देश की आर्य समाजें सक्रिय होंगी उनकी उर्जा का परिचय होगा वहां की सुंदर प्राय इकाइयां भी जाग्रत होंगी।

       अब प्रश्न उठता है कि इन सम्मेलनों का संगठन को कितना लाभ होता है? इसका उत्तर सकारात्मक दृष्टि से विचार करने पर बिन्दुवाद प्रस्तुत करना उचित है-

1.जब कोई छोटी इकाई अपने क्षेत्रा में कार्य करती है तो उसके कार्यों में कई बार निराशा उत्पन्न करने वाले लोग सम्मिलित हो जाते है और कहते है अब आर्य समाज कहां सक्रिय है यह तो मृतप्राय संस्था है, इसके लोग तो केवल उंगलियों पर गिनने नामक है तो ऐसी इकाई को जब इन बड़े सम्मेलनों में आने का अवसर मिलता है तो पता चलता है कि आर्य समाज वर्तमान में भी एक वटवृक्ष के समान है। अनेक संस्थाएं, अनेक गुरुकुल, अनेक विद्यालय, अनेक लेखाप्रकल्प कार्य कर रहे हैं।

2.आर्य समाज क्योंकि वैचारिक आन्दोलन है इसलिए प्रत्येक इकाई में विचार के प्रचार का कार्यक्रम संमालित होना अनिवार्य है जिसके लिए विद्वान, उपदेशक, भजनोपदेशक व प्रचारकों की महती आवश्यकता होती है। प्रत्येक इकाई में अन्य महासम्मेलनों के विचारों का टकराव होना भी स्वाभाविक है, ऐसी स्थिति मे जब वे आर्यजन सम्मेलन में आते है तो अनेक विद्वान, उपदेशकों के विचारों का श्रवण करने से तर्क शक्ति सुदृढ़ होती है। सम्मेलन स्थल पर मुख्य मंच के अतिरिक्त अनेक समानान्तर सत्र चलते है जिनमें शंका समाधन, वेदगोष्ठी प्रमुख है। जहां आर्य जगत के उच्चकोटि के विद्वान्, संन्यासी, विचारक एक साथ मिल जाते है उनकी तर्कता से साक्षात होता है, सनिध्य मिलता है।

3.प्रायः आर्य समाजों में वही वृद्व आर्यजन ही उपस्थित रहते है तो ऐसा लगता है कि आर्य समाज में पुनःशक्ति है ही नहीं, परन्तु जब सम्मेलन में देशभर से आए हुए हजारों आर्यवीर व आर्य वीरांगनाएं व्यवस्थित रूप् से सम्मेलन की व्यवस्थाएं सम्भाल रहे होते हैं जो विध्वित प्रशिक्षित होते है। वे बौद्धिक व शारीरिक दोनो दृष्टियों से आर्य समाज की शक्ति का प्रदर्शन करते है तो पता चलता है कि आर्य समाज केवल वृद्धों की संस्था नहीं यहा युवाशक्ति को भी विधिवत प्रशिक्षित किया जा रहा है।

ऐसे ही अनेक बिन्दु और हो सकते हैं जिनकी भी चर्चा की जा सकती है परन्तु अभी इतनी चर्चा करके पाठकों से अनुरोध् करना चाहूंगा कि हम आप सभी सुधार व संसार को श्रेष्ठ (आर्य) बनाने का संकल्प लेकर चले जिसमें सभी कार्य महत्वपूर्ण है-स्वाध्याय, यज्ञ, सत्संग, वेद प्रचार कार्यक्रम शास्त्रार्थ एवं सम्मेलन आदि। अतः ये अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन भी उसी का महत्वपूर्ण अंग है। आप स्वयं विचार करें कि- आपकी उपस्थिति परस्पर उत्साह को बढ़ाने वाली होगी, आयोजक भी आप ही है।

‘कृण्वन्तों विश्वमार्यम’

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