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गढ़वाल में डोला-पालकी समस्या और आर्यसमाज

Nov 9 • Samaj and the Society • 1016 Views • No Comments

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गढ़वाल में डोला-पालकी समस्या और आर्यसमाज

डॉ विवेक आर्य

गढ़वाल में सवर्णों तथा स्थानीय मुसलमान युवक -युवतियां के विवाह के अवसरों पर डोला-पालकी के उपयोग की परंपरा सदियों से रही है। बारात में डोला-पालकी उठाने का कार्य मुख्यत शिल्पकार ही करते थे। किन्तु सवर्ण समाज ने उन्हें अपने ही पुत्र पुत्रियों के विवाह के अवसर पर डोला-पालकी के प्रयोग से वंचित कर दिया था। शिल्पकार वर वधुओं को डोला-पालकी तथा ऐसी सवारियों पर बैठने का सामजिक अधिकार नहीं दिया गया था। नियम के प्रतिकूल आचरण करने वाले शिल्पकारों को दण्डित किया जाता था।

गढ़वाल में आर्य समाज की स्थापना के प्रारम्भ में गंगादत जोशी (तहसीलदार) जोतसिंह नेगी (सेंताल्मेंट आफसर),नरेंद्र सिंह (चीफ रीडर) आदि प्रबुद्ध लोगों ने आर्य समाज के विचारों को जनता तक पहुँचाने का कार्य किया था। किन्तु असंगठित और कम व्यापक होने के कारण इनके प्रयत्न सीमित क्षेत्र तक ही प्रभाव स्थापित कर सके।

यह वर्ग सवर्णों की अपेक्षा आर्थिक दृष्टि से भी बहुत पिछड़ा हुआ था। 20वीं शताब्दी के नवजागरण के प्रभाओं से उत्पन्न चेतना के फलस्वरूप शिल्पकार नेतृत्व के रूप में जयानंद भारती का आविर्भाव हुआ। सन 1920 के पश्चात जयानंद भारती के नेतृत्व मैं शिल्पकारों की सामजिक,आर्थिक,समस्याओं तथा,उनमें व्याप्त कुरीतियों के हल के लिए संघठित प्रयास किये गए। नेता जयानंद भारती ने सवर्ण नरेंद्र सिंह तथा सुरेन्द्र सिंह के साथ मिलकर शिल्पकारों में व्याप्त कुरीतियाँ दूर करने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया।

कुमाऊ में लाला लाजपत राय की उपस्थिति में सन 1913 में आर्य समाज के शुद्धिकरण के समारोह में शिल्पकारों को जनेऊ देने का कार्यकर्म चलाया गया।
शिल्पकारों को जनेऊ दिए जाने के फलस्वरूप गढ़वाल में भी आर्य समाज द्वारा सन 1920 के पश्चात् जनेऊ देने का कार्यक्रम चलाया गया था। शिल्पकारों के मध्य जन-जागरण कार्यक्रम के अर्न्तगत सवर्णों के एक वर्ग विशेष द्वारा शिल्पकारों के साथ संघर्ष की घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि रूढिवादी व्यक्ति समाज मैं परिवर्तन में अवरोधक बन गए थे।

गढ़वाल में ईसाई मिशनरियों के कारण निर्बल शिल्पकार वर्ग में धर्मांतरण की बढती रूचि बढ़ना एक बड़ी चुनौती थी । फलस्वरूप आर्यसमाज द्वारा ईसाई मिशनरियों के कुचक्र को रोकने के लिए शिल्पकारों के मध्य उनके सामाजिक, आर्थिक पिछडेपन को दूर करने के लिए प्रयत्न किये गए। इन प्रयासों में 1910 में दुग्गाडा में पहला आर्य समाज का स्कूल स्थापित किया गया था। तत्पश्चात 1913 में स्वामी श्रद्धानंद द्वारा आर्य समाज का स्कूल प्रारंभ किया गया। गढ़वाल में आर्य समाज से इन प्रारम्भिक प्रयत्नों से एक ओर जहाँ आर्य समाज के कार्य क्षेत्र में अपेक्षाकृत वृद्धि ही वही दूसरी ओर शिल्पकार में शिक्षा के प्रति रुझान भी बढ़ा। इससे शिल्पकारों के ईसाईकरण के प्रयास शिथिल पड़ने लगे। शिल्पकारों में अशिक्षा कितनी थी इसका अनुमान इसी तथ्य से चलता है कि प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व तक गढ़वाल में एक भी शिल्पकार इंट्रेस परीक्षा उतीर्ण नहीं था।

गढ़वाल मेंआर्य समाज को विस्तार देकर शिल्पवर्ग की सहानुभूति अपने पक्ष में करने के उद्देश्य से आर्य प्रतिनिधि सभा के उपदेशक सन 1920 में गढ़वाल के प्रमुख नगरो कोटद्वार,दुगड्डा,लेंसिदौन,प ोडी,श्रीनगर में भेजे गए। इनमें गुरुकुल कांगडी के प्रचारक नरदेव शास्त्री जी प्रमुख व्यक्ति थे। गढ़वाल में आर्य समाज के आन्दोलन के रूप में गाँवों तक पहुँचने के उद्देश्य से नगर-कस्बों के पश्चात् चेलू सैन,बीरोंखाल,उदयपुर,अवाल्सु ं,खाटली,रिन्ग्वाद्स्युं आदि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्य समाज की शाखाएं और विद्यालय आदि स्थापित कर ईसाई मिशनरी की चुनौती को स्वीकार किया गया।

1920 में आर्य समाज के तत्वावधान में अकाल राहत व शैक्षणिक कर्यकर्मों के प्रारम्भ होने के पश्चात् शिल्पकारों को सवर्णों के समान सामजिक अधिकार दिलाने के उद्देश्य से उनका जनेऊ संस्कार भी आर्यसमाज द्वारा आरंभ किया गया। इस प्रकार सन1924 में जयानंद भारती के नेतृत्व में डोला-पालकी बारातें संगठित की गई। इस प्रयास में कुरिखाल तथा बिंदल गाँव के शिल्पकारों की बारात ने डोला-पालकी के साथ कुरिखाल से बिंदल गाँव के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में कहीं भी सवर्णों के गाँव नहीं पड़ते थे।

कुरिखाल के कोली शिल्पकार भूमि हिस्सेदार होने के कारण अन्य शिल्पकारों की तुलना में संपन्न थे। दूसरी ओर उन्नी व्यवसाय के कुशल शिल्पी के रूप में इनके कुटीर उद्योग भी समृद्ध थे। इस स्थिति का लाभ उठाकर जातिवाद को चुनौती देने के उद्देश्य से आर्य समाजी नेताओं के संरक्षण में डोला-पालकी बारात निकाली गई। किन्तु एक घटना के अनुसार दुगड्डा के निकट चर गाँव के संपन्न मुस्लिम परिवार के हैदर नामक युवक के नेतृत्व में हिन्दू सवर्णों द्वारा जुड़ा स्थान पर शिल्पकारों की बारात रोकी गई। तत्पश्चात डोला-पालकी तोड़कर बारातियों के साथ मार- पीट की गयी। प्रशासन के हस्तक्षेप किये जाने के उपरांत भी चार दिन तक बारात मार्ग में ही रुकी रही। ऐसी अनेक घटनाएं उस काल में हुई। आर्य समाज के प्रभाव में आकर जब जब दलितों ने डोला-पालकी में नवविवाहितों को बैठाने का प्रयास किया तब तब उनके साथ मारपीट और लूटपाट की गयी। ऐसा व्यवहार दलितों की सैकड़ों बारातों के साथ हुआ। भारती जी न केवल संघर्ष के मोर्चे पर खड़े हुए बल्कि अदालतों में भी वाद दायर किये।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दलित शिल्पकारों के हक़ में फैसला दिया गया। लेकिन सवर्णों का अत्याचार रुका नहीं। जयानंद भारतीय ने सत्याग्रह समिति बना कर इन अत्याचारों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखी। देश के बड़े नेताओं गोविन्द बल्लभ पन्त, जवाहर लाल नेहरु और महात्मा गांधी को भी उन्होंने इन अत्याचारों से अवगत कराया गया। गांधी जी को पत्र लिख कर,उन्होंने आग्रह किया कि गढ़वाल में शिल्पकारों की बारातों पर अत्याचार बंद होने तक वे व्यक्तिगत सत्याग्रह पर रोक लगा दे। गांधी जी ने भारतीय जी के पत्र को गंभीरता पूर्वक लिया और गढ़वाल में हरिजनों के उत्पीड़न बंद होने तक व्यक्तिगत सत्याग्रह पर रोक लगा दी। अखिल राष्ट्रीय स्तर पर डोला-पालकी के लिए यह संघर्ष किया गया।

अंत में अनेक प्रयासों जनजागरण के पश्चात शिल्पकारों को अपना हक आर्यसमाज ने दिलवाया। डोला-पालकी आंदोलन लगभग 20 वर्ष तक चला। इस आंदोलन के प्राण जयानंद भारती थे। एक निम्न शिल्पकार परिवार में जन्म लेकर जयानंद भारती ने स्वामी दयानंद के समानता के सन्देश को जनमानस तक पहुँचाने के लिए जो संघर्ष किया। यह अपने आप में एक कीर्तिमान है।

आज हमारे देश की दलित राजनीति में जयानंद भारती और आर्यसमाज के दलितौद्धार के कार्य को पुनः स्मरण तक नहीं किया जाता। केवल डॉ अम्बेडकर और ज्योतिबा पहले के प्रयासों का स्मरण किया जाता हैं। कारण वोट बैंक की राजनीती है। आईये हम उन महापुरुषों के योगदान से समाज को अवगत करवाये।

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