gurukul chotipura

गुरूकुल शिक्षा प्रणाली बनाम् पब्लिक स्कूल

Jan 16 • Vedic Views • 4853 Views • No Comments

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मानव सन्तान को षिक्षित करने के लिए एक पाठषाला या विद्यालय की आवष्यकता होती है। बच्चा घर पर रह कर मातृ भाषा तो सीख जाता है परन्तु उस भाषा, उसकी लिपि व आगे विस्तृत ज्ञान के लिए उसे किसी पाठषाला, गुरूकुल या विद्यालय मे जाकर अध्ययन करना होता है। केवल भाषा से ही काम नहीं चलता अपितु अनेक विषय हैं जिनका ज्ञान गुरूकुल, पाठषाला या विद्यालय में कराया जाता है। उदाहरण के लिए मातृ भाषा के साथ हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी व कुछ अन्य भाषायें भी आश्यकतानुसार सीखनी होती है। भाषा के साथ गणित, सामान्य ज्ञान, कुछ अध्यात्म, इतिहास, भूगोल, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, व्यायाम, रक्षा, चिकित्सा, कला आदि अनेक विषय हैं जिनका ज्ञान आज के समय में अति आवष्यक है। जीवन में मनुष्य को अपना व अपने भावी परिवार का जीवनयापन भी करना होता है अतः रोजगार दिलाने वाले व्यवसायिक विषयों का ज्ञान भी आवष्यक है। आजकल माता-पिता अपने सन्तानो को विज्ञान, वाणिज्य,कम्प्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग व चिकित्सा आदि की षिक्षा दिलाते हैं जिससे वह किसी रोजगार से जुड़ कर सफलतापूर्वक भावी जीवन व्यतीत कर सके।

शिक्षा पद्धति की चर्चा आने पर आजकल मुख्य रूप से पब्लिक स्कूल पद्धति प्रचलित है जहां बच्चे को प्रायःअंग्रेजी भाषा के माध्यम से अध्ययन कराया जाता है और इसी भाषा के माध्यम से उसे गणित, साइंस व कला की शिक्षा दी जाती है। इण्टर या ग्रेजुएशन करलेने पर वह इंजीनियरिंग, मेडीकल साइंस आदि अपने इच्छित विषय को लेकर व्यवसायिक कोर्स या स्नातक व स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त कर सकता है जिसके बाद उसे रोजगार मिल जाता है और वह सुख-सुविधा पूर्वक जीवन व्यतीत करता है। दूसरी षिक्षा पद्धति हमारी प्राचीन गुरूकुलीय पद्धति है। गुरूकुल का उद्देष्य बालक का षारीरिक, बौद्धिक, मानसिक व आत्मिक सर्वागीण विकास करना होता है। यहां हम शिक्षा के बारे मे स्वामी दयानन्द की मान्यता का उल्लेख करना उचित समझते हैं। वह लिखते हैं कि षिक्ष उसको कहते हैं जिससे विद्या, सभ्यता, धर्मात्मता व धर्म में प्रवृत्ति, जितेन्द्रियतादि की वृद्धि होवे और अविद्यादि दोष छूटें। अज्ञान व बन्धनों से छूटना जिससे सिद्ध हो वह भी विद्या होती है। षिक्षा व भाषा अर्थात् षिक्षा का मरध्यम का भी परस्पर गहरा सम्बन्ध है। बच्चा अंग्रेजी पढ़े इससे किसी का विरोध नहीं है परन्तु पहले वह मातृ भाषा सीखे, तत्पष्चात, भारत पृष्ठभूमि का बच्चा, हिन्दी व संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त करे, इनके माध्यम से वेद, उपनिषद्, दर्शन , मनुस्मृति,बाल्मीकी रामायण व महाभारत आदि का विस्तृत या काम चलाऊ ज्ञान प्राप्त करे, उसके बाद व साथ मे वह अंग्रेजी, गणित व साइंस आदि विषयों का ज्ञान भी प्राप्त करे तो इसमे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। हिन्दी व संस्कृत के ज्ञान से वह भारत के आम व्यक्ति से जुड़ जाता है जबकि पहली कक्षा से अंग्रेजी का अध्ययन उसे कई प्रकार से हिन्दी पृष्ठभूमि के बच्चों से दूर करता है। हिन्दी में भी ज्ञान, विज्ञान सहित इतिहास, भूगोल व अध्यात्म विषयक विषद साहित्य है जो केवल अंग्रेजी को जानकर व उसमे अध्ययन कर उनसे लाभान्वित नहीं हुआ जा सकता। ऐसा व्यक्ति सर्वागीण व्यक्तित्व वाला न होकर एकांगी होता है। अन्य विषयों की षिक्षा के साथ अध्यात्म विज्ञान विषय का विषद ज्ञान तो अनिवार्य कोटि मे आना चाहिये इससे व्यक्ति चरित्रवान व कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनता है।

अध्यात्म का अनिवार्य ज्ञान क्यों?, तो इसका उत्तर है कि प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम यह जानना है कि यह संसार कब, कैसे व किसके द्वारा बनाया गया है। संसार को बनाने वाली सत्ता कौन है व अब कहां है? वह दिखाई क्यों नहीं देती? क्या उसे देखा जा सकता है? यदि हां तो कैसे और नही तो क्यों? उसका देखना आवष्यक है या नहीं? यदि आवष्यक है तो क्यों व उससे हमे व सब देखने वालो को क्या लाभ होगा? हम कौन हैं? हममें जो चेतन तत्व अर्थात् जो हम स्वयं है, वह कैसे उत्पन्न होता है? क्या वह अनादि, अनुत्पन्न, नित्य व अविनाषी है या उत्पन्न हुआ व मरण धर्मा है?  यदि जीवात्मा उत्पन्न धर्मा व मरण धर्मा है तो हमें किसने व किस प्रयोजन से बनाया है? सृष्टि को किस पदार्थ, वस्तु या raw material या कारण तत्व से बनाया गया है? क्या यह सृष्टि पहली बार बनी है या इससे पूर्व भी बनी है? यदि इससे पूर्व भी बनी है तो उसमें क्या युक्ति व प्रमाण है और यदि पहली बार ही बनी है तो इसमे भी क्या युक्ति व प्रमाण है? मनुष्यों की आकृति-षकल-सूरत, लम्बाई, चैड़ाई, आकार-प्रकार व सुन्दरता-असुन्दरता तथा ज्ञान व अज्ञान का भेद क्यों है? क्या हम जो कर्म करते हैं उनका फल हमें भोगना होगा या वह क्षमा हो जायेगें? यदि वह क्षमा होते हैं तो कौन क्षमा करता है व क्यों करता है, उसके नियम क्या हैं एवं कब, कैसे व किसने बनाये हैं? यदि नहीं होते तो क्यों नहीं होते? ऐसे अनेकानेक प्रष्न है जिसके लिए हमें हिन्दी व संस्कृत का अध्ययन तथा साथ मे वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन भी करना है। अग्रेजी व दुनियां की अन्य किसी भी भाषा का अध्ययन करलें, इन व ऐसे प्रष्नो के पूर्ण व सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिलते। अतः हिन्दी व संस्कृत का अध्ययन परम आवष्यक हैं। यह न केवल भारतीय व हिन्दी भाषियों के लिए अपितु दुनियां के सभी लोगों के लिए समान रूप से आवष्यक एवं उपादेय है।

शिक्षा व अध्ययन द्वारा हमें यह भी जानना है कि हमारे जन्म व जीवन का उद्देष्य क्या है अन्यथा षिक्षा अधूरी सिद्ध होगी व जीवन को सन्मार्ग के स्थान पर कुमार्ग पर ले जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का जो उद्देष्य है,उसका उत्तर वेद व वैदिक साहित्य मे ही मिलता है। हमारे जीवन का उद्देष्य सदा-सदा के लिए जन्म-मरण के दुःखों से मुक्ति व निवृत्ति है जो वैदिक षिक्षाओं का पालन यथा, सन्ध्या, यज्ञ, माता-पिता-आचार्य-गुरूजनों-वृद्धों की सेवा तथा पषु-पक्षियों आदि अन्य जीव-जन्तुओं के प्रति मैत्रीभाव रखकर प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ योगाभ्यास व योगसाधना से ईष्वर का साक्षात्कार कर परम सुख व आनन्द की प्राप्ति होती है जो भौतिक पदार्थो से कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है। इसे केवल वेदों के आचार्य व अध्येता ही समझा सकते हैं। संक्षेप मे यह जान लेना उचित होगा कि ईष्वर सर्वव्यापक और आनन्दस्वरूप है एवं योग द्वारा उसका सान्निध्य मिल जाने से जीवात्मा के दुर्गण व दुःखादि दूर होकर ईष्वर के गुण आदि के अनुरूप होकर जीवात्मा व मनुष्य के दुःखों की निवृति व आनन्द की उपलब्धि होती है। सन्ध्या व ध्यान से ईष्वर का सान्निध्य प्राप्त होने पर ईष्वर का साक्षात्कार होता है और यह जन्म-मरण के दुःखों को दूर कर मुक्ति व मोक्ष प्रदान कराता है। अतः संस्कृत व हिन्दी के साथ अध्यात्म, वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन अति आवष्यक है। इसके साथ ही वह सम्पूर्ण षिक्षा जो अंग्रेजी पद्धति द्वारा दी जाती है, वह भी विद्यार्थियों को मिलनी चाहिये। इसके लिए ही गुरूकुलीय षिक्षा है जहां पुरातन व नवीन सभी विषयों का सम्यक अध्ययन कराया जाये।

गुरूकुलों में बच्चों को दुग्ध-फल व भक्ष्य कोटि का षुद्ध षाकाहारी भोजन कराया जाता है। मांसाहार, मद्य, अण्डा, धुम्रपान आदि व्यसनो का गुरूकुल षिक्षाएवं वैदिक जीवन में सर्वथा निषेध है। ब्रह्मचारी व्यायाम करते हैं एवं इसके साथ योगाभ्यास भी करते है। सभी प्रकार की खेल-क्रीडाओं व जूडो-कराटे, सूटिंग आदि का प्रषिक्षण भी दिया जाता है। कलाबाजी या जिमानस्टिक की षिक्षा की भी व्यवस्था की जाती है। इससे बालक का षरीर पुष्ट व बलवान होता है। स्वस्थ षरीर मे ही स्वस्थ मन, बुद्धि व आत्मा हो सकते हैं। अतः गुरूकुल का बालक या ब्रह्मचारी बौद्धिक दृष्टि से अधिक सक्षम होता है और सभी विषयों को सरलता से ग्रहण कर सकता है। यदि गुरूकुल मे रहकर बच्चे कक्षा 12 या इण्टर तक की भी षिक्षा प्राप्त कर लें तो उनकी बुनियाद सुदृण हो जाती है और इसके बाद वह आधुनिक षिक्षा के केन्द्रों मे अध्ययन कर व्यवसायिक विषयों की षिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। देहरादून की पष्चिमी दिषा मे पौधा नामक ग्राम मे एक गुरूकुल है जहां बालक व युवक प्राचीन गुरूकुलीय षिक्षा पद्धति से अध्ययन कर रहें हैं। यहां ब्रह्मचारी रवीन्द्र तथा ब्रह्मचारी अजीत आदि अनेक युवकों ने अध्ययन किया है और सम्प्रति वह सफल जीवन की ओर अग्रसर हैं। श्री रवीन्द्र एक महाविद्यालय मे प्रवक्ता हैं। उनका व्यक्तित्व प्राचीन व आधुनिक जीवन पद्धति का सम्मिश्रण है जो अन्यतम है। श्री अजीत भी एक प्रतिभाषाली युवक हैं। वह स्नात्कोत्तर षिक्षा पूरी करने के बाद आगे का अध्ययन कर रहे हैं। बहुत ही ओजस्वी वक्ता हैं एवं भव्य व्यक्तित्व के धनी है। इसके साथ वह स्वाभिमानी हैं एवं आत्म विष्वास के धनी है। ऐसे ही अन्य ब्रह्मचारी, विद्यार्थी व युवक गुरूकुल मे हैं। आज की आधुनिक व प्राचीन षिक्षा की सभी षेषताओं को लेकर गुरूकुल को नया स्वरूप प्रदान कर गुरूकुल से इच्छित लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं, ऐसा हमारा अनुमान व विष्वास है।

हम देखते हैं कि एक ही विद्यालय के सभी विद्यार्थियों की योग्यता समान नहीं होती। कई बहुत मेधावी व पढ़ाये
जाने वाले विषयों को पूरी तरह ग्रहण कर लेते हैं तो बहुत से नहीं कर पाते। अध्ययन में अनेक बाते काम करती हैं। अध्यापकों के गुणी व योग्य होने के साथ स्कूल प्रषासन, बच्चे का स्वयं का पुरूषार्थ, बच्चे के पूर्व जन्म व इस जन्म के संस्कार व इस जन्म की पारिवारिक पृष्ठभूमि व परिवेष आदि अनेक कारण होते हैं। ऐसा ही गुरूकुल मे भी होता है। आज 3 देष भर मे गुरूकुलों की संख्या तो बहुत है परन्तु सरकारी सहायता प्राप्त न होना, साधनो का अभाव, अच्छे भवन, यन्त्र, उपकरण की अपर्याप्त व्यवस्था, षिक्षा व पाठ्य सामग्री की कमी और आचार्यो के उचित वेतन व उनके सम्मान आदि की समुचित व्यवस्था मे त्रुटियों के होनें के साथ-साथ अनेक गुरूकुल के संचालकों में षिक्षा के प्रति दूरदर्षिता व आधुनिक अच्छीबातों को अपनाने का अभाव जैसी प्रवृत्तियां भी होती हैं जिससे गुरूकुल के विद्यार्थियों के विकास व उन्नति मे कुछ बाधायें आती हैं। यदि आज सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को गुरूकुल का रूप देते हुए उन्हें आवासीय षिक्षणालय बनाकर वहां
प्रातः सायं सन्ध्या, अग्निहोत्र के साथ वैदिक आर्ष व्याकरण व इतर वैदिक आर्ष ग्रन्थों यथा सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, मनुस्मृति, उपनिषद्, दर्षन व वेद आदि का अध्ययन अन्य सामान्य गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान आदि के साथ कराया जाये तो परिणाम अच्छे हो सकते हैं। हमने अनुभव किया है कि बडे़-बडे़ पदों पर प्रतिष्ठित, बहुषिक्षित व पठित व्यक्तियों के जीवन भी अध्यात्म व चारित्रिक दृष्टि से अत्यन्त दुर्बल, अपूर्ण व शून्य प्रायः है। उनमे प्राचीन वेद कालीन भारतीय संस्कृति का न तो यथोचित ज्ञान है और न उसका गौरव। अंग्रेजी के कुछ ग्रन्थों को पढ़कर उसके अन्धभक्त होकर वह स्वयं को विद्वान, अधिकारी व ज्ञानी होने का दम्भ करते हैं। ऐसे लोगों मे देष के दुर्बल, अषिक्षित, निर्धन, भोले भाले लोगों के प्रति सहानुभूति व संवेदनाओं का भी अभाव पाया जाता है।

महर्षि दयानन्द ने ‘मनुष्य’ की परिभाषा की है। वह लिखते हैं कि ‘मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नही किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्ममात्माओ की चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहितक्यों न हों – उनकी रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती , सनाथ, महाबलवान् और गुणवान भी हों तथापि उसका नाष, अवनति औरअप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात जहां तक होंसके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उसको कितना ही दारूण दुःख प्राप्त हों, चाहे प्राण भी भले ही जावे, परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होंवे ।’ मनुष्य की यह परिभाषा संसार के साहित्य मे अपूर्व है एवं पूरी तरह से स्वामी दयानन्द के जीवन में चरितार्थ हुई देखी जा सकती है। आज इस परिभाषा को अपने जीवनो मे चरितार्थ करने वाले लोगों का अभाव है। ऐसा मनुष्य केवल वैदिक गुरूकुल मे ही बन सकता है, स्कूली षिक्षा में इसलिये नहीं कि वहां तो विद्यार्थी का उद्देष्य धनोपार्जन व सुख-सम्पत्ति से युक्त आरामदायक जीवन व्यतीत करना है। राम, कृष्ण, पंतजलि, गौतम, कणाद, कपिल, वेदव्यास, षंकर, चाणक्य आदि गुरूकुल षिक्षा पद्धति की ही देन थे और हम यह कह सकते हैं कि उनमे यह परिभाषा ठीक-ठीक व प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती थी। हमारे देष के क्रान्तिकारी चन्द्रषेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, अषफाक उल्ला खां, रोषन सिंह व लाहिड़ी, खुदीराम बोस, योगी अरविन्द एव ऐतिहासिक पुरूष वीर षिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह आदि इस परिभाषा को अपने जीवन में चरितार्थ करते थे। इन महान विभूतियों ने देष, धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए जो कष्ट सहे, वह स्वतन्त्र भारत केबड़े से बड़े किसी नेता व व्यक्ति ने नहीं सहे। वस्तुतः इन्हो ने भी ‘मनुष्य’ की परिभाषा को सर्वांश मे अपने जीवनो में चरितार्थ किया था। स्वामी श्रद्धानन्द ने महर्षि दयानन्द से प्रेरणा पाकर कांगड़ी, हरिद्वार मे सन् 1902 में जो गुरूकुल खोला था उसका इतिहास भी स्वर्णिम हैं। वहां भी देषभक्त विद्वान, अध्यापक, उपदेषक, वेद भाष्यकार, इतिहासकार, चिकित्सक व वैद्य, पत्रकार व स्वतन्त्रता सेनानी उत्पन्न हुएं जिन्हो ने वेदों के आधार पर महर्षि दयानन्द द्वारा दी गई परिभाषा को अपने जीवन मे चरितार्थ किया था। हमें विष्वास है कि भविष्य मे गुरूकुल षिक्षा पद्धति श्रेष्ठ सिद्ध होगी और सारी दुनियां मे षिक्षा के सभी उद्देष्यों को पूरा करने के कारण इसे अपनाया जायेगा।

मनमोहन कुमार आर्य

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