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जम्मू-कश्मीर भी रहेगा और हिंदुस्तान भी रहेगा

Apr 15 • Samaj and the Society • 37 Views • No Comments

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जम्मू-कश्मीर भारत का एक ऐसा हिस्सा रहा है जो पिछले 70 सालों से कश्मीर के राजनेताओं की राजनीति की खुराक बना हुआ है। एक बार फिर देश में लोकसभा चुनाव है तो जाहिर सी बात है कश्मीर की तीन सीटों पर भी अगले कुछ चरणों में मतदान होगा। किन्तु मतदान से पहले जिस तरह के बयान सामने आ रहे है वह कश्मीर की वादियों को आग में झोकने वाले सुनाई पड़ रहे है। घाटी की अनंतनाग सीट से चुनाव लड़ रही महबूबा मुफ़्ती अपनी सीट बचाने के लिए हर वो तरीका अपना रही है चाहे उसके लिए घाटी में आग क्यों न लग जाएँ।

असल में भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में धारा 370 ख़त्म करने की बात कही गई है। इस पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी देते हुए है कि “अगर इसे ख़त्म किया गया तो भाजपा को मेरी चेतावनी है कि न जम्मू-कश्मीर रहेगा न हिंदुस्तान रहेगा।” “वो आग के साथ खेलना बंद कर दे, जम्मू कश्मीर बारुद है, आप चिंगारी फेंकोगे तो न जम्मू-कश्मीर रहेगा न हिंदुस्तान रहेगा”

ये तीखे बोल किसी अलगाववादी के नहीं है ये बोल है राज्य में कई वर्ष मुख्यमत्री रही एक जिम्मेदार महिला नेता महबूबा मुफ़्ती के। लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह बयान वोट लेने के लिए दिया है या फिर सचमुच ही कश्मीर को आग में झोखने का इरादा है? या इसके कारण और निवारण कहीं और छिपे हैं, यदि  ऐसा है तो धारा 370 जो कश्मीर में समस्या बनी है उसका समाधान कैसे होगा?

हालाँकि यह मुद्दा पूरे भारत के लिए बेहद संवेदनशील है, पर जम्मू-कश्मीर के लिए कुछ ज्यादा भावनात्मक है। बीजेपी के संकल्प पत्र में इसे ख़त्म करने की कोशिश का एलान करने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि “यदि ऐसा हुआ तो जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय का प्रावधान भी ख़त्म हो जाएगा और राज्य आजाद हो जाएगा”

अब इसमें पहला सवाल तो यही है कि कश्मीर राज्य किससे आजाद हो जायेगा? रोज होती आतंकी घटनाओं से, या अलगावादियों से? क्या कश्मीर आजाद हो जायेगा अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान के चंगुल से? सोचने वाली बात ये भी है कि अलगाव ये बेतुकी मांग सिर्फ घाटी से ही क्यों उठती है जबकि जम्मू और लद्दाख भी इसी राज्य का हिस्सा है. आज कबूतर की तरह आँख बंद कर लेने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि समझना होगा कि समस्या कहीं घाटी में एक ही मजहब की बहुलता इसका असली कारण तो नहीं जिसका पाकिस्तान मजहबी रूप से भावनात्मक फायदा उठाना तो नहीं चाह रहा?

दूसरा सवाल ये भी है कि अपना पूरा जीवन राजनीति करके क्या फारूक़ अब्दुल्ला बता सकते है कि कश्मीर को वो गुलाम समझते है? महबूबा मुफ्ती आज बारूद के ढेर की बात कर रही है क्या यह बात उन्होंने तब भी उठाई थी जब भारी संख्या में पाकिस्तानी आतंकी कश्मीर में आ घुसे थे? और आईएसआई की शह पर कश्मीर अलगाववादियों का अड्डा बन गया था। आए दिन सड़कों पर हथियार लहराते हुए हिंसक जलूस निकालना और सुरक्षा बलों पर गोलियां दागना उनका प्रिय शगल हो गया था। क्या उस समय कश्मीर फूलों की सेज पर बैठा था?

क्या फारुख अब्द्दुला भूल गये कि 1989 के नवंबर में बुरी तरह बिगड़ी समाजिक, राजनीतिक और कानून व्यवस्था की स्थिति के घाटी में कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम और उनके रहते उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ने का सिलसिला शुरू हो गया था। घाटी से जान हथेली पर लेकर भागे कश्मीरी पंडितों का पहला जत्था नई दिल्ली 30 दिसंबर, 1989 को पहुंचा था। क्या कश्मीर जब आजाद था या फिर इस्लाम के नाम यह सब कत्लेआम करने की खुली आजादी उन्होंने खुद दी थी क्योंकि उस समय कश्मीर में वही मुख्यमंत्री थे?

असल में इन कश्मीरी नेताओं और अलगाववादियों ने अपना राजनितिक चूल्हा जलाये रखने के लिए कश्मीर में यह आग कभी बुझने ही नही दी। खुद कश्मीर में एक समय राज्यपाल रहे जगमोहन ने कश्मीर पर अपनी बहुचर्चित पुस्तक “कश्मीर समस्या और विश्लेषण” में विस्तृत वर्णन किया है। वो लिखते उस समय कश्मीर में कानून-व्यवस्था का नामोनिशान नहीं बचा था। मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ नारे लग रहे थे। पड़ोसी कह रहे थे, आजादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो। कश्मीरी पंडित हिंसा, आतंकी हमले और हत्याओं के माहौल में जी रहे थे। सुरक्षाकर्मी थे लेकिन इतने नहीं कि वो उनकी जान और सामान की सुरक्षा कर सकें।

आए दिन जलूस, धरने और प्रदर्शन हो रहे थे जिनमें सरेआम आजादी के नारे लगते और पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता, भीड़ में शामिल हथियारबंद अलगाववादी जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों और सुरक्षा बलों को अपना निशाना बनाते जिसकी जवाबी कार्रवाई में निर्दोश मारे जाते थे।

कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम करके उन्हें घाटी से निकाल बाहर करने की साजिश भी बदस्तूर जारी रही। जगमोहन पर कश्मीरी पंडितों के देश निकाले की अनदेखी के आरोप भी लगे। ऊपर से यही फारूक अब्दुल्ला और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की राजनीतिक पैंतरेबाजी ने ऐसे हालात बनाए कि वहां जगमोहन का टिकना मुश्किल हो गया।

वहां हमेशा मुख्यमंत्री और राज्यपाल बदलते रहे लेकिन हालात कभी नहीं बदले। नई दिल्ली में बैठे नेता शब्दों का ताना-बाना बुनकर इसे भारत का अभिन्न अंग बताते रहे लेकिन क्या मात्र अभिन्न अंग बताने से कश्मीर समस्या का समाधान संभव होगा। इसलिए आज भाजपा के संकल्प पत्र से समूचे देश में फिर आस जगी है कि कश्मीर समस्या का हल धारा 370 ख़त्म करने के अलावा कुछ नहीं होगा। अपनी राजनितिक रोटी सेकते रहने के लिए कश्मीरी राजनितिक दल दिल्ली को गरियाते रहेंगे जो देश के लिए हितकारी नहीं है। आज लोग इस संकल्प पत्र को आशाओं के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं इसी से जम्मू-कश्मीर भी रहेगा और हिंदुस्तान भी रहेगा।

लेख-राजीव चौधरी

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