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जरा ठहरो!

Feb 18 • Arya Samaj • 625 Views • No Comments

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लेख प्रस्तुतिकर्ता- आचार्य नवीन केवली

हे समाज को एक नयी दिशा दिलवाने वालो! जरा रुक जाओ! अभी सभी लोग सो रहे हैं तो इन्हें मत जगाओ, सोने ही दो। लम्बे समय से अनेक आक्रान्ताओं द्वारा दी गयी यातनाओं से प्रताड़ित हुए थके हुए हैं। तमस रूप अन्धकार में अविद्या रूपी निद्रा देवी की गोद में अपनी क्लान्ति को दूर कर रहे हैं, इन्हें जरा और कुछ समय इसी प्रकार व्यतीत करने दो। लेकिन जरा सावधान रहो, इस घोर-घने अन्धकार में भी निद्रा देवी के वशीभूत न होते हुए अभी भी एक मूल शंकर जगा हुआ है उसके सामने मत आओ। तुम लोगों को तो भोग या अन्न और कहीं से भी मिल जायेगा, हो सके तो थोड़ी देर तुम लोग भी सो जाओ अथवा और कहीं अन्यत्र चले जाओ या फिर थोड़ा धैर्य रखो, अभी जरा अपने बिल के अन्दर ही ठहरो।

क्योंकि तुम अगर बाहर आओगे तो शिव लिंग के ऊपर चढ़ाए गए भोग को देख कर बिना खाए तुम लोग रह नहीं सकते, अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाओगे, इस प्रकार शिव लिंग के ऊपर ही चढ़ बैठोगे और अपना ताण्डव प्रदर्शित करने लग जाओगे। यदि वह मूल शंकर इन सब करतव को देख लेगा तो उसको कभी सहन न होगा, क्योंकि उसका स्वभाव ही है कि उससे कभी अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, असत्-व्यवहार आदि देखा नहीं सुहाता। वह भी स्वयं शंकर ही है जो कि अपने मूल रूप में विद्यमान है। उसका ताण्डव तो तुमने अभी देखा ही नहीं, उसके सामने तुम्हारा ताण्डव कुछ भी नहीं। ठीक है कि जिस शिव ने तुम्हें बनाया है,जिसने तुम्हारे अन्दर भूख को पैदा किया,तुम्हारे दातों को भी कुछ खाने लायक बना रखा है उसी शिव की ही खोज करने के लिए तुम उसे प्रेरित करने वाले हो परन्तु जरा दूसरे लोगों का भी तो सोचो, वे लोग तो अभी जगना ही नहीं चाहते। उनके ऊपर तो और भी कोई क्रूर, निर्दयी,अत्याचारी,भ्रष्टाचारी,विदेशी आक्रमणकारी आकर हजारों साल तक पूर्व कि भांति कुशासन करता रहे तो भी इनकी कुम्भकर्णीय निद्रा अभी भंग होने वाली नहीं है।

ध्यान रहे कि जिसको तुम लोग नन्हा सा सिंह शावक मान बैठे हो वह भले ही अभी शान्त चित्त हो कर स्थित है परन्तु वही आगे जाकर ऐसी गर्जना करेगा कि तुम लोगों का तो क्या बड़े बड़े मद मस्त गजेन्द्रों के हृदय भी उद्वेलित हो जाये। अगर तुम लोग शिव लिंग के ऊपर उछल-कूद करोगे, भोग-प्रसाद को खा जाओगे और गन्दगी फैलाओगे तो इन सब क्रियाओं से उसके मन में एक जिज्ञासा, एक संशय, एक उलझन पैदा हो जायेगा और  इस प्रकार उसके अन्दर एक बीज आरोपित हो जायेगा सच्चे शिव को खोजने का। इसके कारण कहीं उसके मन में वैराग्य का नींव न रखा जाये और वह घर-परिवार छोड़ कर कहीं साधू-सन्यासियों की टोली में दर-दर भटकता न रहे, पहाड़-पर्वत व कन्दराओं में आत्म-साधना के लिए या फिर शिव की प्राप्ति के लिए कहीं गर्मी,वर्षा,शीत आदि को सहन करता हुआ अपने शरीर को खपा न दे। कहीं वह वैरागी- साधुओं के प्रभाव में आकर संन्यासी न बन जाये। क्योंकि अगर वो संन्यासी बनेगा तो अपने कर्त्तव्य कर्मों से कभी डिगने वाला नहीं होगा।

वह सत्य की खोज में या सच्चे गुरु की खोज में कहीं मथुरा के गुरूजी का दरवाजा न खटखटाने लग जाये क्योंकि अगर वो गुरूजी के पास जायेगा तो पूरी विद्या को आत्मसात करने में तनिक भी देर नहीं करेगा,जब विद्या पूरी हो जाएगी तो गुरु दक्षिणा में गुरूजी को लौंग कि जगह सारा जीवन ही अर्पित करना पड़ेगा। फिर गुरु जी के आदेशानुसार पूरे समाज में प्रचलित जो भी अन्याय,अधर्म,अत्याचार,अनाचार,भ्रष्टाचार,अन्धविश्वास,पाखण्ड और वेद विरुद्ध मत-मतान्तर फैल रहे हैं उनके विरुद्ध स्वर बुलन्द करने में कभी न चुकेगा। क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा है कि चाहे विदेशी राजा हो चाहे कितना बलवान राजा भी क्यों न हो यदि वह अन्यायी-अधर्मी है तो उनसे कभी घबराने वाला या डरने वाला नहीं है। फिर उसको किसी ऐसे समाज कि भी स्थापना करनी पड़ेगी जिससे समग्र भारत वर्ष तो क्या पूरे विश्व में से हर प्रकार के अन्धविश्वास-पाखण्ड, आडम्बर व वेद विरुद्ध कार्यों का समूल विनाश हो सके और एक ईश्वर,एक धर्म,एक धर्म-ग्रन्थ,एक सिद्धान्त,एक न्यायव्यवस्था का प्रचार-प्रसार हो के सुख,शान्ति और धर्म की स्थापना हो सके।

फिर अनेक स्वार्थी,हठी,दुराग्रही,मिथ्यावादी,मिथ्याचारी लोगों के स्वार्थ में कुठारघात होगा और वे लोग मिथ्याभिमान के कारण अपने अस्तित्व की मिथ्या-सुरक्षा के लिए जो अपना हितैषी है,परोपकारी है,सुधारक है,अविद्या आदि रोगों का चिकित्सक है, ये क्रूर और निर्दयी लोग उसी को ही अपना शत्रु मान बैठेंगे और फिर कभी कोई षड्यंत्र पूर्वक उसको संखियाँ युक्त-जहर दूध में मिला कर न दे दें और उसका प्राणान्त न करवा दें। ऐसा हृदय विदारण करने वाला अत्यन्त दुःखदायी व मार्मिक दृश्य हमसे कभी देखा न जा सकेगा, इसीलिए हे मुषको! जरा इन सब बातों पर विचार करो और थोड़ी देर के लिए अपने ऊपर नियन्त्रण रखो,संयम पूर्वक अपने बिल में ही निवास करो। जरा ठहरो ! जरा ठहरो !

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