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जातिवाद के असली पोषक, मनु या तथाकथित नेता?

यदि जातिवाद की बात आये तो मेरे हिसाब से इसकी सर्वाधिक  शिकार मनुस्मृति बनी. कारण एक कि यह  आदर्श समाज और राज्य की स्थापना के लिए एक उपयुक्त ग्रन्थ था. शायद आदर्श राजनीति हमारे राजनेताओं के कंठ से नीचे उतरने वाला शब्द नहीं था इसी कारण हर वर्ष मनु स्मृति दहन दिवस मनाकर समाज को शुद्ध करने की राजनैतिक परम्परा देश में देखने को मिलती है. बीती शताब्दी का जब तीसरा दशक था और साल 1927 तब बाबा साहब अंबेडकर ने कुछ लोगों के साथ मिलकर ‘मनुस्मृति’ की तत्कालीन प्रति जलाई थी. जिसे आज तक कुछ दलित चिन्तक और नेता आसानी से एक रस्म सी निभाते हुए दीख जाते है. लेकिन जलाने के पीछे का सच या अम्बेडकर का उद्देश्य आज तक इन दलित विचारको ने किसी के सामने नहीं रखा. जबकि अंबेडकर ने ही एक से ज्यादा अवसरों पर इस बात को स्वीकारा था कि मनुस्मृति के नाम से प्रचलित मौजूदा किताब वास्तव में मनु के अलावा मुख्य रूप से किसी अन्य के विचारों से भरी पोथी थी, जिसमें बाद में भी कई लोगों ने जोड़-तोड़ की. जिसमें जातिवाद बारे में तमाम तरह के परस्पर-विरोधी प्रसंग और पौराणिक आख्यान पाये जाते हैं, जिसमें शिव को लिंगपूजित होने का शाप देने से लेकर, विष्णु को लात मारने और फिर उनसे अपनी बेटी ब्याहने तक की कहानियां मौज़ूद हैं. इस वजह से इन झूठी बातों से भरी किताब को जलाना उचित है.

सबसे पहले हमें एक बात समझ लेनी होगी कि भारत शुरू से ही बौद्धिक और अध्यात्मिक संघर्षों और समन्वयों की स्थली रहा है. श्रमण और ब्राह्मण से लेकर शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन और संतमत तक ने वैदिक ग्रंथों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या करने का बौद्धिक और साधनापरक प्रयास किया. लेकिन समय के साथ-साथ ब्राह्मण-धर्म, का जन्मना जिस कारण देश पुरोहितवाद का शिकार हो गया. लेकिन यहाँ सवाल यह उपस्थित होता है कि इस पुरोहितवाद, जातिवाद को जीवित किसने रखा? देश के स्वतंत्र होने के पश्चात इन विसंगतियों पर अभी भी अंकुश क्यों नहीं? आपको नहीं लगता कि हमारे देश के नेता मनु महाराज के नाम पर किताबे जलाकर इन विसंगतियों को जिन्दा रखने का भरसक प्रयास कर रहे है. अम्बेडकर के समय मनु स्मृति इसलिए जलाई गयी थी कि प्रकाशन की घोर लापहरवाही या उसके व्याख्याकार ने उसमे त्रुटियाँ पैदा की थी. लेकिन आज भी उन्हीं त्रुटी के साथ अनेक प्रकाशक अशुद्ध मनु स्मृति को इस वजह से भी छाप रहे है कि उक्त ग्रन्थ पढने के लिए न सही जलाने के लिए तो बिकेगा ही!

राजनीति की ट्रेन हमेशा इतिहास की पटरी पर चलती है. इस कारण कुछेक दलित चिंतक और अपनी जेबे भरने वाले विचारक दलित उत्थान के नाम पर चुनाव जीतने वाले नेता आज भी इस कार्य को जिन्दा रखे हुए है. क्या पुस्तक जलाने से दलित उद्धार हो जायेगा? क्या एक पुस्तक के जला देने से उन्हें सामाजिक बराबरी का अधिकार मिल जायेगा? यदि हाँ तो फिर 90 सालों में इसके जलाने से कितना लाभ हुआ? यह बात भी सामने रखनी चाहिए. देश के कानून में जब समानता का अधिकार है तो सामाजिक जीवन में भेदभाव का जिम्मेदार कौन? जहाँ इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए थी वहां विषय बदलकर इसको दूसरा रूप दिया जा रहा है. चलो अशुद्ध ग्रन्थ पढ़कर एक पल को मान लिया कि इनका गुस्सा व्याख्याकार पर न होकर मनु के प्रति है. भावावेश में और सामाजिक-राजनीतिक संदेश देने के लिए उसके नाम से चलने वाली पुस्तक को एक  बार चंदन की चिता पर रखकर जला भी डाला. चलो वह भी ठीक. लेकिन यह क्या कि हम कुत्सित दुष्प्रचार का घिनौना तेल डाल-डाल कर जब-तब उसे जलाते रहें. उस किताब पर जूती रख कर कहें कि हम नारीवादी हैं और सभ्य हैं. किसने रोका है, खराब बातों को निकाल बाहर कीजिए. चाहें तो अच्छी बातों को रख लीजिए, उन्हें जीवन में भी उतारिए. उसे और बेहतर बनाइये. चाहे जैसी भी हो, अपनी धरोहरों और अतीत की गलतियों से निपटने के लिए हमें सत्यशोधन और सत्याग्रह और सहिष्णुता का सहारा लेना भी सीखना चाहिए.

हम आज की आधुनिक पीढ़ी के लोग है, जहाँ आज हमे एकता समरसता के साथ आगे बढ़ना था. वहां हमें आज किताबें जलाने जैसे मध्ययुगीन तरीके शोभा नहीं देते. अतीत में पुस्तकालयों के ही दहन का काम नालंदा से लेकर कई जगह कुछ सिरफिरे लोगों ने किया था. हम ऐसा क्यों करें? दहन जो हुआ सो हुआ. अब हम थोड़ा रहन, सहन, सीखना चाहिए दलित नेताओं को या राजनैतिक पार्टियों को समझना चाहिए कि आखिर मनु के नाम पर कब तक अपनी राजनीति करोंगे! भारत में वामपंथ, दक्षिणपंथ राजनीतिक इतिहासकारों की बौद्धिक लापरवाही, इसी एक ग्रन्थ पर आकर क्यों टिक गयी यदि मनु स्मृति में मनुष्य को सामाजिक तौर पर विभक्त करते समय पैरो को शुद्र कहा गया तो इसमें दुखी होने की बात क्यों उसी मनु स्मृति में प्रथम प्रणाम चरणों को ही लिखा गया है न की मस्तक को जिसे उसमें ब्राह्मण कहा गया.

लेकिन दलितों और पिछड़ों पर राजनीति करने वाले राजनेताओं द्वारा इसलिए एक अनोखा रास्ता ढूंढ़ निकाला गया. यदि अपने किसी कुकृत्य को भी जायज ठहराना हो तो उसे किसी प्रामाणिक ग्रंथ के हवाले से कह दो. यही कार्य आज के नेता सामाजिक जीवन में करते नजर आ रहे है. क्या यह लोग बता सकते है मनु के विरोध के अलावा इन लोगों ने सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के कल्याण के लिए क्या किया? सिर्फ इतना किया कि उनकी सामाजिक दशा पर पार्टी बनाकर सत्ता का पान किया न कि उनकी शिक्षा सर्व समावेशी विकास का कार्य इस विषय में दलितों को सोचना होगा कि आजादी के इतने दिनों बाद आरक्षण के बावजूद भी वो आजतक दलित क्यों है? अब समय यह सोचने का कि जातिवाद के असली पोषक मनु महाराज है या जातिवादी नेता?

राजीव चौधरी

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