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जापान जहाँ बसती है हमारी संस्कृति

Nov 17 • Samaj and the Society • 996 Views • No Comments

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यदि भारत में विविधता में एकता है तो जापान में आपको एकता में विविधता दिखाई देगी. जापान में जहाँ बुद्ध. सिंतों को मानने वाले लोग है वहीं हिंदू देवी देवताओं की पूजा की जाती है. ये बात कम ही लोगों को मालूम होगी. जापान में कई हिंदू देवी-देवताओं को जैसे ब्रह्मा, गणेश, आदि की पूजा आज भी की जाती है. ये विषय मूर्ति पूजा के लिहाज से भले ही गर्व करने लायक न हो किन्तु भारतीय धार्मिक संस्कृति की गहराई जरुर बताता है. बेशक जापान में सबसे ज्यादा लोग बुद्ध के उपासक है पर बुद्ध भी तो वैदिक सभ्यता का उपासक रहा है. बुद्ध ने तृष्णा को सभी दुखों का मूल माना है. चार आर्य सत्य माने गए हैं. कि संसार में दुख है, दूसरा- दुख का कारण है, तीसरा- कारण है तृष्णा और चौथा- तृष्णा से मुक्ति का उपाय है आर्य अष्टांगिक मार्ग. अर्थात वह मार्ग जो अनार्य को आर्य बना दे. इससे शायद वेद मार्गी के भी कोई वैचारिक मतभेद नहीं होंगे. दोनों में ही मोक्ष ( निर्वाण) को अंतिम लक्ष्य माना गया है एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए पुरूषार्थ करने को श्रेष्ठ माना गया है. जापान की नगरी नारी में मथुरा-वृन्दावन जैसी राग- रंग की धूम- धाम रहती है. वहाँ के मन्दिरों में आकर्षक नृत्य के साथ अनेकों धर्मोत्सव होते रहते हैं. जापानी स्वभावतः प्रकृति- सौंदर्य के पूजक हैं. उनके निजी घरों में भी छोटे- बड़े उद्यान बने होते हैं. तिक्को का तोशूगू मन्दिर पहाड़ काटकर इस प्रकार बनाया है, जिससे न केवल धर्म- भावना की वरन् प्रकृति पूजा की आकांक्षा भी पूरी हो सके.
कुछ वक्त पहले नई दिल्ली में फोटोग्राफर बेनॉय के बहल के फोटोग्राफ्स की एक प्रदर्शनी हुई, जिससे जापानी देवी-देवताओं की झलक मिली. बेनॉय के मुताबिक़ हिंदी के कई शब्द जापानी भाषा में सुनाई देते हैं.ऐसा ही एक शब्द है (सेवा) जिसका मतलब जापानी में भी वही है जो हिंदी में होता है. बेनॉय कहते हैं कि जापानी किसी भी प्रार्थना का अनुवाद नहीं करते. उनको लगता है कि ऐसा करने से इसकी शक्ति और असर कम हो जाएगा. भारतीय सभ्यता के बहुत सारे रंग जापान में देखने को मिलते हैं. सरस्वती के कई मंदिर भी जापान में देखने को मिलते हैं. संस्कृत में लिखी पांडुलिपियां कई जापानी घरों में मिल जाती है. आज भी जापान की भाषा (काना) में कई संस्कृत के शब्द सुनाई देते हैं. इतना ही नहीं काना का आधार ही संस्कृत है. बहल के अनुसार जापान की मुख्य दूध कंपनी का नाम सुजाता है. उस कंपनी के अधिकारी ने बताया कि ये उसी युवती का नाम है जिसने बुद्ध को निर्वाण से पहले खीर खिलाई थी. आज हम भारत में संस्कृत नहीं बोलते, इस भाषा के स्कूल कॉलेज में अपने बच्चों को भेजना नहीं चाहते. संस्कृत को महत्व नहीं देते और सांप्रदायिक समझते हैं वहीं जापान ने इस भाषा को सम्मान दिया है और वहां के लोग इस अपनी पुरातन सभ्यता का हिस्सा मानते हैं. जापानी पुरातत्त्ववेत्ता तकाकसू ने जापानी संस्कृति का इतिहास लिखते हुए स्वीकार किया है. कि उसका विकास भारतीय संस्कृति की छाया में हुआ है. भारत में बने स्तूप को जापान में पैगोडा का रूप दिया गया है. साथ ही, साहित्य के क्षेत्र में भी जापान व भारत लगभग एक समान हैं
इतिहास कहता है कि ईसाई और इस्लाम धर्म से पूर्व बौद्ध मत की उत्पत्ति हुई थी. उक्त दोनों मत के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मत है. इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका समेत लगभग 13 देशों में है. इसे हम बुद्ध का साम्राज्य भी कह सकते है. दरअसल वैदिक सभ्यता की जड़ें किसी एक पैगम्बर पर टिकी न होकर सत्य, अहिंसा सहिष्णुता, ब्रह्मचर्य , करूणा पर टिकी हैं. हमारे धर्म के अनुसार सनातनी, जैन सिख बौद्ध इत्यादि सभी लोग आ जाते हैं. जो पुर्नजन्म में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि व्यक्ति के कर्मों के आधार पर ही उसे अगला जन्म मिलता है
हिन्दू की परिभाषा को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता. यही कारण है कि भारत में हिन्दू की परिभाषा में सिख बौद्ध जैन आर्य सनातनी इत्यादि आते हैं इनमें रोटी बेटी का व्यवहार सामान्य माना जाता है । एवं एक दूसरे के धार्मिक स्थलों को लेकर कोई झगड़ा अथवा द्वेष की भावना नहीं है. सभी पंथ एक दूसरे के पूजा स्थलों पर आदर के साथ जाते हैं. कौन नहीं जनता कि जब गुरू तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितो के बलात धर्म परिवर्तन के विरूद्ध अपना बलिदान दिया था.
बुद्ध ने कोई नया पंथ नहीं चलाया था. वरन् उन्होंने मानवीय गुणों को अपने अंदर बढ़ाने के लिए अनार्य से आर्य बनने के लिए ध्यान की विधि विपश्यना दी विपश्यना करने वाले लोगों के वंशजो ने अपना नया पंथ बना लिया. ऐसा नहीं कि वैदिक सभ्यता केवल जापान तक सिमित है बल्कि बाली में एक इमारत के निर्माण की खुदाई के दौरान मजदूरों को एक विशाल हिन्दू इमारत को पाया, जो कभी हिन्दू धर्म का केंद्र रहा होगा. दुनिया के कई देश ऐसे हैं यहां आंशिक रूप से या फिर पूर्ण रूप से हिन्दू देवी-देवताओं को माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है. आज उन देशों का धर्म चाहे जो हो, उनकी अधिकतम आबादी चाहे जिस धर्म को मानती हो लेकिन एक वक्त ऐसा था जब हिन्दू धर्म की जड़ें वहां गहरी थीं…विनय आर्य

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