2shutterstock_238672270

तीन चेतन देवता माता, पिता और आचार्य

Apr 12 • Arya Samaj • 551 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...

वेदों में देव और देवता शब्द का प्रयोग हुआ है। देव दिव्य गुणों से युक्त मनुष्यों व जड़ पदार्थों को कहते हैं। परमात्मा अर्थात् ईश्वर परमदेव कहलाता है। देव शब्द से ही देवता शब्द बना है। देवता का अर्थ होता है जिसके पास कोई दिव्य गुण हो और वह उसे दूसरों को दान करे। दान का अर्थ भी बिना किसी अपेक्षा व स्वार्थ के दूसरों को दिव्य पदार्थों को प्रदान करना होता है। हम इस लेख में चेतन देवताओं की बात कर रहे हैं। चेतन देवताओं में तीन प्रमुख देव व देवता हैं जो क्रमशः माता, पिता और आचार्य हैं। इन तीनों देवताओं से सारा संसार परिचित है परन्तु इनके देवता होने का विचार वेदों की देन है। वेद इन्हें देवता इसलिए कहता है कि यह तीनों अपने अपने दिव्य गुणों का दान करते हैं। पहले हम माता शब्द पर विचार करते हैं। माता जन्मदात्री स्त्री को कहते हैं। माता के समान शिशु व किशोर का पालन करने वाली स्त्री भी माता कही जाती है। माता देव क्यों कही जाती है? इसका कारण यह है कि माता सन्तान को जन्म देने व पालन करने में अनेक कष्टों को उठाती है और वह सहर्ष ऐसा करती है। वह अपनी सन्तान से किसी प्रतिकार, धन व सेवा आदि के माध्यम से भुगतान की अपेक्षा नहीं करती। यह बात और है कि विवेकशील व बुद्धिमान सन्तानें अपने माता-पिता के उपकारों को जानकर उनकी सेवा करते हैं और माता-पिता के उपकारों से उऋण होने का प्रयत्न करते हैं। इसका लाभ उनको भविष्य में मिलता है।

वह जब विवाहित होकर स्वयं माता-पिता बनते हैं और उनकी सन्तानें होती हैं तो उनके अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा के संस्कार उनकी अपनी बाल सन्तानों में आते हैं। इन संस्कारों का लाभ यह होता है कि वह भी बड़े होकर अपने माता-पिता की सेवा करते हैं। अतः सभी युवाओं व दम्पतियों को अपने माता-पिता की सेवा अवश्य करनी चाहिये। इसका उनको यह लाभ होगा कि उनकी सन्तानें भी बड़ी होकर उनकी सेवा किया करेंगी। संक्षेप में यह भी लिख दें कि माता को सन्तान को अपने गर्भ में धारण करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयों व पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है। 10 माह की गर्भावस्था में नाना प्रकार की समस्याओं से उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। चिकित्सक माताओं को अनेक प्रकार की सलाह देते हैं व ओषधियां बताते हैं जिनका पालन माताओं को करना होता है। सन्तान के जन्म के बाद भी शिशु की रक्षा, उसके पालन एवं पोषण में बहुत सावधानी रखनी पड़ती है। अपना भोजन व आचारण भी एक माता के उच्च गुणों से युक्त युवती के अनुरूप करना पड़ता है जिसमें उन्हें अपनी अनेक इच्छाओं व सुख-सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है। ऐसा करके सन्तान सकुशल जन्म ले पाती है व उसका पालन हो पाता है। आज हमने दो वर्ष की एक कन्या से फोन पर बातचीत की। यह दो वर्ष की कन्या अभी शब्दों को स्पष्ट रूप से बोल नहीं पाती। उसके माता-पिता, दादा-दादी व बुआ उसे बोलने का अभ्यास करा रहे हैं। अभी 6 माह से 1 वर्ष का समय और लग सकता है। इससे यह ज्ञात होता है कि सन्तान के निर्माण में माता की प्रमुख भूमिका होती है। माता को प्रसव पीड़ा तो होती ही है साथ ही भाषा का ज्ञान कराने में भी बहुत समय देना पड़ता है। अतः सन्तान का यह कर्तव्य होता है कि वह बड़ी होकर माता को सब सुख सुविधायें प्रदान करें और उन्हें मानसिक, शारीरिक व अन्य किसी प्रकार की असुविधा व दुःख न होने दे। सन्तानों का कल्याण करने और अनेक कष्ट व दुःख सहन करने के कारण माता अपनी सभी सन्तानों के लिए पूजनीय देवता होती है।

पिता भी सन्तान के लिए एक देवता होता है। पिता से ही सन्तान होती है। सन्तान के जन्म में माता व पिता दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। माता-पिता के द्वारा एक आत्मा माता के गर्भ में प्रविष्ट होती हैं। आत्मा के माता के शरीर होने में ईश्वर की प्रमुख भूमिका होती है। ईश्वर यह सब कैसे करता है, अल्पज्ञ जीवात्मा इसे पूर्णतः नहीं जान सकता। ईश्वर ने सन्तान उत्पन्न करने का अपना एक विधान बना रखा है। उसी के अनुसार सन्तान जन्म लेती है। पिता की भूमिका माता व भावी शिशु के लिए आवश्यकता की सभी सामग्री व सुविधायें जुटाने की होती है। माता को पौष्टिक भोजन चाहिये। इसके साथ स्वस्थ सन्तान के लिए माता का जीवन चिन्ताओं व दुःखों से मुक्त एवं प्रसन्नता से युक्त होना चाहिये। माता जैसा साहित्य पढ़ती है, विचार व चिन्तन करती है, प्रायः वैसी ही सन्तान बनती है। माता-पिता के चिन्तन के अनुरूप सन्तान की आत्मा में संस्कार उत्पन्न होते जाते हैं। वही संस्कार सन्तान के जन्म के बाद के जीवन में पल्लवित व पुष्पित होते हैं। अतः यह आवश्यक होता है कि गर्भावस्था काल में माता व पिता दोनों सात्विक विचार रखें। वह ईश्वर व जीवात्मा विषयक वैदिक मान्यताओं का अध्ययन किया करें। वह वैदिक साहित्य पढ़े व अपने मन में ऐसे भाव उत्पन्न करें कि हमारी सन्तान धार्मिक, साहसी, निर्भीक, देशभक्त, ज्ञानी, सच्चरित्रता आदि के गुणों से युक्त होगी। यदि ऐसा करते हैं तो सन्तान ऐसी ही बन जाती है। पिता की भूमिका माता के समान ही महत्वपूर्ण होती है। इसलिए उसे माता के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है। सन्तान का जन्म हो जाने के बाद बच्चे की शिक्षा, उसके पोषण व निर्माण का दायित्व पिता का होता है। बच्चे का शारीरिक व बौद्धिक विकास भली प्रकार से हो रहा है, पिता को इसका ध्यान रखना पड़ता है। यदि सन्तान को अच्छे शिक्षक व सामाजिक वातावरण मिलता है तो सन्तान एक सुसंस्कृतज्ञ सन्तान बनती है। आजकल वातवारण कुछ बिगड़ गया है। समाज पर विदेशी मानसिकता का प्रभाव बढ़ रहा है। इस कारण सन्तान में वैदिक संस्कार कम व पाश्चात्य सभ्यता के संस्कार अधिक देखे जाते हैं। विकल्प रूप में बच्चों को यदि गुरुकुलीय शिक्षा मिले तो वह अच्छी प्रकार से संस्कारित हो सकते हैं।

आज अच्छे गुरुकुलों का भी अभाव है जहां आचार्यगण माता-पिता के समान व उससे भी अच्छा, स्वामी श्रद्धानन्द जी के समान, व्यवहार करें और बच्चों की सभी प्रकार की शैक्षिक व स्वास्थ्य विषयक आवश्यकतायें गुरुकुल में पूर्ण हों। आर्यसमाज के कुछ गुरुकुल इसकी आंशिक पूर्ति ही करते हैं। आर्यसमाज के गुरुकुलों में वैल्यू एडीसन की आवश्यकता अनुभव होती है। महर्षि दयानन्द ने अपनी पुस्तक व्यवहारभानु में जैसे आचार्य और शिष्यों का उल्लेख किया है, वैसे आचार्य और शिष्य यदि हों, तो समाज का कल्याण हो सकता है। देश की सरकार मैकाले की पद्धति को प्रमुखता देती है। उसके लिए मोटे मोटे वेतन भी शिक्षकों को देती है। इस पर भी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे संस्कारित न होकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर भी देश विरोधी नारे लगाते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। भ्रष्टाचार की घटनायें लगातार पढ़ रही है। अपराध कम होने के बाद तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। कश्मीर में युवक संगठित रूप से पत्थर बाजी करते हैं और सरकार मूक दर्शक बन कर देखती है। कुछ करें तो मानवाधिकारवादी लोग सरकार की आलोचना करते हैं। ऐसा लगता है कि सेना के मार खाने के अधिकार हैं अपनी रक्षा करने के लिए नहीं। यह देखकर यही लगता है कि यदि माता-पिता संस्कारित हों और आचार्य भी वैदिक संस्कारों से युक्त हों तभी बच्चों व शिक्षा जगत का कल्याण हो सकता है। पिता दूसरा देव है। आजकल के पिता सन्तानों को धन व सुख सुविधायें तो भरपूर देते हैं परन्तु संस्कार न माता-पिता के पास हैं और न स्कूलों में, इसलिए नई पीढ़ी आस्तिकता व संस्कारों से दूर जा रही है और वह कार्य कर रही है जो उसे करने नहीं चाहिये।

आचार्य भी एक देवता होता है। वह बच्चों को दूसरा जन्म, उन्हें विद्यावान् कर देश व समाज के लिए उपयोगी बनाता है जो आगे चलकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करने में समर्थ हो सकते हैं व इनकी योग्यता प्राप्त कर सकते हैं। आचार्य आचरण की शिक्षा देने वाले गुरु को कहते हैं। आचरण की शिक्षा स्वयं सदाचार को अपने चरित्र में धारण करके ही दी जा सकती है। यदि गुरु सदाचारी नहीं होगा तो शिष्य भी सच्चरित्र नहीं हो सकते। अतः आचार्यत्व का कार्य उच्च चरित्र के ज्ञानी व्यक्तियों को ही करना चाहिये, तभी संस्कारित व सच्चरित्र युवक देश को मिल सकते हैं। प्राचीन काल में राम, कृष्ण व असंख्य ऋषि मुनि अच्छे आचार्यों की ही देन होते थे। आज वैसे आचार्य होना बन्द हो गये हैं तो राम, कृष्ण, चाणक्य, दयानन्द जैसे नागरिक व महापुरुष होना भी बन्द हो गये हैं। देश की सरकार को चाहिये कि वह अध्यापकों व आचार्यों की सच्चरित्रता के उच्च मापदण्ड बनायें। सभी गुरुजन आस्तिक व वेदों के जानकार होने चाहिये। वह मांसाहारी न हों, धूम्रपान व अण्डों का सेवन करने वाले भी न हां। वह त्याग व सन्तोष की वृत्ति को धारण करने वाले हों। आचार्यगण यम व नियम का पालन करते हों, योगी व ज्ञानी हों। वह वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करने वाले भी होने चाहियें। ऐसे आचार्य यदि होंगे तभी वह नई संस्कारित युवा पीढ़ी को बना सकते हैं। ऐसे गुणों वाले अध्यापक ही आचार्य कहलाने के योग्य होते हैं। शब्द, भाषा, सामाजिक व राजनैतिक विषयों सहित विज्ञान व गणित आदि विषयों का ज्ञान देने वाले अध्यापक तो हो सकते हैं आचार्य नहीं। आचार्य बनने के लिए उन्हें अपना जीवन वैदिक मूल्यों पर आधारित आचार्य का जीवन बनाना होगा। तभी वह आचार्य कहला सकेंगे और उनके शिष्य चरित्रवान् होने सहित देश व समाज के हितों की पूर्ति करने वाले होंगे। सच्चा आचार्य अपने शिष्य को सच्चरित्रता व ईश्वर, जीवात्मा विषयक जो ज्ञान देता है, उस कारण से वह देवता होता है।

ज्ञान ही संसार की सबसे श्रेष्ठ वस्तु है। ज्ञानहीन मनुष्य तो पशु समान होता है। मनुष्य को पशु से मनुष्य व ज्ञानवान् बनाने में माता, पिता व आचार्य तीनों का अपना अपना योगदान है। अतः तीनों ही किसी भी मनुष्य के लिए आदरणीय, सम्मानीय व पूज्य होते हैं। इन सबकी तन, मन व धन से सेवा करना सभी सन्तानों व शिष्यों का धर्म व कर्तव्य है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes