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तुम उसे नही जानते

न तं विदाथ य इमा जजानान्त्यद्युष्माकमन्तरं बभूव। नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति।। ऋग्वेद 10/82/7

अर्थ- हे मनुष्यों! तुम (तम्) उस परमेश्वर को (न) नहीं (विदाथ) जानते हो जो (इमा) इन समस्त लोक -लोकान्तरों को (जजान) उत्पन्न करता है। तथा (अन्यत्) तुमसे भिन्न दूसरों होकर (युष्माकम्) तुम्हारे (अन्तरम्) हृदय में (बभूव) विधमान है। (नीहारेण) कुहरे के समान अज्ञानान्धकार से (प्रावृताः) आच्छादित जन (जल्प्याः)केवल शब्दाडाम्बर करने वाले जन (चरिन्त) अपना पाण्डितय-प्रदर्शन करते हुये घूमते हैं। परन्तु वे परमात्मा को नहीं जानते।

आज मानव विज्ञान द्वारा प्रकति के रहस्यों का उद्घाटन करनें में लगा हुआ है। नित्यप्रति नयी खोजें और आविष्कार किये जा रहे है। विज्ञान ने जीवन की बहुत सारी गुत्थियो को सुलझा लिया है। हमारे इस सौर मण्डल से परे पृथ्वी जैसे एक ग्ह का पता लगाया है। जहाँ जीवन की पूरी सम्भावना है। जहाँ जाने में 20 प्रकाश वर्ष का समय लगेगा। मंगल एवं दूसरे ग्रहो की छानबीन हो रही है। ब्रह्माण्ड  के साथ ही मानव शरीर की एक-एक रचना की छानबीन की जा रही है। किसी व्यक्ति के गुण विशेष उसके गुणसुत्रों में सन्निहित हैं इसका भी विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अन्य क्षेत्रों में भी अनुसंधान हो रहा है।

परन्तु जिसने प्रकृति में इन सारे गुणों को भरा है, क्या उसे जान पाये। मन्त्र यही बात पूछ रहा है-न तं विदाथ य इमा जजान किसी रचना को देख रचनाकार को जानने की जिज्ञासा स्वतः होती है। जिस रचनाकार ने सृष्टि की एक -एक वस्तु की अद्भुत रचना की है, उसकी सत्ता मानने से ही मना कर देना विड़मना नही तो और क्या है। अभी इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध खगोलविद् हाकिन्स महोदय की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होनें माना हैं कि सृष्टि का निर्माण भौतिक शास्त्र ( फिजिक्स) के सिद्धान्त के आधार पर हुआ है। इसे बनाने वाली कोई ईश्वर जैसी सत्ता नहीं हैं। वेद इन लोगों के लिए कहता हैं -नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप उक्थशासश्चरिन्त हे लोगों! जो परमात्मा इन सब भुवनों का बनाने वाला विश्वकर्मा है, उसको तुम लोग नहीं जानते हो, इसी हेतु से आवृत मिथ्यावाद, नास्तिकवाद से अनर्गल कथन कर रहे हो। तुम लोग असुतृपः केवल विषय भोगों के लिये ही और अवैदिक कर्म करने में प्रवृत्त हो रहे हो और जिसने ये सब भुवन रचे हैं, उस सर्वशक्तिमान् न्यायकारी परब्रह्म से उलटे चलते हो, अत एव तुम उसको नहीं जानते। (सन्दर्भ-आर्याभिविनय) विज्ञान की यही त्रासदी है कि वह यन्त्रों के द्वारा प्रयोगशाला में खोजबीन कर रहा है। यन्त्रों की एक सीमा है। जब प्रकृति का ही पूरा ज्ञान यन्त्रों से नही हो पा रहा है तो प्रकृति से सूक्ष्म जीवात्मा और परमात्मा का ज्ञान सम्भव कैसे हो सकता है। अन्यद् युष्माकमन्तरं बभुव जो ब्रह्म तुम्हारी आत्मा में भी तुमसे पृथक् विराज रहा है, उसे जानने के लिये तो योग के साधन घारणा -घ्यान-समाधि का अवलम्भन लेना होगा। उपनिषद् कहती है– नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।। कठो:२.२३

यह आत्मा बड़े-बड़े भाषण देने या प्रवचन करने से नहीं मिलता। तर्क-विर्तक एवं बहुत पढ़ने – सुनने से भी नहीं मिलता। उचित पात्र समझ जिसका यह वरण कर लेता हैं वही उसको प्राप्त कर सकता है। ऐसे योग्य पात्र के सामने यह आत्मा अपने स्वरूप को खोलकर रख देता है।

नाविरतो दुश्चारितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमनासो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।। कठो. २.२४।।

जो व्यक्ति दुराचार से हटा नही, जो अशान्तचित्त है, जो तर्क-विर्तक मे उलझा हुआ है और जिसका चित्त चंचल है। वह केवल ज्ञान मात्र से उस प्राप्त नहीं हो सकता है। परमात्मा व्यर्थ का जल्प, वितण्डा, ढोंग-पाखण्ड या लच्छेदार भाषण देने से भी प्राप्त नहीं होता। जैसे घने कुहरे में निकटस्थ वस्तु भी दिखाई नही देती वैसे ही वह परमात्मा हृदय में विराज रहा है परन्तु अविघा अंधकार से अन्तःकरण आच्छादित हो जाने के कारण उसकी अनुभूति नहीं हो रही है। वस्तुतः बह्मा साक्षात्कार का विषय है, तर्क – विर्तक का नहीं। जो वेदान्ती यह कहते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूँ। उनके मुख पर यह मन्त्र चपेटिका लगा रहा है और कह रहा है- अरे भोले लोगों! वह ब्र्रह्म अन्यद् युष्माकमन्तरं बभूव तुम से भिन्न, दूसरा होकर तुम्हारे हृदय में विराजमान हो रहा है। जीव अविघादि दोषयुक्त, एक देशी, अल्पज्ञ है और ब्रह्म सदैव ज्ञानी, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान होने से जीव और ब्रह्मा एक कदापि नहीं हो सकते। वर्तमान समय में ब्रह्म के दर्शन कराने वालों की बाढ़ आई हुई है। ये लोग सिद्ध जैसा भेष बना, मौनी बाबा बन अपने शिष्यों के मघ्य में सिद्ध पुरूष जैसी बात करतें हैं जैसे इन्हें सचमुच ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया हो परन्तु वे जल्प करने वाले, प्राणों के पोषक और उधर -उधर के कुच्छ मन्त्र, श्लोक दोहे, गीत आदि सुना कर अपना पाण्डित्य प्रदर्शन कर लोगों को भ्रमित कर रहे है। उसे जानने का मार्ग उपनिषद् बतला रही है– यच्छेद् वाड्मनसी प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मानि महति नियच्छेत् तद्यच्छेद्छान्त आत्मनि।। कठो. ३.१३

ज्ञानी व्यक्ति को चाहिये कि मन, वाणी को प्रथम एकाग्र करे और मन को बुद्धि में समाहित करे बुद्धि को आत्मा मे और आत्मा को परमात्मा जो शान्ति और आनन्द का भण्डार है, उसमें निमग्न कर दे। अंगष्ठुमात्रः पुरूषो मघ्य आत्मनि तिष्ठति।(कठो. ४.१२) अंगुठो जितने हृदयान्तरिक्ष में आत्मा में प्रविष्ट हुआ वह परमात्मा विराज रहा है जिसका साक्षात्कार योगी लोग समाधि में करते हैं ।

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