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दलितों को सम्मान नहीं कम से कम हनुमान ही दे दीजिये

यूँ तो हमेशा भारतीय राजनीति विवादों के आस-पास ही घूमती रहती है, किन्तु हाल ही में राजस्थान की एक चुनावी रैली में उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जी को दलित बताकर भारतीय राजनीति में एक नया विवाद पैदा कर दिया है। जिसके बाद भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर का बयान आया कि  यदि हनुमान दलित हैं तो अब चढ़ावे हमारा ही अधिकार हैं। इसके बाद तो मानों बयानों के बाजार में देश की सियासत एक बार फिर उफान पर आ गयी हैं।

कांग्रेस नेता अमित सिंह ने खुद को दलित बताते हुए कहा कि अब से अपनी जाति के देवता हनुमान के सभी मंदिरों में हम ही पूजा करेंगे और इनके हम ही महंत होंगे. देश में जितने भी हनुमान मंदिर हैं, उनका रखरखाव और पूजा करने वाला अब अनुसूचित जाति का व्यक्ति ही होगा। अखिल भारतीय कोली समाज के उपाध्यक्ष नंदलाल ने कहा कि हम मुख्यमंत्री योगी से यह भी निवेदन करते हैं कि वे बता दें कि कौन-कौन से दूसरे भगवान हमारे समाज में आते हैं।

भारत जैसे देश में जहाँ राजनीति जातिवाद के कंधे पर बैठकर चलती हो, जहाँ अधिकांश नेता जन्म ही जातिवाद की कोख से लेते हों वहां उस देश में भला ऐसे बयान को कौन हाथ से फिसल देना चाहेगा? यहाँ तो नेता सुबह उठकर एक दूसरे का मूंह ताकते हैं कि कब किसका मुंह खुले और राजनीतिक मशाला हाथ लगे। खबर है बयान आने के बाद दलित समुदाय के नेता देश भर के हनुमान मंदिरों पर कब्जा करने की कोशिश में लग गये हैं।

भले ही बहुत से लोगों के लिए ये खबर, विवाद या बयान हो लेकिन मेरे लिहाज से ये बहुत गंभीर मुद्दा है कि देश को आजाद हुए करीब 70 वर्ष बीत चुके हैं यदि इस दौरान हमने कोई अहसास खोया है तो वह सिर्फ ये खोया कि हम सब भारतीय है। हमने अभी तक स्वयं को सामाजिक रूप से करीब 6 हजार जातियों में विभक्त किया फिर उसमें सामाजिक रूप से जातीय उंच-नीच का भेदभाव पैदा भी किया इसके बावजूद हम आगे बढ़ते रहे किन्तु अब जिस तरह देश के वीरों, महापुरुषों और अराध्य देवी-देवताओं को जाति में बाँटने का कार्य कर रहे हैं ये शायद हमारी भारतीयता को नष्ट करने वाला है। हनुमान पर योगी का बयान आने के बाद जिस तरह अन्य लोगों ने सकारात्मक पक्ष रखने के बजाय उल्टा हनुमान की अलग-अलग जातियां बताने का कार्य किया क्या वो सही है? शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की माने तो भगवान हनुमान ब्राह्मण थे, योगी जी ने दलित बताया अर्थात् सबने अपने राजनितिक स्वादानुसार महावीर हनुमान जी की जाति बताने का कार्य किया।

आखिर आज लाखों पुराना इतिहास लेकर ऐसे वाकयुद्ध की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? सब जानते हैं वर्षों से दलितों को पूजा अर्चना से लेकर अन्य सामाजिक कार्यों में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे अब यदि लोग उन्हें सम्मान नहीं दे सकते कम से कम भगवान तो दे दीजिये. प्रवेश नहीं दे सकते तो मंदिर दे दीजिये।

यह बात सर्वविदित है कि चुनावों के दौरान गांव-गांव, गली-गली सभी को विभिन्न जातियों में बांट कर जीत या हार के लिए आंकडें गड़े जाते है। किन्तु वर्तमान में जातिवाद की राजनीति से जो सबसे दुःखद पहलू उभरा है वह है कि अब महापुरुषों को भी जातिवाद की राजनीति ने डस लिया है। इसमें सबसे पहली सोचने वाली बात यह है कि कोई भी इन्सान उस समय महापुरुष या भगवान बनता है कि उसने समस्त समाज के लिए बिना भेदभाव और जनकल्याण के कार्य किये हो। यदि इसके बाद उसे जाति की नजर से देखें तो यह सम्पूर्ण समाज और देश के लिए अपमान जनक है।

किन्तु आज ये कार्य बड़े स्तर पर हो रहा है। देश के संविधान निर्माता अम्बेडकर साहब को आज तक उनके किये कार्यों से ज्यादा उनकी जाति के नाम पर घसीटा जा रहा है। गुजरात चुनाव में भी गाँधी जी की जाति को लेकर बवाल सबने सुना था। देश के प्रथम गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल से लेकर वर्तमान में तो राजनेता महापुरुषों के साथ-साथ देवी, देवताओं, ऋषि मुनियों तक को जाति विशेष के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं।

श्री कृष्ण और रावण की जाति से लेकर ये लोग किस तरह महर्षि बाल्मीकि की जाति, संत रविदास को चर्मकार, विश्वकर्मा को बढ़ई, चित्रगुप्त को कायस्थ, कुबेर को वैश्य, परशुराम को ब्राह्मण समाज से जोड़ कर देखने-दिखाने की रीत चल रही है। महाराणा प्रताप को लेकर सहारनपुर में राजपूत और दलितों के बीच हुई हिंसा गत वर्ष कैसी सुर्खिया बनी थी कौन नहीं जानता। क्या महाराणा प्रताप ने सिर्फ एक जातीय विशेष के लिए अकबर से युद्ध किया था या देश और धर्म की रक्षा के लिए? आखिर क्यों जो युद्ध जीतने वाले या समाज के लिए कार्य करने वाले की जाति को लेकर अपनापन दिखाते हैं वह कन्नौज के राजा जयचंद और सिकन्दर का साथ देने वाले राजा अम्भिक की जाति बताने से क्यों डरते है?

भगवान परशुराम जाति से ब्राह्मण थे और कहा जाता है 21 बार उन्होंने धरा क्षत्रिय विहीन की थी यानि बड़ा नरसंहार हुआ होगा ना? उनकी जय-जयकार की जाती रही है तो फिर सोमनाथ के मंदिर में प्रवेश द्वार का रास्ता बतलाने वाले पंडित रुद्र्भद्र की जाति को क्यों सामने नहीं लाया जाता? समस्या यही है कि अच्छे लोगों को जाति में बाँटकर गर्व करो बुरे लोगों की जाति से किनारा करो, जबकि महापुरुषों के दर्शन व शिक्षाएं जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अनुकरणीय हैं तथा उनके जैसी अतुलनीय छवि को जाति में बांधना उनका घोर अपमान करना है। ऐसा करने में कोई एक शामिल नहीं है लेकिन इससे वीरों, महापुरुषों का जातिगत बंटवारा होकर उनकी शिक्षा और वीरता धूमिल हो जाती है और देश की एकता अखंडता पर भी चोट लगती है।…राजीव चौधरी

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