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दूसरों के बच्चे आतंकी क्यों?

राजीव चौधरी

अपने बच्चों के हाथ में किताब बाकि बच्चों के हाथ में हथियार! अलगावादी के बच्चे डॉक्टर दूसरों के बच्चे आतंकी क्यों? अपने बच्चों से कहते है महफूज रहो, दूसरों के बच्चों को देश के खिलाफ लड़ाते हो क्यों? यह सवाल पिछले दिनों कश्मीर हिंसा के दौरान अलगाववादी नेताओं की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूर्व आतंकी हाशिम कुरैशी के बेटे जुनेद कुरैशी ने वीडियो सन्देश के जरिए कश्मीरी अलगावादी नेताओं से पूछे थे। आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद जब कश्मीर हिंसा के दौर से गुजर रहा था और पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी द्वारा हर रोज बुलाए जा रहे कश्मीर बंद के आह्वान के कारण कई कश्मीरी युवाओं को अपनी जान गवानी पड़ी थी, उसी दौरान गिलानी के पोते को भाजपा-पीडीपी गंठबंधन वाली राज्य सरकार में एक आउट-ऑफ-टर्न सरकारी नौकरी दी गयी थी। जिसका खुलासा अब एक अंग्रेजी अखबार ने किया। गिलानी के पोते, अनीस-उल-इस्लाम को सरकारी नौकरी देने के लिए राज्य सरकार की भर्ती नीति के सभी नियमों का उल्लंघन किया गया। इस्लाम को शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल संवहन कनवेक्शन कॉम्पलेक्स में रिसर्च ऑफिसर के रूप में नियुक्त किया गया जो जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग की एक सहायक संस्था है। इस नौकरी में सालाना वेतन 12 लाख रुपये का है।

लंदन जाकर बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में दूसरी मास्टर डिग्री हासिल करने वाले अनीस को राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा चयन नियमों को ताक पर रखकर यह पद सौंपा गया था। जब हजारों कश्मीरी बच्चे गिलानी द्वारा स्कूल जाने का बायकाट करने के आह्वान के बाद घर बैठे थे तब नईम की बड़ी बेटी गिलानी की पोती ने अपनी स्कूल परीक्षाएं दी थी। ज्ञात हो कि गिलानी की पोतियां एक एयरलाइन कंपनी में क्रू मेंबर के रूप में कार्य करती हैं। शायद यह सब सुनकर उन लाखों कश्मीरी युवाओं को सोचने पर मजबूर कर दे। जो कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के इशारे पर लोग सडक पर उतर आते हैं। शहर बंद कर देते हैं, पत्थर बरसाते हैं उनके बच्चे और तमाम सुख सुविधा के साथ कुछ के परिवार और बच्चे मलेशिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका है तो कईयों के बच्चे दिल्ली, मुम्बई, और बेंगलूरु में रहकर या तो पढाई कर रहे हैं या ऊँची नौकरी।

कश्मीरी नौजवान जुनैद कुरैशी ने अलगाववादियों से सवाल पूछे थे कि यदि हथियार उठाने जरूरी है तो फिर अलगाववादी अपने बच्चों को बन्दूक क्यों नहीं थमाते? क्यों अपने बच्चों को थोड़ा बड़ा होते ही यह लोग कश्मीर से बाहर भेज देते है? देखा जाये तो जुनैद के सवालों में दम है क्योंकि ऐसा कश्मीर के लगभग हर अलगाववादी ने किया। फिर चाहे वह तहरीक-ए-हुर्रियत के नेता अली शाह गिलानी हों, हिजबुल सरगना सलाहुदीन या फिर दुखतरान-ए-मिल्लत की आसिया आंद्राबी हो। न आज तक इनके बच्चे कभी किसी प्रदर्शन में शामिल हुए न पत्थर उठाते और न ही आतंकी बनते। जब कश्मीर इनकी कलुषित मानसिकता की भट्टी में जलता है तब यह अपने बच्चों को कश्मीर से बाहर भेज देते है या इनके बच्चें विदेशों में आराम फरमा रहे होते हैं।

वर्ष 2008 के दंगों की बात हो या 2010 या 16 की। सेना पर हमला करने वाले कश्मीरी युवा किस तरह इन लोगों के बो(क आतंक की चपेट में आकर अपना जीवन बर्बाद कर डालते हैं। यासीन मलिक कश्मीर के अन्दर इस्लामिक ड्रेस बुर्के आदि की पैरवी करता है लेकिन उनकी पाकिस्तानी पत्नी मुशहाला हुसैन लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएट हैं और वह यूरोपीय परिधान ही पसंद करती है। मुशहाला के पिता एम ए हुसैन पाकिस्तान के जाने माने इक्नोमिस्ट हैं और उनकी माँ पाकिस्तान की पार्टी मुस्लिम लीग की महिला मोर्चा की अध्यक्ष है। इनके बाद दूसरे अलगाव नेता मीर वाइज उमर फारुक का नाम आता है। उमर फारुक की पत्नी शीबा मसदी अमेरिकी मूल की है जो अपनी बेटी के साथ अमेरिका में ही रहती है। फारुक की बहन राबिया फारुक अमेरिका में डॉक्टर है। गिलानी का उत्तराधिकारी माना जा रहा मोहम्मद अशरफ सहराई का बेटा आबिद भी दुबई में कम्प्यूटर इंजीनियर है। एक अन्य हुर्रियत नेता गुलाम मोहम्मद सुमजी इनका बेटा जुगनू दिल्ली रहकर अपनी पढ़ाई कर रहा है उसे छोटी आयु में दिल्ली यह कहकर रिश्तेदारों के पास भेज दिया था कि कश्मीर की फिजा खराब है। क्या हुर्रियत नेता बता सकते है कि कश्मीर की फिजा क्यों और किसके द्वारा खराब है?

दुखतरान-ए-मिल्लत की फरीदा एक महिला अलगाववादी नेता के रूप में प्रख्यात है कश्मीरियों को भड़काने में अग्रणी भूमिका में रहती है लेकिन इनका बेटा रुमा मकबूल साऊथ अफ्रीका में डॉक्टर है हालाँकि 2014 के चुनाव में फरीदा को गिरफ्तार कर लिया गया था। आतंकी और हुर्रियत नेता मसरत आलम जिनकी रिहाई को लेकर भाजपा-पीडीपी गठबंधन में 2015 में रार दिखी थी उनके दोनों बेटे श्रीनगर के एक अच्छे स्कूल में रहकर पढाई कर रहे हैं। हुर्रियत प्रवक्ता एयाज अकबर का बेटा सरवर याकूब पुणे में रहकर मेनेजमेंट की पढाई कर रहा है। जबकि गरीब और अनपढ़ कश्मीरी हाथों में पत्थर लिए इस उम्मीद से डोल रहे हैं कि ये नेता उनकी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। यही नहीं यदि इसके बाद शेष भारत के उन मुस्लिम नेताओं पर गौर करे जो हमेशा मुस्लिमों को शिक्षा की मुख्यधारा से हटाकर उनके लिए राजनैतिक स्तर पर मदरसों की मांग करते हैं उन सबके बच्चे भी विदेशों में पढ़ते हैं या फिर भारत में ही ऊँचे पदों पर विराजमान है। हमेशा मुस्लिमों के लिए शरियत या फिर अन्य इस्लामिक कानूनों को थोपने वाले ओवेशी ने खुद विदेश से शिक्षा हासिल की है।  क्या आज गरीब मुस्लिम इन पैंतरों को नहीं समझ पा रहा है कि किस तरह यह लोग मजहब का नाम लेकर उनके बच्चों के भविष्य से खेल रहे हैं। अगर कश्मीरी समुदाय ने अपनी सोच के रवैये में बदलाव नहीं किया, तो आतंक की आग में वह झुलसता रहेगा और अपने और कश्मीर के भविष्य को गड्ढे में धकेले जाने के लिए अभिशप्त रहेगा।

 

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