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देशभक्त हो तो राष्ट्रगान से आपत्ति क्यों?

Oct 6 • Samaj and the Society • 36 Views • No Comments

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पिछले 70 वर्षों में ऐसा कोई भारतीय नहीं होगा, जो राष्ट्रगान के शब्दों और उन्हें दी गई धुन से गुजरा न हो. राष्ट्रगान पिछले 70 वर्षों से हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता पर गर्व करने का मौका देता रहा है. 1911 में लिखे गीत को 24 जनवरी 1950 को भारत का राष्ट्रगान घोषित किया गया. तब से ही यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता, संस्कृति, एकता व अखंडता का प्रतीक बना हुआ है. लेकिन अब 70 वर्ष बाद इसे लेकर एकाएक राजनीति शुरू हो चुकी है. इस गीत के शब्दों से किसी की स्वतंत्रता का हनन होने लगा तो किसी के मजहब को अचानक खतरा उत्पन्न होने का भय सताने लगा है. परन्तु इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि ऐसे करने वालों का, समर्थन करने वालों की भी कोई कमी नहीं है. नहीं तो क्या वजह है कि कश्मीर में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तानी झंडा लहराने, भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के दौरान पाक की टीम का समर्थन करने और अपने देश के ही राष्ट्रगान को हिंदूवादी और अपवित्र बताने वालों के समर्थन में भी खड़े होने वाले हजारों लोग मिल जाते हैं. भले ही ऐसे कट्टरपंथी लोगों की संख्या अभी कम हो लेकिन इस बीमारी को नासूर बनाने वालों की संख्या दिनोंदिन बढती जा रही है.

हाल ही में एक बार फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मदरसों की तरफ से सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मदरसों को राष्ट्रगान गाने से छूट नहीं मिलेगी. हाई कोर्ट ने कहा है कि राष्ट्रगान और तिरंगे का सम्मान संवैधानिक कर्तव्य है. उच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान को जाति, धर्म और भाषा भेद से परे बताते हुए मदरसों की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया. हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मदरसों में राष्ट्रगान अनिवार्य रूप से गाना ही पड़ेगा. इससे पहले 15 अगस्त को मदरसों में ध्वजारोहण और तिरंगा फहराने का कार्यक्रम करने और इसकी रिकॉर्डिंग करने के फरमान को लेकर भी यूपी में मतभेद के स्वर खड़े हो चुके हैं.

देश में मजहब, मजहब के नाम पर राजनीति और उस राजनीति से लाभ उठाने वाले नेता अब देश से भी बड़े बन चुके है. शायद यही वजह है कि इस देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना तो दूर ये लोग बड़े आराम से उससे जुड़े प्रतीकों, चिन्हों और सम्मानों का मजाक उड़ा सकते हैं. और फिर बड़े शान से उससे मिलने वाली सुविधाओं पर अपना हक जता सकते हैं. आप यहां धर्म, जाति या किसी और खेल से अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं और उसे हासिल भी कर सकते हैं लेकिन बात जब देश के प्रति अपने कर्तव्यों की आए तो मजहब और जाति के नाम पर उससे मुंह फेर सकते हैं. यदि कोई इनके इस आचरण पर सवाल उठाये तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का रोना रोया जा सकता है.

राष्ट्रगीत वन्देमातरम को लेकर समय-समय टकराव देखा इतिहास इसका साक्षी भी कि 1938 में मुहम्मद अली जिन्ना ने जब खुले तौर पर पार्टी के अधिवेशनों में वन्दे मातरम् गाए जाने के खिलाफ बगावत की थी. परिणामस्वरूप देश को बंटवारे का दंश झेलना पड़ा था. उस समय भी मजहबी फुंकार सुनाई दी थी आज फिर उसी विचारधारा को जिन्दा रखने का कार्य पुनरू दोहराया जा रहा है. आखिर क्या कारण कि पिछले वर्ष कोलकाता के एक मदरसे में एक हेडमास्टर को सिर्फ इसलिए पीटा जाता है क्योंकि उसने आने वाली पीढ़ियों को इस देश का राष्ट्रगान सिखाने की कोशिश की थी. ऐसी घटनाएं यहां पहली बार नहीं हुई हैं लेकिन अफसोस कि ये बार-बार दोहराई जाती रही हैं. सरकारों को सब पता है लेकिन फिर भी सत्ता का लालच उन्हें इन घटनाओं के प्रति कुछ करने और इन्हें दोबारा घटने से रोकने के बजाय अपना मुंह और आंखें बंद रखने पर विवश करता है.

सब जानते है कोई भी देश सिर्फ अपने विशालकाय क्षेत्रफल और संसाधनों के बल पर महान नहीं बनता है बल्कि उसे महान बनाते हैं उस देश के हर नागरिक. उसका राष्ट्रवाद, उसके नागरिको का देश के प्रति अगाध प्रेम उसके प्रतीकों, चिन्हों के प्रति उसकी निष्ठां उसकी संस्कृतिक विरासत के प्रति उसकी श्रद्धा. यदि नागरिकों के मन में ही अपने ही देश के लिए सम्मान और प्यार नहीं होगा तो भला कैसे वह देश शक्तिशाली बनेगा और आगे बढ़ेगा. ऐसे देश को बाहरी दुश्मनों की जरूरत ही क्या है जिसके अपने ही इतनी घातक सोच रखते हैं?  मात्र एक राष्ट्रगान से काजी अख्तर के खिलाफ उस समय फतवा जारी कर दिया गया था उसे साफ शब्दों में कहा गया था कि मदरसा और उस इलाके में भी कदम न रखें. जब एक देश में उसका राष्ट्रगान ही शर्मिंदा होता हो और उस देश का ध्वज गैर मजहबी हो जाये तो क्या उस देश में धर्मनिपेक्षता का सिद्धांत बोना नहीं हो जाता? पर शायद ही किसी राजनितिक दल को देश और उससे जुड़े प्रतीकों को सम्मान न देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की चिंता हो. जब राजनीति करने वालों को ही देश की चिंता नहीं है तो भला इन कट्टरपंथियों की फिक्र उन्हें क्यों होने लगी और इन लोगों को इस देश की फिक्र क्यों होने लगी?

राजीव चौधरी

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