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धर्मांतरण की नई परियोजना

Mar 11 • Samaj and the Society • 87 Views • No Comments

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दलित मुस्लिम एकता गठजोड़ राजनीतिक नहीं बल्कि एक धार्मिक परियोजना का हिस्सा हैं क्योंकि इसमें कोसने को हिंदुत्व है, आलोचना करने को मनुस्मृति है. अपशब्द बोलने को हिन्दुओं के महापुरुष है और नफरत करने को हिन्दुओं के त्यौहार है. इस परियोजना की तस्वीर आप दूर से देखेंगे तो लगेगा यह राजनितिक है किन्तु जब तस्वीर के एक-एक पहलु पर गौर करेंगे इसकी बारीकियों पर नजर डालेंगे तो सच सामने आकर खड़ा हो जायेगा.

अगले कुछ महीनों में चुनाव होने जा रहे है इस कारण देश में राजनीतिक और सामाजिक उथलपुथल मचनी तय है, इसमें किसानों का विरोध प्रदर्शन है तो कहीं जातीय समूहों का आंदोलन है. लेकिन इस सबके बीच एक बड़ा ही राजनितिक दिलचस्प खेल भी होने जा रहा है जिसे लोग दलित और मुस्लिम गठजोड़ बता रहे है. बहाना बनाया जा रहा है कि दलितों और मुसलमानों के हालात एक जैसे हैं और मौजूदा सरकार इन दोनों ही समुदायों की लगातार उपेक्षा कर रही है. यह असउददीन ओवैसी टाइप कुछ चतुर नेताओं का खेल दिख रहा था कि वह इस बहाने सत्ता में अपनी दखल बना रहे है किन्तु अब तस्वीर बदल रही है दलित और मुस्लिम गठजोड़ का फॉर्मूला केवल चुनाव तक ही सिमित नहीं है, जाति और धर्म का ये पूरा गणित है बल्कि इसमें धर्मांतरण का खेल भी छिपा है.

इसे शुरू से समझिये हैदराबाद की यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला आत्महत्या करता है सवाल बनाया जाता कि देश में दलित मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, जबकि इसमें दूर-दूर तक किसी मुस्लिम का लेना देना नहीं होता फिर गुजरात के ऊना में दलितों के साथ एक घटना घटती है फिर यही शोर दोहराया जाता इसमें भी किसी मुस्लिम का कोई लेना देना नहीं होता है. इसके बाद भीमा कोरेगांव में शौर्य दिवस मनाया जाता है और मंच पर मुस्लिम संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, मूल निवासी मुस्लिम मंच, छत्रपति शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड, दलित इलम आदि संगठन चढ़कर खड़े हो जाते है और फिर यही दोहराया जाता है कि कि देश में दलित मुस्लिम सुरक्षित नहीं है. दलितों पर अत्याचार की कहानी सुनाई जाती हैं और उन्हें यह पहाडा पढाया जाता है कि अत्याचार करने वाले सिर्फ हिन्दू होते हैं.

इस बात को बार-बार दोहराकर दलितों को यही घुट्टी पिलाने की कोशिश जारी है कि वह खुद को अन्य हिन्दुओं से अलग समझे यदि एक बार दलितों ने अलग समझ लिया तो धर्मांतरण का आधा कार्य आसान हो जायेगा. इस कारण जनवाद के नाम से नये मंच तैयार किये जा रहे हैं. जिनमें दलितों को भारतीय महापुरुषों के प्रति घृणा का पाठ पढ़ाया जा रहा है उन्हें बताया जा रहा है कि दलित एवं पिछड़े वर्ग को तो होली, दशहरा, दिवाली एवं भारतीय महापुरुषों के जन्मोत्सव तक नहीं मनाने चाहिए. असल सच्चाई यह है कि देश में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दलित करीब 20 फीसदी है और मुसलमान 15 फीसदी. दोनों मिलकर 35 फीसदी के लगभग हैं तो मुस्लिम धर्म गुरुओं से लेकर नेताओं तक इस समीकरण को समझकर यही सोच रहे कि इन आंकड़ों की फिलहाल क्यों न वर्तमान में राजनितिक और भविष्य में धार्मिक खुराक बनाई जाये.

दलितों को भड़काने के लिए डॉ आंबेडकर जी का नाम लेते है जबकि डॉ. अम्बेडकर ने इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन देने वाले हैदराबाद के निजाम का प्रस्ताव न केवल खारिज कर दिया अपितु 1947 में उन्होंने पाकिस्तान में रहने वाले सभी दलित हिन्दुओं को भारत आने का सन्देश दिया. डॉ. अम्बेडकर 1200 वर्षों से मुस्लिम हमलावरों द्वारा किये गए अत्याचारों से परिचित थे. वे जानते थे कि इस्लाम स्वीकार करना कहीं से भी जातिवाद की समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि इस्लामिक फिरके तो आपस में ही एक दूसरे की गर्दन काटते फिरते हैं. वह जानते थे कि इस्लाम स्वीकार करने  में दलितों का हित नहीं है.

लेकिन आज दलित नेताओं के द्वारा डॉ. अम्बेडकर की तस्वीर मंच पर सजाकर उसके इस्लाम के प्रति विचारों को किनारे कर दफनाने का कार्य किया जा रहा है. वामपंथी सोच वाला प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस षडयंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका सी निभाता दिख रहा है. समाजवाद का ढ़ोल पीटने वाले भारतीय राजनितिक दल इस्लामवाद की चपेट में आकर दलित समुदाय के सामाजिक विकास को प्रोत्साहन देने के बजाय उल्टा उनको इस्लामवाद की भट्टी में झोंकने में तत्पर से दिखाई दे रहे हैं.

जो दलित आज यह समझ रहे है कि मुस्लिमों में भेदभाव नही है तो उन्हें समझना होगा कि भले इस्लाम पंथ में सारे मुसलमान समान हों पर व्यवहार और रहनसहन में यह अंतर साफ दीखता है. यहां तक कि अलग-अलग जातियों की मस्जिदें भी अलग-अलग हैं. देवबंदवी से लेकर बरेलवियों के झगड़े साफ नजर आते हैं. इसके अलावा शिया-सुन्नी-वोहरा और अहमदिया मुसलमान अलग हैं. इनमें से हर एक दूसरे से दूरी बरतता है और हिंसक हो उठता है. कुछ अन्य धर्म के लोगों को नीचा समझते और शरीयत से इंकार करने पर दूसरे धर्म के लोगों के साथ रहने में असहज हो उठते हैं.

गौरतलब बात यह है कि दलितों को भड़काने वालों के दलित नेताओं के लिए डॉ. अम्बेडकर के इस्लाम के विषय में विचार भी कोई मायने नहीं रखते. क्या ये जनवादी और अम्बेडकर के नाम पर रोटी तोड़ने वाले तथाकथित दलित हितेषी दल इस नफरत से दलितों को अपने ही धर्म और समाज से दूर करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं? ऐसा करने वाले दलित हितेषी नेता तो आज एक बारगी चुनाव जीत जायेंगे किन्तु इसकी एवज में वर्षों शोषित रहा समाज जो आज समाज की मुख्यधारा में आकर अपना कार्य कर रहा है उस दलित समाज पीछे धकेल कर पुन: अपना गुलाम बना लेंगे…विनय आर्य

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