नव वर्ष २०१४ सा शुभ अवसर पर हार्दिक शुभ कामनाये।

May 28 • Uncategorized • 22 Views • No Comments

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नमस्ते प्रिय मित्रों व बंधुओं,
आज आंग्ल नव वर्ष २०१४ आरम्भ हो रहा है।   इस अवसर पर मैं आपको अपनी व अपने परिवार की ओर से हार्दिक शुभ कामनाएं देता हूँ।  सृष्टिकर्ता  ईश्वर से प्रार्थना है कि वह नूतन वर्ष २०१४ व भावी जीवन में आपको सुख, समृद्धि  व मनचाही सफलताएं प्रदान करें।
इस अवसर पर मैंने अपने कुछ विचार एक लेख के माध्यम से प्रस्तुत किये है वह संलग्न कर रहा हूँ.
आदर सहित,
नया वर्ष २०१४ आरम्‍भ हो रहा है।  आज प्रथम दिवस के अवसर पर हम जहां अपने मित्रों, परिवारजनों और परिचितों को नये वर्ष की शुभकामनायें दे वहां हम समझते हैं कि हमें कोई नया संकल्‍प भी लेना चाहिए। ऐसा एक संकलप हम आगामी पंक्‍तियों में प्रस्‍तुत कर रहें हैं। कृपया स्‍वयं विचार कर देखें कि क्‍या यह हमारे लिए उचित व आवश्‍यक है। बन्‍धुओं, मनुष्‍य जीवन परमात्‍मा की हमें अनमोल देन है। यह ऐसी देन है जो परमात्‍मा के अलावा कोई किसी को दे नहीं सकता। हमने अपने अध्‍ययन व चिन्‍तन से जाना कि हम यह मानव शरीर किसी विशेष प्रयोजन को पूरा करने के लिए दिया है। वह प्रयोजन क्‍या है? विचार करने पर हमें पता लगता है कि हमारी आत्‍मा अनादि, अनुत्‍पन्‍न, नित्‍य, एकदेशी, आनन्‍द व सुख से रहित,सुख व आनन्‍द प्राप्‍ति के लिए प्रयत्‍नशील, जन्‍म व मृत्‍यु के बन्‍धन से ग्रसित, अजर, अमर व अविनाशी है। ईश्‍वर ने हमें माता-पिता दिये और हमें उत्‍पन्‍न किया। जन्‍म लेने से पूर्व हम शरीररहित एक चेतन जीवात्‍मा थे और इस जन्‍म की भांति नाना जीव योनियों में जीवन व्‍यतीत कर रहे थे। वहां की अवधि पूरी कर अपने कर्मानुसार फल भोगने और जीवन से मुक्‍ति या मोक्ष को प्राप्‍त करने के लिए इस मनुष्‍य योनि में आयें हैं। हमें उत्‍पन्‍न करने वाला ईश्‍वर सत्‍य, स्‍वतन्‍त्र चेतनतत्‍व, आनन्‍द स्‍वरूप, सर्वज्ञ, अजन्‍मा, अनुत्‍पन्‍न, नित्‍य, अविनाशी, अजर, अमर, निराकार, सर्वव्‍यापक, सर्वशक्‍तिमान व सृष्‍टिकर्ता है। ईश्‍वर ने सूर्य, चन्‍द्र, पृथिवी व इस ब्रह्माण्‍ड को एक जड़ तत्‍व प्रकृति से बनाया है जो अति सूक्ष्‍म, नित्‍य व अनाद, सत्‍व-रज-तम गुणों वाली, जड़ पदार्थ व परिमाण में अनन्‍त है। अत: ईश्‍वर द्वारा दिये गये ज्ञान ’’वेद’’ के आधार पर सृष्‍टि के आरम्‍भ में ही हमारे प्राचीन ऋषियों ने प्रत्‍येक मनुष्‍य वा स्‍त्री-पुरूष के पांच दैनिक कर्त्तव्‍य निर्धारित किये थे। वह कर्त्तव्‍य हैं, ईश्‍वर का ध्‍यान करना जिस  सन्‍ध्‍या कहते हैं। दूसरा देवयज्ञ, अग्‍निहोत्र या हवन है। तीसरा पितृ यज्ञ है जिसमें माता-पिता-परिवार व समाज के वड़ों व वृद्धों की श्रद्धापूर्वक सेवा करनी होती है, चौथा कर्त्तव्‍य अतिथि यज्ञ अर्थात् समाज व देश के विद्वानों, आचार्यो, ज्ञानियों, समाज हितैषियों, देशभक्‍तों आदि की श्रद्धा के साथ सेवा, सहायता, सहयोगव उनके प्रति श्रद्धा की भावना रखनी होती है। पांचवां व अन्‍तिम कर्त्तव्‍य है बलिवैश्‍वदेव यज्ञ। यह यज्ञ प्राणी मात्र के प्रतिमित्रता की भावना रखते हुए उनके जीवन यापन में सहयोग करना व अपना जीवन शतप्रतिशत अंहिसापूर्वक व्‍यतीत करना। केवल शाकाहारी, शुद्ध व पवित्र भोजन ही करना। इन पांच कर्त्तव्‍यों के निर्वाह करने से व्‍यक्‍तिगत, सामाजिक, स्‍वदेश व वैश्‍विक उन्‍नति के अनेक प्रयोजन सिद्ध होते हैं और साथ-साथ हम कृतघ्‍न नहीं होते। आईये, इन पांच नित्‍य व दैनिक कर्त्तव्‍यों पर संक्षेप में और विचार करते हैं।

पहले दैनिक कर्त्तव्‍य के अन्‍तर्गत ईश्‍वर का ध्‍यान हमें इस लिए करना है कि उसने हमारे लिए यह संसार बनाया, हमें जन्‍म दिया, माता-पिता-परिवार, समाज व देश सब उसी की देन है। वह बहुत बड़ा ज्ञानी, शक्‍तिमा, हमारारक्षक, जन्‍म-जन्‍मान्‍तर का का मित्र, बन्‍धुव सखा है। उसे जानना, उसका ध्‍यान करते हुए उसकी स्‍तुति, प्रार्थनाव उपासनाकरना। संसार में वह सबसे बड़ा, परम दानी, परम ऐश्‍वर्यशाली है। उसकी स्‍तुति से निराभिमानता अर्थात् अहंकार का नाश होगा। उसके गुणों में प्रीति होने से उससे निकटता व मित्रता होगी और हमारे दुष्‍ट विचारव दुर्गुण दूर होगें तथा उपासना से उसकी निकटता व साक्षात्‍कार होता है।  ईश्‍वर का प्रत्‍यक्ष इस तथ्‍य से भी होता है कि जब हम कोई बुरा काम करते हैं या करने का विचार करते हैं तो हमारी आत्‍मा में भय, शंका व लज्‍जा पैदा होती है और जब कोई अच्‍छा काम या उसे करने का विचार करते हैं तो प्रसन्‍नता, उत्‍साह, निडरता व निर्भयता आती है। आत्‍मा में यह आनन्‍द, उत्‍साह, व भय, ईश्‍वर द्वारा उत्‍पन्‍न किया जाता है और सबके साथ ही ऐसा होता है। यह ईश्‍वर के हमारी आत्‍मा में विद्यमान होने व उसके अस्‍तित्‍व का प्रत्‍यक्षप्रमाण है। हम आंखों से ईश्‍वर को इस कारण नहीं देख पाते हैं कि वह अणु, परमाणु, आकाश, वायु, गन्‍ध व अनेक अस्‍तित्‍ववान सूक्ष्‍म पदार्थों से भी सूक्ष्‍म, सर्वातिसूक्ष्‍म, है। अत: हमारा पहला नित्‍य दैनिक कर्त्तव्‍य ईश्‍वर का ध्‍यान करना व उसके उपकारों के लिए प्रात: वे सायं लगभग एक घटें तक उसके स्‍वरूप व उपकारों का ध्‍यान करते हुए उसका धन्‍यवाद करना है। दूसरा कर्त्तव्‍य दैनिक अग्‍निहोत्र या देव यज्ञ है। यह भी प्रात: व सायं करना होता है। इसमें शुद्ध गाय का घृत, आयुर्वेदिक औषधियों व वनस्‍पतियों, गुड़, शक्‍कर आदि मिष्‍ट पदाथों व सूखें फलों, मेवों आदि की वेद-मन्‍त्रोच्‍चार पूर्वक यज्ञ कुण्‍ड की अग्‍नि में आहुतियां दी जाती है। इसके करने से हमारे प्राणवायु-श्‍वांस को छोड़ने, रसोई में भोजन पकाने, कपड़े धोने, भूमि पर चलने आदि से जो वायु, जल प्रदुषण एवं कीट-पंतगों व सूक्ष्‍म जीवों की हत्‍या होती है उसका समाधान होता है अन्‍यथा ईश्‍वर के विधान से जन्‍म-जन्‍मान्‍तरों में उनके फलों के भोगने से हमारा जीवन दु:ख पूर्ण होता है, ऐसा कर्म-फल सिद्धानत से विदित होता है। तीसरा पितृ यज्ञमें माता, पिता, आचार्य, ज्ञानी, वृद्धों के प्रति आदर रखते हुए उनकी भोजन, वस्‍त्र वअन्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने हुए श्रद्धापूर्वक सेवा करनी होती है। इससे हमें उनका आशीर्वाद व शुभकामनायें प्राप्‍त होती है। हमारा जीवन सुख व चैन से शान्‍तिपूर्वक व्‍यतीत होता है। चौथा कर्त्तव्‍य अतिथि यज्ञ है जिसमें हमें विद्वानो, गुणियों, ज्ञानियों-विज्ञानियों, अनुभवियों, समाज को उन्‍नत बनाने वाले उपदेशक व विद्वानों आदि की धन के दान, भोजन आदि कार्यों से सेवा करनी होती है जिससे वह लोग हमारे सम्‍पर्क में आते रहें और अपने ज्ञान व अनुभवों से हमारा मार्ग दर्शन करते रहें। इससे देश व समाज सबल व उन्‍नत होता है। आज ऐसी भावना समाप्‍त प्राय: है जिसे पुनर्जीवित करना है। पांचवा कर्त्तव्‍य बलिवैश्‍वदेव यज्ञ है जिसमें पशु, पक्षियों व प्राणीमात्र के प्रति मित्र की भावना रखते हुए उनके भोजन आदि से सत्‍कार करना होता है। इसका कारण यह है हमारा जीवन अनादि व नित्‍य होने से असंख्‍य-असंख्‍य बार सभी योनियों में आता जाता रहा है और आगे भी ऐसा ही होगा। अत: यह सभी जीवात्‍मा अनेकानेक जन्‍मों में हमारे पारिवारिक जन, मित्र व सहयोगी रहे हैं और आगे भी रहेगें। हमारा पुनर्जन्‍म अवश्‍य होगा और वह किसी भी जीव योनि में हो सकता है। उन सभी जीवन योनियों में हमें सुख की प्राप्‍ति हो इसके लिए इसी योनि में हमें तैयारी करनी है और उसी के लिए यह पांचवा कर्त्तव्‍य है। इन कर्त्तव्‍यों को पूरा करने के लिए महर्षि दयानन्‍द सरस्‍वती ने ‘’पंचमहायज्ञ विधि’’ नाम से एक पुस्‍तक लिखी है। जो पठनीय, उपयोगी व आचरण में सहयोगी है। हम समझते हैं आज नूतन वर्ष, २०१४ को मनाते हुए उपर्युक्‍त दैनिक पंचमहायज्ञों को करने का संकल्‍प लेकर भी इस दिन को मना सकते हैं। आपके विचारार्थ कुछ पंक्‍तियों लिखी है, एतदर्थ आपको धन्‍यवाद व नये आंग्‍ल वर्ष २०१४ के अवसर पर भूरिश: शुभकामनायें। आपका यह नया वर्ष व भावी जीवन सुख-समृद्धि व सफलताओं से पूर्ण हों, यह ईश्‍वर से कामना है।

विनीत :

Manmohan Kumar Arya

पता : १९६ चक्कू वाला ,
देहरादून – २४८००१
फ़ोन : ९४१२९८५१२१

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