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पाकिस्तान की असली समस्या कुछ और है

Sep 27 • Samaj and the Society • 839 Views • No Comments

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अमेरिकी सांसदों ने पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के लिए बिल पेश किया है. उडी हमले के बाद इसे भारत का सफलतम कूटनीतिक प्रयास कहा जा सकता है. हालाँकि इसके बाद हो सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदायों से पाकिस्तान के पक्ष और विपक्ष में कई तरह के बयान सामने आये. लेकिन हर एक बयान को भारत के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है. क्योकि हर एक बयान में पाकिस्तान के साथ आतंकवाद शब्द का जिक्र अवश्य होगा. यदि ऐसा होता है तो एक झूठे आभासी देश की आर्थिक स्थिति पर चोट होकर बिखरने का खतरा मंडराता सा दिखाई देगा. झूठा और आभासी क्यों कहा? तो में बता दूँ 14 अगस्त 1947 से विश्व मानचित्र के पटल पर उभरा पाकिस्तान दरअसल कोई देश नहीं है वो भारतीय भू-भाग का एक टुकड़ा है जो एक सीमा रेखा खींचकर धर्म के नाम पर सिर्फ दिखावें को मजहब के सहारे खड़ा हुआ था. ताकि भारत से अलग हो अपने मजहब के मूल्यों की रक्षा की जा सके. समय के साथ पाकिस्तान में मजहब के मूल्यों का तो पता नहीं पर मानवीय मूल्य बिखरते जरुर नजर आये जो एक धर्म की सबसे बड़ी पूंजी होती है. पाकिस्तान में मजहब के नाम पर एक बड़ा जाल फैलता गया जो जितना बड़ा मुल्ला उसे उतनी ज्यादा दाद और इमदाद का कारोबार सा सामाजिक और राजनितिक स्तर पर चल पड़ा. जो आज पाकिस्तान को एक आतंकवादी देश के रूप स्थापित सा करता नजर आने लगा है.
बंटवारे के बाद पाकिस्तानी शासकों की कोशिश ये थी कि हम भारतीय उपमहाद्वीप से कटकर सांस्कृतिक, धार्मिक रूप से तो मध्य एशिया के इस्लामिक देशों पलड़े में चले जाये और राजनेतिक रूप से विश्व शक्तियों के पाले में रहकर भारत के बराबर अपनी पहचान बनाये. जिसमे वो काफी हद तक कामयाब और नाकामयाब दोनों हुए. अमीर इस्लामिक देशों से धर्म के नाम पर खूब चंदा बटोरा तो रूस अमेरिका जैसी महाशक्तियों के टकराव का फायदा उठाकर हथियार. किन्तु इसका नुकसान भी पाकिस्तान को काफी उठाना पड़ा चूँकि उन्हें पाकिस्तान उस समय के भारतीय उपमहादेश से अमानत के रूप में मिला था। 1947 तक साझे इतिहास, भूगोल से बाहर आये पाकिस्तान को चाहे वह इतिहास हो या उनकी भाषा, धर्म, कला, रहन-सहन, रीति-रिवाज, किंवदंतियाँ या मुहावरे। अपनी राष्ट्रीय आत्म-पहचान को अभिव्यक्त करने या दावेदार बनने के लिए वे जिस दिशा में भी मुड़ते, वहाँ वे भारत की लंबी गहरी छाया विद्यमान पाते गये। इस कारण वे अपने को भारत से भिन्न साबित करने के लिए तरह-तरह के अजीब साधनों एवं उपायों का सहारा लेने लगे। विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में वे इतिहास को विकृत करते गये, माने गये तथ्यों एवं आँकड़ों को तोड़-मरोड़ कर रखते गये। इसलिए उन्होंने अपने इतिहास में भारत के दुश्मन गौरी, गजनवी, मोहमद बिन कासिम जैसे लुटेरों को अपना आदर्श लिखना शुरू किया. इसके लिए ना उन्होंने सिंध का असली इतिहास स्वीकारा ना ही बलूच लोगों का, पख्तून समुदाय की तो बात ही छोड़ दीजिये मसलन अपने इतिहास को अन्य धर्मो खासकर हिन्दू धर्म के खिलाफ बना डाला. उन्होंने अपने इतिहास में जो घटना भारत के लिए अशुभ थी नफरत दर्शाने को उसे ही शुभ लिख दिया. ताकि आने वाली पीढ़ी बंटवारे का असली कारण न पूछ पाए.
शुरुआत में तो इसका लाभ जितना सियासी जमातों को मिला उतना ही मजहबी तंजीमो को भी मिला लेकिन बाद में सियासी जमातों से ज्यादा मुल्ला मोलवियों को मिलने लगा. जिस कारण वहां का लोकतंत्र और सत्ता मजहबी रंग से रंग पुतकर खड़ी होने लगी. जब सत्ता के ऊपर धर्म और भाषा दोनों ताकत के बल पर हावी हुई तो उसकी हानि पाकिस्तान को बांग्लादेश के रूप में उठानी भी पड़ी. क्योकि पाकिस्तान का पाकिस्तान में भाषा और नेताओं के अलावा कुछ नहीं था. सिंध हो या करांची बलूचिस्तान हो पख्तून इलाका सबकी अपनी अलग-अलग भाषा और, सांस्कृतिक विरासत थी, जो अपने भाषाई व अन्य सांस्कृतिक परम्पराओं पर होने वाली चोट पर उखड़ने लगे जिसे सम्हालने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरानों को सेना का सहारा लेना पड़ने लगा. जहाँ भी राजनैतिक और मजहबी तंजीमे अपने भू अधिकार या अपनी सांस्कृतिक विरासत, और भाषा के लिए खड़ी होती वहीं सेना को उतार दिया जाता विद्रोह तो कुचला जाता पर पाकिस्तान की राजनीति में सेना का एक बड़ा हस्तक्षेप होता गया जिसने वहां फिर कई बार लोकतंत्र के मूल्यों पर भी हमला कर राजनीति कहो या लोकतंत्र को भी कैद किया, कैद के बाद यदि रिहा भी किया तो हमेशा इस शर्त पर किया कि सेना की छत्र-छाँव में ही या एक निश्चित दायरे में रहकर ही शाशन का हिस्सा बनना होगा. मतलब प्रशासनिक स्तर पर सेना और सामाजिक जीवन पर मजहब हावी हो गया जिनके बीच से वहां की राजनीति गुजरने लगी. साफ कहें तो पाकिस्तान के लोगों ने बस कुछ ही पल आजादी का सूरज देखा है जिसके बाद उसे सेना और मजहब के ठेकेदारों ने अपने व्यक्तिगत सुख और आनंद के लिए पाकिस्तान की सुरक्षा का हवाला देकर हमेशा अस्त सा कर दिया.
धीरे-धीरे नफरत की शिक्षा की फसल पकनी आरम्भ हुई जो उसने विशेषकर भारत के लिए बोई थी, भारत में तो जो किया वो किया इसके बाद उसने अपने बीज पाकिस्तान में बिखेरने शुरू किये तो पाकिस्तान ने विश्व स्तर पर खुद को आतंकवाद से त्रस्त देश का रोना रोकर हर बार बच निकलने का प्रयास जारी रखा. जिसके बदले उसे अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति और आर्थिक सहायता राशि मिलना आरम्भ हो गयी. शीत युद्ध के दौरान या तालिबान के खात्मे के समय अमेरिका को पाकिस्तान की जमीन उपयोग करने को मिली तो पाकिस्तान को बदले में पैसा. जो उसने भारत के खिलाफ छदम युद्ध शुरू करने और हथियार खरीदने में गवां दिया. बहरहाल यह चर्चा लम्बी है.
यदि आज वर्तमान में आये तो एक ओर पाकिस्तान का खोखला लोकतंत्र तो दूसरी और मजहबी तंजीमे तो तीसरी पाकिस्तान की सबसे बड़ी धुरी सेना बनी हुई है. और इनके बीच खड़ी है पाकिस्तान की जनता जो आधुनिक शिक्षा, रोजगार जैसे मूलभूत अधिकार लिए तरस रही है. इसी कारण चाहकर भी कोई सरकार भारत से रिश्ते मजबूत नहीं बना पाती यदि भारत से रिश्ते मजबूत होते है तो भारत से पुस्तक, वीडियो एवं अन्य सांस्कृतिक सामग्रियों का आयात होता है और उन्हें भय है कि यदि ऐसे आयात पर प्रतिबंध या नियंत्रण बनाए न रखें तो उनकी खुद की पहचान बनाने की कोशिश विफल हो जाएगी, जो उन्होंने 70 साल से अपने लोगों के अन्दर बनाई है. यदि भारत से सम्बन्ध मजबूत बनते है तो मजहब के ठेकेदारों को इमदाद मिलना कम हो जाता है. सेना को राजनीति से अपना नियन्त्रण सा खत्म होता दिखाई देने लगता है, भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर लोग अपनी मांग तेज करने लगते है. मसलन जब भी वहां का आवाम उन्हें दरकता दिखाई देता लगता है तो उसे भारत से खतरा दिखाया जाने लगता है, कश्मीर समस्या का राग अलापा जाने लगता है, बयानबाजी के शोर में हमेशा अपने लोगों की आवाजे दबा दी जाती है जिससे सेना, मजहब और सियासत तीनों की दुकान चल उठती है. कश्मीर पाकिस्तान की कोई समस्या नहीं है बस वो अपनी समस्याओं पर पर्दा डालने के कश्मीर समस्या को उठाये रखता है. यही इस पड़ोसी के साथ राष्ट्रीय आत्म-पहचान की सबसे बड़ी समस्या है कि किसी भी तरह भारत के लिए समस्या पैदा करे, क्योंकि इसी की बदौलत पाकिस्तान एक देश के तौर पर बना रह सकता है

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