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पिंजरा तोड़ ग्रुप या देश तोड़ ग्रुप?

खबर है कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने जाफराबाद में हुए दंगों के मामले में पिंजरा तोड़ संगठन की सदस्य नताशा और देवांगना कलिता को गिरफ्तार किया है। सीएए कानून के विरोध में प्रदर्शन को लेकर महिलाओं को भड़काने और जगह जगह सुनियोजित तरीके से ऐसे प्रदर्शन शुरू करवाने में पिंजरा तोड़ ग्रुप की अहम भूमिका निकली है।  नताशा और देवांगना की पीएफआई के कई लोगों समेत दंगों से जुड़े लोगों के साथ कई बार मीटिंग हुई जिसमें नताशा और देवांगना समेत दूसरे पिंजरा तोड़ के लोगों को भावनाए भड़काने और माहौल गरम करने को बोला गया। यानि अभी तक दंगे आगजनी और राष्ट्रविरोधी कार्यों के लिए हिजबुल, लश्करे तैयबा जैश समेत पाकिस्तान की आई. एस. आई. का नाम सुना था अब अचानक से ये पिंजरा तोड़ संगठन कहाँ से आ गया? 

बताया जा रहा है कि पिंजरा तोड़ ग्रुप कॉलेज की छात्राओं का एक कथित संगठन है, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के नामी कॉलेजों की लड़कियां बताई जाती हैं। ये संगठन कॉलेज हॉस्टल के नियमों के खिलाफ काम करता है। मसलन होस्टल में आने जाने आजादी, कोई रात को होस्टल में आये जाये उसे ना रोका जाये। इस किस्म की अनेकों वाहियात आजादी इस ग्रुप की लडकियों को चाहिए। इस संगठन में कॉलेज की मौजूदा छात्राएं तो होती ही हैं, साथ ही उस कॉलेज से पढ़कर निकल चुकी पूर्व छात्राएं भी होती हैं।

2015 में गर्मी की छुट्टियों के बाद इस संगठन की नीव पड़ी थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी खुली तो जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्राओं को एक नोटिस जारी किया था। जिसके तहत लड़कियों को 8 बजे से बाद बाहर रहने की इजाजत नहीं थी। दिल्ली महिला आयोग ने इसका विरोध किया बस यहीं से पिंजरा तोड़ ग्रुप की शुरुआत हुई इसकी अधिकांश लड़कियां हिन्दू है। शायद इन्हें महिला अधिकार पितृसत्तात्मक सोच, फांसीवाद, नारीवादी नारे लगाकर महिला आजादी के नाम पिंजरा तोड़ संगठन से जोड़ा गया हो! जामिया से शुरुआत के बाद अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली, लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वीमेन, दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय से छात्राओं जोड़ा गया। अब यह गैंग राष्टीय बन गया और इस ग्रुप ने देश भर में, कई कॉलेजों, जैसे केरल एनआईटी कालीकट, आईआईटी-रुड़की, पंजाबी यूनिवर्सिटी तक अपने पैर पसार लिए।

यानि कई महिलावादी मुददे उठा उठाकर इसमें देश भर की छात्राओं को जोड़ा गया और पूरा तामझाम खड़ा किया गया। उन्हें बताया गया शादी बेकार चीज है, बच्चें पैदा करना बेकार काम है जिन्दगी का असली मजा मस्ती है। जबकि हॉस्टल के गेट किसी की आजादी को खत्म करने के लिए बंद नहीं किए जाते, बल्कि समाज की घटिया स्थिति को देखते हुए, उनकी सुरक्षा हेतु बचाव में उठाया गया एक कदम है, लड़कियाँ के माँ बाप हॉस्टल क्यों चुनते हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि बाहर किसी किराये वाले मकान में रहने से बेहतर कैम्पस के सुरक्षित माहौल में रहना है। लेकिन इन्हें वो गुलामी दिखी और शायद इसी कारण आन्दोलन खड़ा किया हो कि होस्टलो में वाई फाई देकर किसी के आने जाने की रोक हटाकर इन्हें अय्यासी के अड्डे बनाये जाये?

बताया जा रहा है कुछ महत्वकांक्षी लड़कियां और कुछ वामपंथनी मिलकर जब इनकी संख्या देश भर में बढ़ी तो अब इनका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। खोखली आजादी के नारे और नारीवाद की बूंद इन्हें सोशल मीडिया के ग्रुप से इस कदर पिलाई जाने लगी कि उसके नशे में ये वो सब करने लगी जो इनके आका फरमान देते। बाहर के सामाजिक व्यवस्था के आवरण होता तो कोई भी महिला तोड़ देती है लेकिन पिंजरा तोड़ने के अभियान में ये लड़कियां एक ऐसे पिंजरे में जा रही थी जिसे आज पुलिस तोड़ रही है।

हालाँकि बहुत पहले से ही डीयू कैम्पस में अलग वैचारिक ‘क्रांति’ की शुरुआत हो चुकी थी। हर एक बात को देश के युवाओं की आवाज’ बता कर नाचने वाले लम्पटों को एक नया उद्योग मिल गया था।  लड़कियां भी शामिल इसी तर्ज पर पिंजरा तोड़ की स्थापना की थी। लेकिन पिंजरा तोड़ ब्रिगेड को नहीं पता था कि कैसे इनका इस्तेमाल वामपंथी और देश विरोधी ताकतें कर रही है। पहले इनसे एलबीजीटी परेड में शाहीन बाग वाले देशद्रोह के आरोपी शरजील इमाम के समर्थन में उर्वशी चुडावाला सहित अनेकों हिन्दू लडकियों से नारे लगवाए और फिर इनके हाथों में पोस्टर थमा दिए जिनमें फ्री साईंफा उर रहमान, फ्री सफुरा जरगर, फ्री सरजील इमाम, फ्री मीरान हैदर न जाने कितने देश द्रोहियों के पक्ष में ये आधुनिक क्रन्तिकारी लड़कियां उठ खड़ी हुई।

भला कोई इनसे पूछे की महिला आजादी के नाम पर ये नारे लगा रही है कि चाँद बाग से राजघाट चलो ये दिल्ली होस्टल में पढने आई थी या राजनीती करने? और क्या राजनीती भी अपने ही देश के खिलाफ.? ‘पिंजरा तोड़’ में पिंजरा है ही नहीं, ये वामपंथियों की एक साजिश है कि वो किसी तरह देश के अन्य शिक्षण संस्थानों को जेएनयू, जाधवपुर, अलीगढ़ और जामिया जैसे वैसे संस्थान बना दें। जो अपनी शिक्षा के कारण नहीं, वामपंथियों की हिंसा, सेक्स, जिहाद, आतंकवाद,नक्सलवाद समेत हर वैसे मुद्दे पर चर्चा में आए जिसका छात्र जीवन से कोई वास्ता नहीं। शायद ये देश के हर कैम्पस को बर्बाद करना चाहते हैं, मुख्य काम देश के युवा शक्ति युवा महिलाओं को तबाह करना इनके एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो?

कुछ महिलावादी लेखिका जिनका पेट भरा हुआ है, जिन पर समाज और परिवार का कोई दबाव नहीं है वो इन्हें आजादी सिखाती है। इसके बाद उच्च वर्ग की अनेकों लड़कियां जिन्हें पढने नहीं बल्कि केम्पस में मजे लूटने आना है जिनके ऊपर पढाई का कोई दबाव नहीं होता, जैसा 18 20 साल की प्रथम वर्ष की किसी लड़की पर होता है। बाहरी राज्यों की माध्यम निम्न वर्ग की लड़कियां इनके आजादी और पोर्न के भाषण सुनती है और सोचती है दीदी सही कहती है कि जब लड़के बारह बजे तक घूमते हैं, तो हमारे हॉस्टल पर आठ बजे ताला क्यों?

इससे प्रभावित बाहरी राज्यों से आई लड़कियां इस वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा बन जाती है जो हर उस विषय पर भीड़ की शक्ल ले कर पहुँच जाता है, जो वामपंथियों के बड़े एजेंडे का हिस्सा होता है।  आप इनके ट्विटर अकाउंट देखिये फेसबुक देखिये इनका ब्रेनवास इस तरीके से किया गया है कि इनकी पोस्ट में अपने हिन्दू धर्म का विरोध होगा या इस राष्ट्र की अखंडता का विरोध होगा।

इनके हर पोस्ट से आपको या तो हिन्दू-घृणा नजर आएगी या फिर ये समाज को जातियों की तर्ज पर तोड़ने की बातें करती दिखेंगी, यानि इनका एजेंडा साफ है कि हॉस्टल के ताले तो बस एक छलावा हैं, इनकी श्यामल आत्मा उसी रक्तपिपासु वामपंथी एजेंडे पर चल रही है जो देश के हर राज्य को अलग करने का सपना देखता है, इसलिए, ‘पिंजरा तोड़’ नक्सलियों की सम्मोहित राष्ट्रदोही सेना से ज्यादा कुछ भी नहीं कहा का जा सकता बाकि पुलिस की जाँच के बाद अभी और चेहरे उजागर होने बाकि है।

लेख-राजीव चौधरी

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