पुण्यभूमि गुरुकुल कांगड़ी: एक मधुर स्मृति

May 28 • Gurukul • 493 Views • No Comments

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इसी वर्ष अक्तूबर में कार्यवश हरिद्वार जाना हुआ। मेरे एक मित्र भी साथ थे। संयोगवश विनय आर्य जी से फोन पर पता लगा कि वह गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में ही है। उनका निमन्त्रण पाकर बहुत ही अच्छा लगा। यूं तो अनेक बार हरिद्वार आना जाना होता है और गुरुकुल कांगड़ी को बाहर से देखकर ही सन्तोष करते रहे हैं

लेकिन पुनः उस पुण्यभूमि में जाने का विचार आते ही मन में एक तीव्र उत्सुकता जागृत हुई। सायंकाल होने पर अपने होटल को छोड़कर हम गुरुकुल के अति मनोहारी प्राकृतिक परिवेश में पहुंच गए। वहां की

ऐतिहासिक इमारतें, स्वर्णिम इतिहास एवं चप्पे चप्पे से अमर शहीद स्वामी श्रद्धानन्द  के जीवन्त व्यक्तित्व  का आभास मुझे लगभग 32 वर्ष पीछे खींचकर ले गया जब मैंने  इससे पूर्व यहां अपने जीवन के

15 अति उपयोगी दिन व्यतीत किए थे। अवसर था 1981 में सार्वदेशिक आर्य वीर दल के प्रथम शिक्षक शिविर का, जिसमें मैंने अपने छोटे भ्राता यशप्रिय आर्यजी सहित हिस्सा लिया था। यह शिविर तत्कालीन प्रधान संचालक श्री बालदिवाकर जी हंस एवं डा. देवव्रत आचार्य जी अब स्वामी देवव्रत सरस्वती जी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ था, जिसमें अनेक आर्यवीरों से मित्रता के सम्बन्ध स्थापित हुए। श्री विवेक भूषण जी अब स्वामी विवेकानन्दजी भी उस शिविर में शिविरार्थी थे। क्षत-विक्षत अवस्था में भी किसी संस्था का इतना भव्य रुप होता है तो अनुमान लगाया जा सकता है कि यह संस्था अपने सम्पूर्ण स्वरूप एवं यौवन काल में कितनी देदीप्यमान एवं विशाल रही होगी। सारे परिसर में ही अति प्राचीन एवं विशाल वृक्षों की पंक्तियां है जिनमें से अनेकों को तो अवश्य ही कुलपिता स्वामी श्रद्धानन्द का साहचर्य भी मिला होगा। सर्वप्रथम गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति डा. सुरेन्द्र कुमार जी से उनके बंगले पर भेंट हुई। उनका सरल व्यवहार व आतिथ्य-प्रेम पाकर मन गद्द हो उठा। अवश्य ही यह संस्था आपके निर्देशन में अपनी पूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त करेगी। कुलपति निवास एवं कुलपति कार्यालय के निकट ही सीनेट  हॉल वाले परिसर में अति सुन्दर फूलों के बगीचे के बीचों-बीच आधुनिक सुविधाओं से युक्त अतिथि कक्ष में ठहरने का सौभाग्य मिला। सौभाग्य से उस दिन वहां हल्द्वानी से पधारे । आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तराखड  के उपप्रप्रधान  डॉ . विनय वेदालंकार भी उपस्थित थे। सभी के साथ देर रात तक आर्यसमाज की विभिन्न परियोजनाओं एवं प्रकल्पों पर गम्भीर विचार-विमर्श हुए तो डॉ . विनय जी ने गुरुकुल कांगड़ी में बिताए अपने विद्यार्थीकाल के रोचक संस्मरण भी सुनाए। देर रात सोने के समय स्वामी श्रद्धानन्द का उदात्त  चरित्र आंखों के समक्ष घूम रहा था कि किस प्रकार महात्मा मुंशीराम ने इस विशाल संस्था का निर्माण किया होगा। सन 1900 में कांगड़ी गांव के शेर एवं चीतों से भरे  जंगल में कितनी तपस्या से उन्होंने ठाकुर अमन सिंह द्वारा प्रदत्त भूमि को वैदिक  शिक्षा का अनूठा केन्द्र बनाया होगा। उस महामानव को नम आंखों से याद करते करते न जाने कब नींद आ गई। सुबह जल्दी ही हम गुरुकुल के विशाल परिसर में प्रातः भ्रमण हेतु निकल पड़े। सर्वप्रथम ‘अमन सिंह द्वार’ से होकर 1920 में पुनस्र्थापित गुरुकुल के प्रथम भवन पहुंचे जहां लगभग 500 विद्यार्थियों ने यज्ञ सम्पन्न किया ही था। सुगन्ध अभी चारों तरफ विद्यमान थी। अनेक विद्यार्थियों से उनके अनुभव सुने। यह वही स्थान था जहां 32 वर्ष पूर्व शिविरार्थियों का भी निवास था। बाहर निकलते ही सामने विद्यालय भवन है जो बड़ा ही सुव्यस्थित है हालांकि ब्रह्मचारियों  की संख्या के अनुपात में कमरे कम ही है। आगे चलकर दाईं ओर भोजनशाला एवं बाई और भव्य यज्ञशाला है जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ बैठकर यज्ञ कर सकते है। सब  कुछ ऐसा लग रहा था मानों हम एक शिक्षण केन्द्र में नहीं अपितु एक

तीर्थ स्थान पर हैं। फिर हम  विश्व विद्यालय के अन्य संकायों जैसे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वेद शोध,

संस्कृत, बिजनेस स्कूल एवं पुरातत्व संग्रहालय पहुंचे। 9 बजे उसे देखने का संकल्प बनाया। पिछले द्वार

से बाहर निकलकर आयुर्वेद महाविद्यालय भी गए, जो एक समय गुरुकुल के ही पूर्ण स्वामित्व में था। वापसी

में कर्मचारियों के निवास की तरफ जाते समय बीच में बहुत पुराने गुम्बदनुमा भवन, पुरानी जलशाला है जो

काफी ऐतिहासिक है। सारे क्षेत्र में चम्पा, हार सिंगार रजनी गंधा , कनेर आदि के फूलों की खुशबू महक रही थी सूर्य देव भी उदय होकर  चहुंओर अपनी रश्मियां बिखराने को उद्यत थे। वहीं कुछ समय उद्यान में बैठकर शुह् वायु में प्राणायाम ध्यान  का आनन्द लिया।  तत्पश्चात्पु राने ऐतिहासिक द्वार से निकल सिंह द्वार पहुंचे जहां चैक पर स्वामी श्रह्ानन्द की आदम कद प्रतिमा स्थापित है, वहीं से गुरुकुल कांगड़ी फार्मेसी का मार्ग भी है। शीघ्र लौटकर यज्ञ में सम्मिलित हुए जिसमें गुरुकुल के मुख्याध्यापक जी, सहायक अधिष्ठाताजी, फार्मेसी प्रमुख— एवं कलकत्ता  से पधारे श्रीमती हर्षिता एवं रमेश दमानी जी भी उपस्थित थे। खीर के प्रातःराश के पश्चात् हम संग्रहालय आ गए। स्वामी श्रद्धानन्द  के महान व्यक्तित्व  एवं कृतत्व को अपने ह्रदय  में समेटे ब्राह्मण , पृथ्वी एवं भारत की प्राचीन संस्कृतियों के विभिन्न आयामों को दर्शाता, प्राचीन बर्तनों, मुद्राओं, आभूषणों, औजारों, हथियारों, भित्तिचित्रों , प्रस्तर-शिल्पों, पुस्तकों एवं स्वामी श्रद्धानन्द के वस्त्रों, खड़ाऊं, कमण्डल आदि को सुंदर ढंग से संग्रहीत किया गया है। महात्मा मुंशीराम के पूरे परिवार जिसमें पुत्र हरिश्चन्द्र, इन्द्र, पुत्रियों, नातियों से भरे पूरे परिवार का चित्र, जलियाँ वाले बाग नरसंहार के पश्चात् कांग्रेस अधिवेशन का चित्र,  जिसमें लाला लाजपतराय, मोतीलाल नेहरु, जवाहर लाल नेहरु, लोकमान्य तिलक, नौरोजी आदि बड़े बडे नेता विद्यमान हैं। स्वामी जी के बलिदान का चित्र और चांदनी चैक में लाखों लोगों द्वारा अन्तिम विदाई के चित्र, स्वामी जी के बलिदान पर उस समय के समाचार पत्रों से स्वामी जी को पं. नेहरु, सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जैसे नेताओं द्वारा  श्रद्धांजलियां  आदि दर्शनीय हैं, कभी कभी ऐसा लगता है कि स्वामी जी के विशाल व्यक्तित्व, महान त्याग, अद्वितीय कार्यों को हम लोगों तक कितना कम पहुंचा पाए हैं। तत्पश्चात् गुरुकुल से लगभग 5 किमी. दूर बहादराबाद स्थित गुरुकुल के ही इंजीनियरिंग कालेज में मेरा व्याख्यान था वहां भी गुरुकुलीय विचारों का पूरी तरह प्रभाव दिखाई पड़ा। वहां भी नित्य ही यज्ञ होता है। वहां से सीधे ही मैं गुरुकुल फार्मेसी पहुंचा। हालांकि वर्षों बंद रहने के बाद भी उत्पादन दोबारा शुरु ही हुआ है लेकिन वहां के विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर  को देखकर ऐसा लगा कि वहां उत्पादन की अपार सम्भावनायें है एवं फार्मेसी पुनः अपने खोए हुए स्थान को हासिल करने में सक्षम है- आवश्यकता है तो केवल थोड़े आधुनिकीकरण एवं सुप्रबंधन  की। माननीय व्यवसायाध्यक्ष एवं प्रोडक्शन मैनेजर ने बड़ी ही तन्मयता से सभी प्रक्रियाओं  को विस्तार से समझाया हमने भी अपनी समझ के अनुसार कुछ सुझाव दिए, जिन्हें उन्होंने खुले ह्रदय  से स्वीकार किया। वापिस गुरुकुल में जाने पर विद्यालय में  पुनः गए जहां माननीय कुलपति जी ने  विनय आर्य जी से विद्यालय में  महाशय धर्मपाल  जी एम.डी.एच. द्वारा बनवाए  तीर्थ स्थान पर हैं। फिर हम विश्व विद्यालय के अन्य संकायों जैसे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, वेद शोध, संस्कृत, बिजनेस स्कूल एवं पुरातत्व  संग्रहालय पहुंचे। 9 बजे उसे देखने का संकल्प बनाया। पिछले द्वार से बाहर निकलकर आयुर्वेद महाविद्यालय भी गए, जो एक समय गुरुकुल के ही पूर्ण स्वामित्व में था। वापसी में कर्मचारियों के निवास की तरफ जाते समय बीच में बहुत पुराने गुम्बदनुमा भवन, पुरानी जलशाला है जो काफी ऐतिहासिक है। सारे क्षेत्र में चम्पा, हार सिंगार रजनी गंधा, कनेर आदि के फूलों की खुशबू महक रही थी सूर्य देव भी उदय होकर चहुंओर अपनी रश्मियां बिखराने को उद्यत थे। वहीं कुछ समय उद्यान में बैठकर शुद्ध  वायु में प्राणायाम ध्यान का आनन्द लिया। तत्पश्चात पुराने  ऐतिहासिक द्वार से निकल सिंह द्वार पहुंचे जहां  चैक पर स्वामी श्रद्धानन्द  की आदम कद प्रतिमा स्थापित है, वहीं से गुरुकुल कांगड़ी फार्मेसी का मार्ग भी  है। शीघ्र लौटकर यज्ञ में सम्मिलित हुए जिसमें गुरुकुल के मुख्याध्यापक  जा रहे 8 कमरों के एक खण्ड से सम्बन्धित चर्चाएं की। इस प्रकार गुरुकुल के अन्दर ही चल रहे अनेक बड़े प्रकल्पों की जानकारी मिली। विनय आर्य जी की दूरदर्शिता एवं कर्मठता की न केवल हम प्रशंसा ही करे  अपितु इन कार्यों में अपना योग्य सहयोग देना भी हम सबका कर्त्तव्य  है। गुरुकुल के भोजनालय में सात्विक भोजन करके हम आगे की यात्रा के लिए रुद्रपुर निकल पड़े। सौभाग्य से

डॉ. विनय वेदालंकार जी भी हमारे साथ चले, मार्ग में पूरे रास्ते सिद्धांत चर्चा एवं भविष्य की योजनाओं पर चर्चाएं होती रही। मार्ग में कन्या गुरुकुल नजीबाबाद में आचार्या डॉ प्रियवंदा  वेदभारती के भी दर्शन हुए एवं हालैंड से पधारे हुए एक परिवार से भी रोचक चर्चाएं हुई। बातों ही बातों में हम कब रुद्रपुर पहुंच गए पता ही न चला। सज्जनों इस सारे संस्मरण को लिखने के मेरे दो उद्देश्य रहे- पहला अपनी यादों को चिरस्थाई बनाने हेतु उन्हें लिखने में पुनः आनन्द की अनुभूति करना, दूसरा-

उस आनन्द व सकारात्मता को आप सभी तक भी पहुंचाना। साथ ही अगर मेरा यह लेख हरिद्वार पर्यटन के समय स्वामी श्रद्धानन्द की पुण्यभूमि में पधारने हेतु आपको जरा भी प्रेरित  कर सका तो मैं अपने प्रयास को सफल समझूंगा मैं तो केवल आपको विश्वास दिला सकता हूँ  कि मेरे मित्र ने भी कहा कि ‘‘यहां के वातावरण में एक जादुई आध्यात्मिक शक्ति एवं ऊर्जा है।’’ तो आइये हरिद्वार आगमन पर रखें

एक दिन ‘पुण्यभूमि के नाम’।

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