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बर्मा के बाद श्रीलंका, क्यों है दुनिया से मुस्लिम टकराव?

Mar 13 • Samaj and the Society • 159 Views • No Comments

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बर्मा में बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच हुई हिंसा की चिंगारी अब श्रीलंका तक जा पहुंची निकट भविष्य में स्थिति क्या होगी अभी सहज परिकल्पना ही की जा सकती है। खबर है श्रीलंका में पिछले हफ्ते मुस्लिम भीड़ के हमले में एक सिंहली बौ( व्यक्ति की मौत की खबरों के बाद चार मार्च को कैंडी जिले में हिंसा भड़क उठी थी। इस घटना के बाद सिंहली बौद्ध समुदाय के लोगों ने मुसलमानों के घरों और दुकानों पर हमले किए। जिसके बाद वहां आपातकाल लागू किया गया था। कहा जाता है मध्यकाल के अंधकारपूर्ण दौर में दो धर्मों के बीच लंबी लड़ाई चली थी। आज एक बार फिर से दुनिया उसी ओर जाती दिख रही है लेकिन अब अलग-अलग धर्म आमने-सामने हैं। इस्लाम का एक उग्र चेहरा दुनिया के सामने देखने को मिल रहा है। आज की समस्या यह है कि क्रूसेड काल के विपरीत आज अब यह टकराव सिर्फ ईसाईयत और इस्लाम का नहीं रह गया है। जो सोच और धारणाएं बन रही हैं, उनमें इस्लाम आज बाकी दुनिया के दूसरे धर्मों और पंथों के साथ टकराव की हालत में दिखता है। यही नहीं विरोधी इस तर्क पर भी आते हैं कि खुद इस्लाम का अपने ही भीतर दूसरे विचारों से टकराव चल रहा है। इस्लामी आतंकवाद और इस्लाम के भीतर अतिवाद जैसी सोच पिछले कुछ दशकों में पूरी दुनिया में धड़ल्ले से चल निकली हैं। चाहे इसमें पेरिस के नीस में हमला हो, भारत में ताज होटल हो। म्यांमार, लंका, बाली, इंडोनेशिया में यही स्थिति है, यूरोप, रूस  और अमेरिका भी इसकी चपेट में हैं।

आज विश्व में जहाँ भी टकराव है, हिंसा है उसके पीछे एक चेहरा कहीं न कहीं इस्लाम का जरूर दिखाई देता है। यदि इसमें मध्यकाल की इस्लाम के नाम पर हुई हिंसा को अलग रखकर भी बात करें तो जब हिंसा या आतंकवाद की जड़ें बीसवीं सदी के मुस्लिम विचारकों तक पहुंचती हैं, जिन्होंने यह विचार दिया था कि इस्लाम एक पूर्ण व्यवस्था है और राजनीतिक शक्ति इसका एक जरूरी हिस्सा है, क्योंकि इसके बगैर इस्लाम को एक संपूर्ण जीवन पद्धति  के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। जब उन्होंने देखा कि राजनीतिक पद तो पहले से किसी और समूह के कब्जे में है। ऐसे में उन्हें लगा कि इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए मौजूदा शासकों को पद से हटाना अनिवार्य है। जिसके लिए संख्या बल भी बढ़ाना जरूरी है। जो लोग राजनीतिक इस्लाम में विश्वास करते थे, उन्होंने पुराने शासकों को रास्ते से हटाने के लिए हिंसा और आतंक का सहारा लिया, जो अभी तक जारी है।

दरअसल यह टकराव आज लुकाछिपी का नहीं रहा, एशिया से लेकर यूरोप और अमेरिका भर में, धार्मिक अतिवाद बढ़ रहा है। कुछ समय पहले बीबीसी से जुड़ी धार्मिक संबंधों की पत्रकार केरोलिन व्हाइट का इस संबंध में एक विस्तृत आलेख प्रकाशित हुआ था। वह कहती है, एक बात सर्वविदित है कि सभी पंथों की जननी एशिया महाद्वीप की भूमि है, लेकिन विज्ञान और आधुनिकता का अधिकतम रिश्ता यूरोप से जुड़ा हुआ रहा है। यहीं से संघर्ष प्रारम्भ होता है। आधुनिकता की व्याख्या से इस प्रकार के टकराव केवल इस्लाम का अन्य पंथों से ही नहीं, बल्कि उनके अपने पंथ और सम्प्रदाय भी आपस में झगड़ते हैं और समय आने पर युद्ध के मैदान में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते। इसलिए शिया सुन्नी टकराव तो इस्लाम के बहुत प्रारम्भ में ही शुरू हो गया था। यह टकराव खिलाफत को लेकर हुआ था। वहां से सुन्नी और शिया के रूप में मुसलमानों का बंटवारा होता चला गया। जब सत्ता मिलने लगी तो भी उनका यह बुखार नहीं उतरा बल्कि दिनों दिन बढ़ता चला गया। आज भी विश्व राजनीति में शियाओं का नेता ईरान है और सुन्नियों का सऊदी अरब। मामला शिया सुन्नी तक के विभाजन का होता तो यह मान लिया जाता कि अन्य पंथों की तरह यहां भी वैचारिक और व्यक्ति के आधार पर दो फाड़ हो गए। लेकिन इस्लाम तो इतने फिरके और पंथ में बंटा है कि सारी हदों को पार कर गया है। हर फिरके की अपनी सोच है जो कहीं न कहीं राजनीति से जुड़ी हुई है। अपने पंथ की हुकूमत कायम हो जाए बस यही उलझन बनी रहती है।

केरोलिन व्हाइट लिखती है कि दुनिया का शायद ही कोई धर्म हो जिसका दो फाड़ हुआ हो लेकिन इस्लाम के पंथ तो इतनी बड़ी तादाद में हैं कि अब उनकी गिनती भी कठिन है। न जाने कौन सा मौलवी उठे और अपनी सनक के अनुसार फिर एक नया फिर्का बना ले। इसके पीछे मजहबी भावना कम और सत्ता हड़पने की भावना अधिक होती है। भले ही वह किसी देश या जमीन के भाग पर अपनी सल्तनत स्थापित न कर सके लेकिन व्यक्तियों के समूह पर तो अपने विचार लादकर अपने मन को शांत कर ही सकता है! इसलिए मामला राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय अथवा स्वयं इस्लाम के पंथ और सम्प्रदाय के बीच वह दो भागों में विचारधारा के नाम पर बहुत जल्द बंट जाता है। अधिक तादाद होने पर वह किसी देश की मांग करने लगता है। इसलिए धरती का बंटवारा जो राष्ट्रों के बीच में हुआ है, उन्हें तो येन-केन प्रकारेण अपने देश चाहिए जहां वे अपने नियमों और सिद्धांतों के आधार पर भौतिक सुखों का आनंद ले सकें।

केरोलिन यही नहीं रुकती वह आगे कहती हैं कि कहने को कहा जाता है कि दुनिया में 56 मुसलमान राष्ट्र हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि एक देश में जितनी विचारधारा के मुसलमान हैं वे अपनी सत्ता स्थापित करने की जुगाड़ लगाते रहते हैं। इसलिए इन देशों में मुसलमानों के अनेक गुट सत्ता हथियाने के लिए लड़ने और युद्ध करने के लिए, हमेशा तैयार रहते हैं। जिन देशों में उनकी संख्या कम होती है वे पहले तब्लीग और कन्वर्जन के नाम पर अपना संख्याबल बढ़ाते हैं। इस संख्या को बढ़ाने के लिए कन्वर्जन से लगाकर अधिक बच्चे पैदा करने की मुहिम चलाकर वे अपना संख्याबल बढ़ाते हैं और फिर कुछ ही वर्षों में एक नए देश की मांग करने लगते हैं। एशिया को विजय कर लेने के बाद वे अफ्रीका की ओर बढ़े। अवसर मिला और यूरोप में भी घुसे। आज इस्लाम परस्तों की यह लालसा है कि वे नम्बर एक पर पहुँच जाएं। वे किसी न किसी बहाने युद्ध को निमंत्रण देते रहते हैं। यह मुस्लिम कट्टरवादियों की बुनियादी रणनीति है जिस पर चलकर मुस्लिम जनता को युद्ध के लिए तैयार किया जा सकता है। अतः हो सकता आज लंका और बर्मा के बौद्ध इस रणनीति का प्रतिरोध कर अपनी प्रतिक्रिया उसी भाव से प्रकट कर रहे हो? जो भी हो फिलहाल शांति हो सकती है लेकिन वह कितने दिन स्थिर रहेगी इस पर प्रश्न चिन्ह लगा रहेगा..?

- राजीव चौधरी

 

 

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