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बीसवीं शताब्दी का प्रथम शहीद ‘खुदीराम बोस’

Nov 21 • Arya Samaj • 144 Views • No Comments

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‘‘एक बार विदाय दे मां धुरे आसि-हांसि-हांसि पोरबो फांसी देखिबे भारतवासी।’’

भारतवासी खुदीराम बोस के बलिदान पर गाये जानो वाले इस गीत की पंक्तियां आज भी बंगाल के घर-घर में माताएं गाती हैं। गुनगुनाती हैं। बंगाल के बीहड़, तराई वाले इलाकों में प्रवेश करने पर आज भी सुना जाता है किसानों के कंठों से यह अमर गीत बलिदान के 110 वर्षों के बाद भी खुदीराम जीव के कदम-कदम पर प्रेम ऋद्धा और बलिदान के फूल खिला रहे है। और खिलाते रहेंगे।

11 अगस्त 1908 को प्रातः छः बजे मुजफ्फर जेल में फांसी के तख्ते परर खुदी राम आ चढ़े। फांसी के समय उपस्थित एक संवाददाता उपेन्द्र नाथ सेन उस क्षण का वर्णन करते हुए लिखते हैं ‘‘खुदीराम तेजी से चलकर मानों सिपाहियों को खीचे आ रहे हों, हम लोगों को देखकर वे मुस्कुराये, फिर एकबार और हम लोगों को देखा। इसके बाद दृढ कदमों से बढ़ते हुए फांसी के तख्ते की ओर बढ़ गये।’’

20वीं सदी में सर्वप्रथम खुदीराम बोस ने ही हंसते हुए फांसी के तख्ते पर प्राण न्योछावर सम्पूर्ण राष्ट्र को मृत्यु से मुक्त होने का संकेत दिया था। खुदीराम खुदी का बुलंद, संकल्प का दृढ, बुद्धि से विवेकपूर्ण, उम्र से आवेशपूर्ण, भक्ति से मातृभूमि को समर्पित, इरा का सच्चा और धुन का पक्का, अग्नि की चिन्गारी के रूप में विद्रोही बनकर भारत मां की भूमि में जन्म लिया और उसी क्रांति की अग्नि ज्वाला में जल गया। फांसी पर झूल गया। खुद को खुदा के हवाले कर दिया। गीता ही जिसका मार्ग दर्शिका थी, आजादी ही जिसकी अराध्या थी, जो न गोली से डरता था, न बम के बिना चलता था, जो मातृभूमि की आजादी का सपना लिये कदम-कदम, तेज कदम बढ़ाता जा रहा था। गुलाम बनाने वालों को गुलाम बनाने का सपना लिए, सर काटने वालों का सर काटने का सपना लिए उसी जलते हुए शोले को हम खुदीराम के नाम से जानते हैं।

आग का गोला था खुदीराम, धधकता हुआ शोला था खुदीराम एक उबलता हुआ ज्वालामुखी, एक उफनता हुआ जोश का दरिया, एक उबलता हुआ क्रांति का तूफान और मातृभूमि की शान के लिए मर मिटने वाला कोई आल्हा, होई ऊदल, कोई शिवा कोई राणा कोई तात्या, कोई कुंवर सिंह था, खुदीराम। जिसके पीछे कोई कातिल नहीं चलता था जो स्वयं कातिल का पीछा करता था और उस कातिल का नाम था किंग्सफोर्ड। जो किग्सफोर्ड कलकत्ते का चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट था और जिसने 260 देश प्रेमियों को देश द्रोही करार देकर फांसी की सजा दी थी। 1908 में किंग्सफोर्ड ने बिहार की धरती पर कदम रखा तथा मुजफ्फरपुर के जिला एंव सत्र न्यायाधीश की कुर्सी पर आसीन हुआ।

किंग्सफोर्ड ने राष्ट्रभक्तों के दमन के साथ-साथ राष्ट्रीयता जगाने वाले अखबारों के दमन में भी प्रभूत बदनामी अर्जित की थी। युगान्तर के सम्पादक के रूप में स्वामी विवेकानन्द के अनुज भूपेन्द्र नाथ दत्त को डेढ़ वर्ष की सजा दी थी। ‘वन्देमातरम्’ के सम्पादक के रूप में विपिन चन्द्र पाल को छः मास की सश्रम कारावास की सजा दी थी किंग्सफोर्ड ने। हालांकि बन्देमातरम् के सम्पादक थे अरविन्द घोष लेकिन यह साबित नहीं हो सका था। ‘संध्या’ के सम्पादक ‘ब्रह्मवान्धव’ को जेल में इतनी यातना दी गई कि वे जेल में ही मर गये। किंग्सफोर्ड ने एक 16 वर्षीय छात्र सुशील कुमार को आन्दोलन मे ंभाग लेने का दोषी करार देकर 15 बेतों की सजा दी थी। किंग्सफोर्ड ने अपने सामने ही जल्लाद के द्वारा कपड़े उतरवाकर टिकठी से बंधवाकर 15 बेंट लगवाये थे। जल्लद ने उछल-उछल कर इतने जोरों से महार किया था कि उस छात्र के पीठ तथा नितम्बों की खाल उधड़कर मांस निकल आया था और वह अचेत हो गया था।

किंग्सफोर्ड के अन्याय की पराकाष्ठा को देखते हुए क्रांतिकारियों के सिरमौर अरविन्दघोष और चारूदत्त ने निर्देश दिये कि किंग्सफोर्ड को खत्म कर देना चाहिए। क्रांतिकारियों के भय से अग्रेज पदाधिकारियों ने किंग्सफोर्ड का तबादला मुजफ्फरपुर शेसनजज के रूप में कर दिया। किंग्सफोर्ड को समाप्त करने के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्लचन्द्र चाकी को चुना गया। दोनों को एक-एक डायनामाइट बम जिसमें लकडत्री का हत्था था तथा जो टिन के डिब्बे में बन्द था और वो रिवॉल्वर सौपे गये। ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।

मार्च 1908 के अंत में खुदीराम बोस अपने क्रांतिकारी साथी प्रफुल्ल चन्द्र चाकी के साथ मुजफ्फरपुर आये ओर एक धर्मशाला में छद्म नाम से ठहर गये। फिर दोनों ने वह स्थान देखी जहां किंग्सफोर्ड रहता था। दोनों ने दिन-दिन भर घूमकर नगर के रास्तों की पहचान कर ली। किंग्सफोर्ड पर उन दोनों की निगाहें रहती थीं। किंग्सफोर्ड की कोठी के निकट गोरों का एक क्लब चलता था। किंग्सफोर्ड भी प्रतिदिन सांयकाल वहां पहुंचता था और देर रात में वापस लौटता था। किंग्सफोर्ड घोड़े वाली फिटन से क्लब जाया करता था। ठीक उसी रंग की फिटन शहर में एक अमरीकी वकील पी. कैनेडी के पास भी थी। वे भी प्रतिदिन अपने फिटन से क्लब आते थे।

30 अप्रैल सन् 1908 अमावस्या की रात। गहरा अंधेरा सब ओर घनीभूत था। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चन्द्र चाकी बम रिवाल्वरों से लैस वहीं किंग्सफोर्ड के बंगले के निकट इंतजार में खड़े थे एक पेड़ के ओट में। तभी 8 बजे एक फिटन क्लब की ओर लौटी। खुदीराम ने उसे किंग्सफोर्ड का फिटन मानकर उसपर बम फेंक दिया। भयंकर विस्फोट गूंजा, फिटन का एक भाग ध्वस्त हो गया। दो अमेरिकी महिलाएं घायल होकर गिर गई। वे पी. कैनेडी की पत्नी और बेटी थीं। कोचवान जख्मी होकर बच गया लेकिन दोनों महिलायें मर गयी। दोनों पेड़ की ओट में आगे बढ़े। वहां तैनात दो सिपाही तहसीलदार खां और फैजुद्दीन ने उन्हें देख लिया था परन्तु भयवश पीछा नहीं किया और दोनों निकल भागे। सिपाहियों ने थाने में रिपोर्ट दी। हर जगह नाकेबंदी कर दी गई। क्रांतिकारियों की खोज होने लगी। चारों ओर सनसनी फैल गई। दोनों वर रेलपटरी के किनारे-किनारे भागे और रात भर भागते-भागते 25 मील चलकर ‘बैनी गांव’ आये। प्रफुल्ल एक आम के बाग में बैठ गया। भोर हो चुका था और दोनों के हुलिए ीी हर जगह जा चुके थे। उसी मोदी की दुकान पर दो सिपाही खड़े थे शिव प्रसाद और फतेहसिंह। दोनों को खुदीराम पर शक हो गया और दोनों मिलकर खुदीराम को दबोच लिया। गोली चलाने का मौका भी न पा सका यह तरुणवीर पुलिस इसे रेल में बिठाकर मुजफ्फरपुर रवाना हो गये। खुदीराम को पकड़ाया हुआ देख प्रफुल्ल वहां से समस्तीपुर की ओर भागा। 32 मील चलकर समस्तीपुर पहुंचा। कॉलोनी के एक देशभक्त व्यक्ति ने प्रफुल्ल को रोककर भोजन कराया विश्राम के लिए स्थान दिया और नये कपडत्रे और जूते खरीदकर दिये। कलकत्ता तक का टिकट कटाकर उसे इंटरक्लास में बिठा दियां उसी कोठरी में एक नंदलाल बनर्जी नामक दरोगा भी सफर कर रहा था। उसकी नजर में चाकी चढ गया। उसे मुजफ्फरपुर बम काण्ड की खबर थी तथा क्रांतिकारियों के हुलिये का भी पता था। बनर्जी दरोगा ने स्टेशन मास्टर को तार द्वारा सूचना मौकाया भेज दिया। मौकाया स्टेशन पर गाड़ी रुकत ही आर्म स्ट्रांग दरोगा ने चाकी को घेर लिया। अन्य सिपाहियों के साथ दरोगा चाकी को पकड़ने बढ़ा ही था कि चाकी ने दरोगा पर गोली चला दी। दरोगा सिर झुकाकर निशाना बचा गया। चाकी ने देखा अब पकड़ा जाना निश्चित है तो उसने बिना एक क्षण की देर किये एक गोली अपने माथे पर दागी। खून से लथपथ हो प्लेटफार्म पर गिर गया और तत्कार शहीद हो गया। चाकी का सिर काटकर मुजफ्फरपुर लाया गया, खुदीराम बोस को दिखाकर पहचान कराने के लिए।

मुजफ्फरपुर पहुंचकर खुदीराम उदास नहीं हुआ। लोगों ने उसे हमेशा प्रसन्नचित पाया। भारी भीड़ उमड़ पडत्री खुदीराम के दर्शन हेतु। आधी धोती घुटनो पर चढ़ी, आधी कंधे पर, उलझे से घुंघराले बाल साधारण सा कुरता, चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं। खुदीराम पर मुकदमा चला लेकिन खुदीराम ने मुकदमें में कोई रुचि न ली। न बचाव की ही कोशिश की। दस दिनों तक मुकदमा चला। जिला जज कर्नडफ की अदालत से खुदीराम को फांसी की सजा दी गई। फांसी की सजा सुनकर खुदीराम मुस्कुरा उठा। जज ने पूछा-‘‘ क्या तुम्हें फांसी की सजा सुनकर कोई गम नहीं।’’ खुदीराम ने मुस्कुराते हुए जज को जबाव दियाः- ‘‘मुझे दो बातों का दुःख है, जज साहब एक जो यह कि मिस्टर किंग्सफोर्ड बच गया और व्यर्थ ही दो महिलायें मरीं। दूसरी बात यह है कि जब मेरी अपरूपा दीदी को पता चलेगा कि खुदीराम अब इस संसार में नहीं है तो उन्हें बड़ा दुःख होगा क्योंकि मैं ही अकेला उनका एक भाई था।’’

अंग्रेज जज यह सुनकर दांतों तले कलम दबाकर रह गया और अबाक् निहारता रहा उस मुस्कुराते हुए बालक को कि किस धातु का बना है यह लड़का?

11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में खुदीराम बोस हाथ में गीता लिये हंसता हुआ फांसी पर चढ़ गया। उसके अंतिम बोले थे ‘वंदे मातरम्’। कालिदास बोस(वकील) ने उसका अंतिम संस्कार किया श्मशान में। उस समय ऐसी भीड़ थी कि उस शहीद की चिता-भस्म की एक चुटकी राख के लिये छीना-झपटी मच गई।

‘‘खुदी ने खुद को खुदा को क्यों सौंपा?’’

यह ज्वलन्त प्रश्न समस्त मानव समुदाय को उद्वेजक बनाने के लिए पर्याप्त है। जिस बालक ने अभी जीवन के मार्ग पर कदम भी न रखा था। जिसे अभी मूंछ की रेखा तक न आई थी। उस 18 वर्षीय तरुण को बम फेंकने तथा फांसी पर झूलने की क्या जरूरत थी?

ढूढ़िये इस ज्वलन्त प्रश्न का उत्तर! शायद आपको राष्ट्रहित में बलिदानी परम्परा की एक चमक दिखाई पड़ेगी। उस मासूम खुदीराम के हृदय की भावनाओं को चिन्तन की लहरों में प्रवाहित कर जरा विचार करिये, भावुक हृदय में तूफान खड़ा कर देगा खुदीराम की प्रचण्ड देशभक्ति का भाव। खुदीराम खुद को मिठाया, खुद को लुटाया, खुद को जलाया, खुद को खुदा को सौंप अमरत्व को प्राप्त कर राष्ट्र को एक संदेश दे गया कि अन्याय और अधर्म की पंक में डूबा हुआ जालिम प्रशासक को समाप्त कर देने में ही राष्ट्र का उद्धार होगा। भारत माता चैन की सांस ले सकेगी।

मेरे देश के नैनिहालों! तरुणों! वीरो! राष्ट्र भक्तों! आज तुम्हें अपेन अन्दर खुदीराम को जन्म देना होगा। खुदीरम बनकर हाथ में तीव्रतम धमाका वाला बम लेकर किंग्सफोर्ड जैसे जालिम और अत्याचारी, अन्यायकारी अधिकारियों के चीथड़े उड़ाकर भारत माता की तड़पती आत्मा को शान्ति प्रदान कराना होगा। यदि आज भारत का एक-एक तरुण खुदीराम जैसे, देश में वर्तमान किंग्सफोर्ड पर धावा बोल दे तो मां भारती कितना खुश होगी? लेकिन हां, जोश में आकर होश न खोना कि किंग्सफोर्ड की जगह मिस कैनेडी और कुमारी कैनेडी के चिथड़े उड़ जायं। आज भारत के प्रत्येक तरुण को खुदीराम बनना होगा, प्रफुल्ल चन्द्र बनना होगा, तभी राष्ट्र का कल्याण संभव है। भारत के प्रत्येक घरों में पुनः यह गीत गुंजायमान करना होगा-

‘‘एक बार विदाय दे मां धुरे आसि-हांसि-हांसी पोरबो फांसी देखिवे भारतबासी’’

-मा. शंकर शास्त्री

-प्राचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती बाल मंदिर तेघड़ा, बेगूसराय, बिहार-

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