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बुर्के हिजाब के मुक्ति क्यों चाहती है ये मुस्लिम महिलाएं

Feb 8 • Samaj and the Society • 119 Views • No Comments

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पिछले दिनों विश्व भर में सोशल मीडिया के माध्यम से एक केम्पेन चलाई गयी थी जिसका नाम था मी टू यानि (में भी) इसमें दुनिया के अनेकों क्षेत्रों से जुडी महिलाओं ने अपने ऊपर हुए यौन शोषण के अनुभव साझा किये थे. इसमें सेक्शुअल हैरसमेंट के आरोप लगाए तो भारत में बड़े पैमाने पर #MeToo मूवमेंट शुरू हो गया है. तमाम महिला कलाकारों, पत्रकारों ने अपने साथ हुए सेक्शुअल हैरसमेंट की कहानी सोशल मीडिया पर शेयर की है. इस कड़ी में कई दिग्गज नामों पर आरोप लगे मशहूर कलाकार आलोक नाथ, मंत्री एमजे अकबर जैसे नाम भी सामने आए. यहाँ तक हुआ कि इन आरोपों के कारण कई हस्तियों को अपने पद से इस्तीफे तक देने पड़े.

भारत समेत शेष विश्व भर की मीडिया में महिलाओं के अधिकारों, उनकी स्वतन्त्रता उनके आत्मसम्मान को लेकर खूब चर्चा हुई और ये मुद्दा विश्व भर छाया रहा. इस मामले में मीडिया ने टीरपी की बहती गंगा में जी भरकर स्नान किया परन्तु जब एक फरवरी को महिलाओं के स्वाभिमान, उनकी स्वतन्त्रता उनके सामाजिक अधिकारों का दूसरा मुद्दा सामने आया तो मीडिया ने न जाने कौनसी नदी में डुबकी लगाई जो अभी तक दिखाई नहीं दी या तो डूब गयी या फिर दूसरे मामले में सिर निकाल लिया.

असल में कहानी यह है कि जिस तरह विश्व भर में मदर्स डे, फादर्स डे मनाया जाता है इसी तरह एक फरवरी को मुस्लिम देशों में एक हिजाब डे भी मनाया जाता हैं. यानि युवा मुस्लिम युवतियों को हिजाब पहनने को प्रेरित किया जाता हैं. परन्तु इसके उलट विश्व में अनेकों मुस्लिम महिलाएं इस कुप्रथा के विरोध में नो हिजाब डे भी मनाती है. उनका कहना कि ये हमारा अधिकार नहीं बल्कि एक कैदखाना हैं.

यासमीन मोहम्मद नाम की एक कनाडाई मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं धार्मिक कट्टरवाद के खिलाफ संघर्ष करती हैं. यासमीन ने मुस्लिम महिलाओं हिजाब से मुक्ति के लिए केम्पेन चलाती हैं. यासमीन का कहना है कि नो हिजाब डे दुनिया भर की बहादुर महिलाओं का समर्थन करने का दिन होता हैं, उन्हें क्या पहनना है या क्या नहीं पहनना है, महिलाएं खुद तय करना चाहती हैं.

यह दिन उन अत्याचारों को संबोधित करने और दुनिया को इस तथ्य पर ध्यान देने के लिए अपनी बात कहने के लिए है कि धरती पर करोड़ों महिलाएं मानव के रूप में अपने मूल अधिकारों के बिना कैसे जिन्दा रह रही है यह बताने का दिन हैं. किन्तु अफ़सोस कि इस मुद्दे पर न वामपंथी दिखाई दिए न तथाकथित नारीवादी भेडिये जो मी टू केम्पेन को उधेड़कर खा गये थे और तो और वो बड़ी सी बिंदी वाला महिला अधिकारों का गेंग भी नदारद पाया जो महिलाओं के अधिकारों के नाम पर पापड़ खा रहा हैं.

परन्तु ऐसा नहीं है इस मुद्दे पर हर कोई खामोश रहा, नहीं विश्व भर में मुस्लिम महिलाओं के हक़ और उनके मुद्दे मुखर होकर तारेक फतेह जैसे अनेकों लोग सामने आये और हिजाब को 21 वीं सदी का एक मजहबी सामाजिक कैदखाना बताया. यासमीन को इस समर्थन से ताकत मिली और उसने इस कुप्रथा पर जमकर हमला बोलते हुए कहा कि मेरी माँ ने हिजाब में जीवन बिता दिया जब में नौ साल का थी, मेरी माँ ने मेरे सिर पर पहला हिजाब लगाया था उस दिन मुझे कैद करने का पहला दिन था जो मुझे अहसास करा रहा था कि अब मेरा जीवन भी इसी जेल के अन्दर पूरा होगा.

यदि में विरोध करुँगी तो मुझे अपशब्द कहेंगे, गाली देंगे और मार भी देंगे पर मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा था जैसे मौलिक स्वतन्त्रता को चारों तरफ से गन्दी मक्खियों ने घेर लिया हो मैं बेबस थी इसे तोडना चाहती थी और अंत में मेरी अंतरात्मा ने मुझे झकझोर दिया और मैंने ये पिंजरा तोड़ दिया.

ऐसा नहीं था कि यह कोई खाली खतरा नहीं था बल्कि कनाडा में, 16 वर्षीय अक्सा परवेज को उसके पिता और भाई ने मार डाला क्योंकि उसने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया था. दुर्भाग्य से, इस्लामी समुदायों में ऑनर किलिंग का प्रचलन है ज्यादातर महिलाएं ऐसी स्थिति में होती हैं, जहां वे बात नहीं कर सकती हैं या उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने पड़ते   हैं इस कारण यह महत्वपूर्ण है कि हम एकजुटता में अपनी आवाज उठाएं. सच्चे नारीवादियों को इस बात से नाराज होना चाहिए कि हमारी बहनें इस तरह से जी रही हैं.

उन्हें समझना चाहिए कि हिजाब केवल एक कपडे का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह अमानवीयकरण, वशीकरण और इन महिलाओं पर जबरदस्ती थोपे जाने वाली एक कुप्रथा है हम सभी मुस्लिम महिलाएं चाहती हैं कि हम शालीन है किन्तु हिजाब के नाम की यह गुलाम की जंजीरों को तोडना चाहती हैं हम भी इंसान बनना चाहती हैं हम भी इंसानों की तरह रहना और जीना चाहती हैं…राजीव चौधरी

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