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बेआवाजों की आवाज कौन सुने ?

Jul 20 • Samaj and the Society • 127 Views • No Comments

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शायद ही कभी किसी ने सुना हो कि दिल्ली, मुंबई अहमदाबाद या उड़ी समेत कई बार देश की आत्मा को चीर देने वाले आतंकी हमलों में शामिल किसी आतंकी के खिलाफ कोई फतवा किसी मुफ्ती ने जारी किया हो? पिछले महीने ही मंदसौर में एक मासूम बच्ची के साथ रेप हुआ लेकिन इस घृणित कार्य के बाद भी अपराधी इमरान के खिलाफ किसी मुफ्ती ने फतवा जारी करने की जेहमत नहीं उठाई। हालाँकि किसी भी अपराध के लिए देश में न्यायालय है, संविधान है, सजा का प्रावधान है किन्तु अन्य मामलों में दखल की तरह आप धार्मिक तौर पर ऐसे अपराधियों के खिलाफ प्रतिक्रिया व्यक्त कर ही सकते हैं।

किन्तु ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता, उल्टा भारतीय संविधान से अपने लिए न्याय मांगने गयी केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की बहन फरहत नकवी और दूसरी आला हजरत खानदान की बहू निदा खान को शहर इमाम मुफ्ती खुर्शीद आलम ने उन्हें मजहब ;इस्लामद्ध से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। निदा और फरहत दोनों ही तलाक पीड़ित हैं और दोनों ही अलग अलग संस्था चलाती हैं। जिसमें वे मुस्लिम महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ती हैं। इस वजह से मजहब के ठेकेदार अब इन दोनों महिलाओं की आवाज दबाने की कोशिश कर रहे हैं यानि इस्लामिक कानून के माध्यम से बेआवाजों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।

जैसे मध्यकाल में जिसका मुंह उठता था वही मजहब की, अपनी जाति की, कबीले आदि की ठेकेदारी लेकर अपने विरोधियों पर हमला करने चल देता था। इसी तरह पिछले चंद सालों से भारत में मुफ्ती, काजी और इमामों का हाल हो गया है। जिसका मूड होता है, वही दस बीस फतवे किसी भी महिला के खिलाफ जारी कर बैठता है, कभी मजहब का नाम लेकर, कभी खुदा का वास्ता देकर, इनका सबसे आसान शिकार महिलाएं ही बनती दिख रही हैं।

किन्तु तलाक पीड़ित निदा कह रही है कि वह ऐसे जाहिलों से वो डरने वाली नहीं है। मैं एक लोकतांत्रिक देश की नागरिक हूं। आम नागरिक की तरह संविधान ने मुझे सारे हक दिए हैं। यह फतवा मेरे संवैधानिक, मानवाधिकारों का हनन है और शरीयत का हवाला देकर समाज को मेरे खिलाफ भड़काने की कोशिश है।

कभी यूनानी दार्शनिक डायोजनीज ने कहा था धर्म का अर्थ है अपने आपमें रहना। आत्मचिंतन करना, अपने आपको पहचानना। वास्तविक धर्म हमारे अंदर ही छुपा हुआ है। जिस दिन हमने इस बात को समझ लिया धर्म का वास्तविक रूप हम समझ जायेंगे। लेकिन आज के धर्मगुरु ऐसे नहीं हैं वह अपने मजहब पर दरवाजे लगाकर बैठे हैं किसे अन्दर लेना है, किसे बाहर का रास्ता दिखाना खुद तय कर रहे हैं।

दो साल पहले रमजान का माह था अचानक तसलीमा के ट्वीट से इसी मजहबी दुनिया में भूचाल ला दिया था तसलीमा ने लिखा था कि ऊपर वाला महिलाओं से नफरत करता है, इस दुनिया में महिलाओं से सबसे ज्यादा नफरत करने वाली जाति अल्लाह की है। उसने लिखा था कि अच्छा होगा कि हम महिलाओं से नफरत करने वाले धर्मों को एक साथ छोड़ दें, अगर ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम हमें ऐसे धर्मों के इन नियमों को तो छोड़ ही देना चाहिए जो महिलाओं के खिलाफ हो।

असल में इस्लाम के नाम पर महिलाओं के शोषण और दमन की बात उठनी चाहिए इसकी जरूरत भी थी। अक्सर पश्चिमी देशों में ऐसे बहुत सारे कथित विद्वान लेखक हैं जो अब तक यही कहते आये हैं कि मुसलिम देशों में औरतों का शोषण होता ही नहीं-अगर होता भी हो तो उसमें धर्म का हाथ नहीं होता। जबकि साल 2012 में जब सऊदी अरब ने पहली बार ओलंपिक खेलों में महिला एथलीटों को लंदन भेजा था। तब कट्टरपंथी मौलवियों ने इन्हें वैश्या कहा था। इसके अलावा सऊदी में कार्यालयों, बैंकों और विश्वविद्यालयों सहित अधिकांश सार्वजनिक भवनों के अलग-अलग लिंगों ;पुरुष व महिलाद्ध के लिए अलग-अलग प्रवेश है। अगर कोई महिला किसी अन्य पुरुष से बातचीत करती है तो महिला को गंभीर सजा मिलती है। यही नहीं शॉपिंग मॉल में महिलाओं को पुरुषों के साथ कपड़ों की खरीददारी करने पर कई प्रतिबंध लगे हुए हैं। इसके अलावा महिलाएं फैशन पत्रिका को भी नहीं पढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त भी हर घर में औरतों के दमन के असंख्य उदाहरण मिलेंगे। कई देशों में कानून भी स्त्री-पुरुषों के बीच बराबरी का व्यवहार नहीं करता। वहाँ किसी पुरुष की गवाही औरत की गवाही से ज्यादा विश्वसनीय समझी जाती है। मुस्लिम देशों में नौकरियों में भी औरतों को कई प्रकार के शोषण का शिकार होना पड़ता है।

मुस्लिम विमेंस फोरम की संस्थापिका, सैय्यदा हमीद ने सन् 2000 में बेआवाजों की आवाज नाम की रिपोर्ट लिखी थी। देशभर के 18 राज्यों का भ्रमण करके मुस्लिम महिलाओं की आवाज सुनकर ये रिपोर्ट 17 साल पहले तैयार की थी। इस रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति का खुलासा किया गया था। महिला आयोग ने ये पाया था कि अन्य महिलाओं की तरह मुस्लिम महिला की भी समस्या अशिक्षा और बेरोजगारी है। उसके साथ उसके अपने निजी कानून उसकी जिंदगी की मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं। तीन तलाक बहुविवाह-चार शादियां उस पर नंगी तलवार की तरह लटकती रहती है। इसलिए सैय्यदा हमीद का सुझाव था कि मुस्लिम समुदाय और उसके रहनुमा का कर्त्तव्य है कि वे निजी कानूनों में निजी सुधार लेकर आएं। तब सैय्यदा हमीद ने मुस्लिम समाज को ये चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने अपने घर को अपने आप नहीं संवारा तो उनके निजी कानून में सरकार का दखल जरूरी हो जाएगी और 17 साल बाद यही हुआ।  22 अगस्त 2017 को मुसलमानों के निजी कानून में कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला तीन तलाक पर सुनाया था और हमेशा के लिए इस प्रथा को रद्द कर दिया था और अब सरकार पर ये जिम्मेदारी डाल दी कि संसद में कानून बनाकर इस प्रथा को समाप्त कर दे जिसका अब इंतजार हैं आखिर इन बेआवाजों की आवाज भी तो किसी को सुननी चाहिए।

-राजीव चौधरी

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