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भारतीय मुस्लिम समाज और देश !

Jul 18 • Samaj and the Society • 428 Views • No Comments

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नैतिकता का यह मानना है कि किसी भी व्यक्ति का सर्वोच्च धर्म राष्ट्र धर्म होता है। राष्ट्रीय धर्म को सर्वोपरि मानकर उसके लिए त्याग तपस्या या बलिदान करने वाले किसी जाति सम्प्रदाय, मजहब तक अपना स्थान नहीं बनाते, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र उनके प्रति नत्मस्तक व कृतज्ञ होता है। स्वतन्त्रता की लड़ाई में भारत माता के वीर सपूत अश्फाक उल्लाह खॉं, हो चाहे परमवीर चक्र से नवाजे अब्दुल हमीद हो अथवा हाल ही में शहीद हुए डी.एस.पी. आयूब पण्डित हों। इन सबने सम्मान अपनी जाति या मजहब के नाम पर नहीं पाया किन्तु अपने राष्ट्रीय धर्म को सर्वोपरि मानते हुए अपनी कुर्बानियां दी हैं। इसलिए पूरा देश आहत होता है, नत्मस्तक होता है। यह भी संभव था यदि जाति अथवा सम्प्रदाय के लिए बलिदान होता तो एक वर्ग विशेष तक सीमित रहता और इतना सम्मान नहीं पाते।

विगत कुछ दिनों से भारत की आंतरिक शक्ति और सुरक्षा को इसी देश के कुछ नागरिकों से खतरा हो गया है। उनके दुष्प्रयासों को रोकने में बड़ी शक्ति सेना, सी आर पी और सुरक्षा बल, की लग रही है। इस आग को और बढ़ाने में पड़ोसी राष्ट्र पूरी मदद कर रहा है। हर संभव प्रयत्नशील है, इस देश की आन्तरिक स्थिति को बिगाड़ने के लिए राष्ट्रीय दुश्मनों के हाथों इसी देश के किशोर व नवयुवक अपने ही देश में पाकिस्तान की जय-जयकार कर रहे हैं, आतंकवादियों, घुसपैठियों के विरूद्ध की जा रही कार्यवाही में वे बाधक बन रहे हैं। पत्थर, सेना व सुरक्षा बलों पर फेंक रहे हैं। आतंकवाद को रोकने में मदद करने के स्थान पर उनका साथ दे रहे हैं। देश की गोपनियता भंग कर रहे हैं। सीमा पार से घुसपैठियों का देश में प्रवेश करने में सहयोग, सुरक्षा और आश्रय दे रहे हैं। देश के अनेक सपूत इस राष्ट्र विरोधी गतिविधि को रोकने में अपने प्राण गवां चुके हैं। मजहबी कट्टरता का नंगा नाच पूरे क्षेत्र में व देशे के कुछ अन्य भागों में हो रहा है।

यह सब कौन कर रहा है ? किस जाति सम्प्रदाय के व्यक्तियों का सहयोग इन्हें प्राप्त है ? कौन देश के खूंखार आतंकियों को अपना रहनुमा मान रहे हैं ? कौन इस देश से कश्मीर को अलग कर पाकिस्तान को सौंपना चाहता है ?

ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर टी.वी. चैनल, समाचार पत्र, वाट्स अप, फेस बुक, यू ट्यूब पर करोड़ों व्यक्तियों को मिलता है और उनके सामने इस्लाम का चेहरा खड़ा हो जाता है, तमाम ये राष्ट्रद्रोही व मजहबी उन्माद करने वाले इस्लाम के मानने वाले हैं। स्वाभाविक है जिस समुदाय के व्यक्तियों द्वारा यह जघन्य आपराधिक कार्य कर देश की जन धन, शान्ति व शक्ति को नष्ट किया जा रहा है वे इस्लाम के मानने वाले हैं। इस प्रकार आम व्यक्ति की इस्लाम के प्रति क्या भावना होगी यह आप भलि भांति समझ सकते हैं। कम से कम अच्छी तो नहीं होगी यह सत्य है।

किन्तु यहां एक प्रश्न उठता है क्या इस्लाम के सभी अनुयायी प्रत्येक मुसलमान इस असंवैधानिक और राष्ट्र घाती कार्य में लिप्त हैं ? क्या हर मुसलमान को कश्मीर की परिस्थिति के लिए दोषी माना जावें ?

नहीं प्रत्येक मुसलमान न तो ऐसा चाहता है और न ही उसकी इन उग्रवादी, आतंकवादी कार्यों में कोई सहयोग है या रूची है। देश के मुसलमानों की संख्या का बहुत बड़ा तपका इसे गलत मानता है। लाखों मुसलमान इस राष्ट्र को अपना मादरे वतन, जन्नत मानता है। वह इस राष्ट्र से अच्छा जीवन किसी अन्य इस्लामिक कन्ट्री में नहीं मानते हैं वे वहां की अपेक्षा यहां बहुत सुरक्षित व सुखी है। इसलिए हर मुसलमान इसके लिए दोषी नहीं है। किन्तु यह भी सत्य है कि इन सारी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाकिस्तान के सहयोगी, हिंसा, लूटमार करने वाले अलगाववादी, उग्रवादी, आतंकवादी सभी मुस्लिम है ?

कुछ समय पहले खालिस्तान की मांग उठी थी, कुछ सिख्ख पंथ के अनुयायी इसे बहुत बड़ा रूप देने के लिए हिंसा, मार काट करने में लगे थे। पंजाब खाली करवाने में जबरन अपनी विचारधारा मनवाने में लगे थे। पवित्र पूजा स्थलों में हिंसात्मक वातावरण बन रहा था। श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या भी इसी सम्प्रदाय के नवयुवकों द्वारा की गई थी। पूरे देश में सिख्ख समुदाय के प्रति एक आक्रोश और नफरत सी फैल गई थी। जबकि सारे सिख्ख इस प्रकार के कार्यों के समर्थक नहीं थे, किन्तु फिर भी नफरत व शंका के घेरे में थे। क्योंकि जो साफ सुथरे राष्ट्र प्रेमी होते हुए भी वे चुप रहे, उन्होंने अपनों का खुलकर विरोध नहीं किया था।

आज वही स्थिति तेजी से पुनः देश में फैल रही है। चन्द मुसलमानों के अनैतिक कार्यों को लाखों की संख्या में इस देश से प्रेम व सद्भाव रखने वाले देश के हितैषी भी हैं, किन्तु वे मौन हैं। कौम बदनाम हो रही है, इस्लाम के प्रति एक अलग सी विचारधारा बनते जा रही है जिससे देश व संस्कृति का भाव जुड़ा है। चुप रहना इस्लाम के लिए अपनी गरिमा को क्षति पहुंचा रहा है। यदि यही चलता रहा तो एक राष्ट्रीय विचारधारा वाले या सनातन धर्मियों के व इस्लाम के मध्य यह नफरत की खाई और बढ़ती जावेगी। इसलिए उन तमाम मुस्लिम सम्प्रदाय के शान्तिप्रिय, राष्ट्र हितैषी, मानवता की रक्षा करने का विचार रखने वाले तथा साम्प्रदायिक कटुता की भावना से उपर इस्लाम के नुमायिन्दों को राष्ट्रहित में देश में हो रही अलगाववादी, आतंकवादी, पाकिस्तान परस्त विचारधारा का खुलकर ताकत के साथ घोर विरोध करना चाहिए। यदि देश हम सबका है तो फिर देश को हो रही क्षति में मौन क्यों रहें ? आज मौन रहना  इन अनैतिक कार्यों को एक मौन सहयोग की श्रेणी में लाकर खड़ा कर रहा है। इसे अविलम्ब बदलने की आवश्यकता है। मौन आपके सत्य को नष्टकर देता है, कहा गया ‘‘मौनं सत्यं विनष्यति’’।

प्रकाश आर्य

सभामन्त्री

सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली

 

 

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